Author: KN Tiwari

Navarna Mantra

नवार्ण मंत्र (Navarna Mantra) का महत्व एव नवार्ण मंत्र जप का विधान

माता भगवती जगत् जननी दुर्गा जी की साधना-उपासना के क्रम में, नवार्ण मंत्र एक महत्त्वपूर्ण महामंत्र है ।

नवार्ण अर्थात नौ अक्षरों का इस नौ अक्षर के महामंत्र में नौ ग्रहों को नियंत्रित करने की शक्ति है, जिसके माध्यम से सभी क्षेत्रों में पूर्ण सफलता प्राप्त की जा सकती है और भगवती दुर्गा का पूर्ण आशीर्वाद प्राप्त किया जा सकता है यह महामंत्र शक्ति साधना में सर्वोपरि तथा सभी मंत्रों-स्तोत्रों में से एक महत्त्वपूर्ण महामंत्र है।

यह भगवती दुर्गा जी के तीनों स्वरूपों महाकाली,महालक्ष्मी एवं महासरस्वती की एक साथ साधना का पूर्ण प्रभावक बीज मंत्र है और साथ ही दुर्गा के नौ रूपों का संयुक्त मंत्र है और इसी महामंत्र से नौ ग्रहों को भी शांत किया जा सकता है ।

नवार्ण मंत्र-Navarna Mantra

“ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे” नौ अक्षर वाले इस अद्भुत नवार्ण मंत्र में देवी दुर्गा की नौ शक्तियां समायी हुई है,जिसका सम्बन्ध नौ ग्रहों से भी है—

ऐं = सरस्वती का बीज मन्त्र है।

ह्रीं = महालक्ष्मी का बीज मन्त्र है।

क्लीं = महाकाली का बीज मन्त्र है।

1-” ऐं “ -से माता दुर्गा की प्रथम शक्ति माता शैलपुत्री की उपासना की जाती है, जिस में सूर्य ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है |

2-” ह्रीं “-से माता दुर्गा की द्वितीय शक्ति माता ब्रह्मचारिणी की उपासना की जाती है, जिस में चन्द्र ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है|

3- ” क्लीं “-से माता दुर्गा की तृतीय शक्ति माता चंद्रघंटा की उपासना की जाती है, जिस में मंगल ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है|

4- ” चा“- से माता दुर्गा की चतुर्थ शक्ति माता कुष्मांडा की उपासना की जाती है, जिस में बुध ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है।

5- ” मुं “-से माता दुर्गा की पंचम शक्ति माँ स्कंदमाता की उपासना की जाती है, जिस में बृहस्पति ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है।

6-” डा “- से माता दुर्गा की षष्ठ शक्ति माता कात्यायनी की उपासना की जाती है, जिस में शुक्र ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है।

7- ” यै “-से माता दुर्गा की सप्तम शक्ति माता कालरात्रि की उपासना की जाती है, जिस में शनि ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है।

8- ” वि – से माता दुर्गा की अष्टम शक्ति माता महागौरी की उपासना की जाती है, जिस में राहु ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है।

9- ” चै “-से माता दुर्गा की नवम शक्ति माता सिद्धीदात्री की उपासना की जाती है, जिस में केतु ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है।

अत: प्रतिदिन 108 बार  “ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे” नवार्ण मंत्र का जप करें।

जप विधि

विनियोग

  ॐ अस्य श्रीनवार्ण मंत्रस्य ब्रह्म-विष्णु-रुद्रा ऋषयः, गायत्र्युष्णिगनुष्टुप् छन्दांसि, श्रीमहाकाली -महालक्ष्मी -महासरस्वतयो  देवताः, रक्त-दन्तिका-दुर्गा भ्रामर्यो बीजानि, नन्दा शाकम्भरी भीमाः शक्त्यः, अग्नि- वायुसूर्यास्तत्त्वानि, ऋग्-यजुः-सामानि स्वरुपाणि, ऐं बीजं, ह्रीं शक्तिः, क्लीं कीलकं, श्रीमहाकाली -महालक्ष्मी -महासरस्वती स्वरुपा त्रिगुणात्मिका श्री महादुर्गा देव्या प्रीत्यर्थे जपे विनियोगः।

ऋष्यादि-न्यास

ब्रह्म-विष्णु-रुद्रा ऋषिभ्यो नमः शिरसि।

गायत्र्युष्णिगनुष्टुप् छन्देभ्यो नमः मुखे।

श्रीमहाकाली-महालक्ष्मी-महासरस्वतयो देवताभ्यो नमः हृदिः।

ह्रीं शक्ति सहितायै नन्दा-शाकम्भरी-भीमा देवताभ्यो नमः नाभौ।

क्लीं कीलक सहितायै अग्नि-वायु-सूर्य तत्त्वेभ्यो नमः गुह्ये।

ऋग्-यजुः-साम स्वरुपिणी श्रीमहाकाली -महालक्ष्मी-महासरस्वती देवताभ्यो नमः पादौ।

श्री महादुर्गा प्रीत्यर्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे ।

“ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे”  पढ़कर शुद्धि करें ।

षडङ्ग-न्यास

कर-न्यास

ॐ ऐं अंगुष्ठाभ्यां नमः।

ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः।

ॐ क्लीं मध्यमाभ्यां नमः।

ॐ चामुण्डायै अनामिकाभ्यां हुम्।

ॐ विच्चे कनिष्ठिकाभ्यां वौषट्।

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे करतल-कर-पृष्ठाभ्यां फट्।

अंग-न्यास

ॐ ऐं हृदयाय नमः।

ॐ ह्रीं शिरसे स्वाहा।

ॐ क्लीं शिखायै वषट्।

ॐ चामुण्डायै कवचाय हुम्।

ॐ विच्चे नेत्र-त्रयाय वौषट्।

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे अस्त्राय फट्।

अक्षर-न्यास

ॐ ऐं नमः शिखायां।

ॐ ह्रीं नमः दक्षिण-नेत्रे।

ॐ क्लीं नमः वाम-नेत्रे।

ॐ चां नमः दक्षिण-कर्णे।

ॐ मुं नमः वाम-कर्णे।

ॐ डां नमः दक्षिण-नासा-पुटे।

ॐ यैं नमः वाम-नासा-पुटे।

ॐ विं नमः मुखे।

ॐ च्चें नमः गुह्ये ।

मूल मंत्र से चार बार सम्मुख दो-दो बार दोनों कुक्षि की ओर कुल आठ बार (दोनों हाथों से सिर से पैर तक) न्यास करें ।

दिङ्ग-न्यास

ॐ ऐं प्राच्यै नमः।

ॐ ऐं आग्नेय्यै नमः।

ॐ ह्रीं दक्षिणायै नमः।

ॐ ह्रीं नैर्ऋत्यै नमः।

ॐ क्लीं प्रतीच्यै नमः।

ॐ क्लीं वायव्यै नमः।

ॐ चामुण्डायै उदीच्यै नमः।

ॐ चामुण्डायै ऐशान्यै नमः।

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ऊर्ध्वायै नमः।

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे भूम्यै नमः।

ध्यानम्

ॐ खड्गं चक्रगदेषुचाप परिघाञ्छूलं भुशुण्डीं शिरः,

शङ्खं  संदधतीं  करैस्त्रिनयनां सर्वाङ्गभूषावृताम्।नीलाश्मद्युतिमास्य पाददशकां सेवे महाकालिकाम्,

यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्तुं मधुं कैटभम्।।

ॐ अक्षस्रक्परशुं गदेषुकुलिशं पद्मं धनुष्कुण्डिकां,

दण्डं शक्तिमसिं च चर्म जलजं घण्टां सुराभाजनम्।

शूलं पाशसुदर्शने च दधतीं हस्तैः प्रसन्नाननां

सेवे  सैरिभमर्दिनीमिह महालक्ष्मीं  सरोजस्थिताम्।।

घण्टाशूलहलानि शङ्खमुसले चक्रं धनुः सायकं,

हस्ताब्जैर्दशतीं घनान्तविलसच्छितांशुतुल्य प्रभाम्।गौरीदेहसमुद्भुवां    त्रिजगतामाधारभूतां     महा-

पूर्वामत्र    सरस्वतीमनुभजे   शुम्भादिदैत्यार्दिनीम्।।

माला-पूजन

माला स्फटिक की हो ,लाल मुंगे की या रुद्राक्ष की माला के गन्धाक्षत करें तथा “ऐं ह्रीं अक्षमालिकायै नमः” इस मंत्र से पूजा करके प्रार्थना करें :—

ॐ मां माले महामाये सर्वशक्ति स्वरुपिणि।

चतुर्वर्गस्त्वयि न्यस्तः तस्मान्मे सिद्धिदाभव ।।

ॐ अविघ्नं कुरुमाले त्वं गृह्णामि दक्षिणे करे।

जपकाले च सिद्धयर्थं प्रसीद  मम सिद्धये।।

ॐ अक्षमालाधिपतये सुसिद्धिं देहि देहि सर्व मंत्रार्थ साधिनि साधय साधय सर्वसिद्धिं परिकल्पय परिकल्पय मे स्वाहा।

नवार्ण मंत्र का जप करें

“ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे”

जप  समर्पण

“गुह्याति-गुह्य-गोप्त्री त्वं गृहाणास्मत्-कृतं जपम्।

सिद्धिर्मे  भवतु   देवि !  त्वत्-प्रसादान्महेश्वरि।।”

उक्त श्लोक पढ़कर देवी के वाम हस्त में जप समर्पित करें।

इस प्रकार  “ऐ ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे” इस मंत्र का 1,25000 बार जप करके,जप का  दशांश हवन, हवन का दशांश तर्पण, तर्पण का दशांश मार्जन, मार्जन का दशांश ब्राह्मण भोज कराना चाहिए।

Dussera (Dashara) -2023

दशहरा(विजयादशमी) क्यों मनाया जाता है- “why dussera is celebarated?

दशहरा का त्योहार भारत में मनाया जाता है और यह एक महत्वपूर्ण हिन्दू पर्व है। यह पर्व विजयादशमी के नाम से भी जाना जाता है। दशहरा का महत्व भगवान राम के जीवन में बड़े महत्वपूर्ण घटना के साथ जुड़ा हुआ है।

इस त्योहार का मुख्य उद्देश्य असत्य के प्रति सत्य की विजय का प्रतीकित करना है। इसे विजयादशमी के दिन मनाते हैं, जब भगवान राम ने लंका के रावण को वनवास से मुक्ति दिलाई थी।

इस दिन भगवान राम ने रावण का वध किया और असत्य के प्रति सत्य की जीत का प्रतीक दिखाया। इसके अलावा, दशहरा का त्योहार मां दुर्गा की नौ दिन की नवरात्रि के अंत में आयोजित नौवीं रात्रि के रूप में भी मनाया जाता है।

दशहरा के दिन भगवान राम की विजय को याद करते हैं और रावण के पुतले को आग में दहन करते हैं, जिससे असत्य के प्रति सत्य की जीत का प्रतीक माना जाता है। यह त्योहार भारत में आने वाले परिवार और दोस्तों के साथ मनाया जाता है और विभिन्न प्रकार की परंपराओं और आचरणों के साथ मनाया जाता है।

2022 में विजयदशमी 6 अक्टूबर को था। विजयदशमी, जिसे दशहरा भी कहा जाता है, हिन्दू परंपराओं का एक त्योहार है जो आमतौर पर पंचांग के अनुसार सितंबर या अक्टूबर में होता है। इसकी तारीख हर साल बदल सकती है।

दशहरा-विजयादशमी कब है– When is Dussehra?

आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि की शुरुआत 23 अक्टूबर की शाम 5.44 पर हो रही है और 24 अक्टूबर को दोपहर 3.14 बजे तक दशमी तिथि रहेगी. उदया तिथि के अनुसार 24 को अक्टूबर दशहरा मनाया जाएगा | उदया तिथि के अनुसार 24 को अक्टूबर दशहरा मनाया जाएगा

दशहरा -विजयादशमी का महत्व– Sigificance of Dussera

विजयदशमी या दशहरा का त्यौहार हिन्दू धर्म में विशेष मान्यता रखता है जो असत्य पर सत्य की जीत का पर्व है। इस त्यौहार से जुड़ीं ऐसी अनेक धार्मिक मान्यताएं है जिसके बारे में हम आपको अवगत कराएंगे।

दशहरा से जुड़ीं ऐसी पौराणिक मान्यता है कि इस दिन मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम ने लंकापति रावण का वध किया था। वहीँ, देवी दुर्गा ने असुर महिषासुर का संहार किया था इसलिए इसे कई स्थानों पर विजयदशमी के रूप में मनाया जाता है।

 दशहरा तिथि पर कई राज्यों में रावण की पूजा करने का भी विधान है। इस दिन देश में कई जगह मेले आयोजित किये जाते है।

दशहरे से 14 दिन पहले तक पूरे भारत में रामलीला का मंचन किया जाता है, जिसमें भगवान राम, श्री लक्ष्मण एवं सीता जी के जीवन की लीला दर्शायी जाती है। विभिन्न पात्रों के द्वारा मंच पर प्रदर्शित की जाती है। विजयदशमी तिथि पर भगवान राम द्वारा रावण का वध होता है, जिसके बाद रामलीला समाप्त हो जाती है।

दशहरा-विजयादशमी की पूजा विधि- The worship method of Dussehra.

दशहरा की पूजा सदैव अभिजीत, विजयी या अपराह्न काल में की जाती है।

अपने घर के ईशान कोण में शुभ स्थान पर दशहरा पूजन करें।

पूजा स्थल को गंगा जल से पवित्र करके चंदन का लेप करें|

आठ कमल की पंखुडियों से अष्टदल चक्र निर्मित करें।

पश्चात संकल्प मंत्र का जप करें तथा देवी अपराजिता से परिवार की सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना करें।

अष्टदल चक्र के मध्य में ‘अपराजिताय नमः’ मंत्र द्वारा देवी की प्रतिमा स्थापित करके आह्वान करें।

इसके बाद मां जया को दाईं एवं विजया को बाईं तरफ स्थापित करें और उनके मंत्र “क्रियाशक्त्यै नमः”“उमाये नमः” से देवी का आह्वान करें।

तीनों देवियों की शोडषोपचार पूजा विधिपूर्वक करें।

शोडषोपचार पूजन के उपरांत भगवान श्रीराम और हनुमान जी का भी पूजन करें।

सबसे अंत में माता की आरती करें और भोग का प्रसाद सब में वितरित करें।

दशहरा -विजयादशमी पर संपन्न होने वाली पूजा- The puja performed on Dussehra.

शस्त्र पूजा: दशहरा के दिन दुर्गा पूजा, श्रीराम पूजा के साथ और शस्त्र पूजा करने की परंपरा है। प्राचीनकाल में विजयदशमी पर शस्त्रों की पूजा की जाती थी। राजाओं के शासन में ऐसा होता था। अब रियासतें नहीं है, लेकिन शस्त्र पूजन को करने की परंपरा अभी भी जारी है।

शामी पूजा: इस दिन शामी पूजा करने का भी विधान है जिसके अंतर्गत मुख्य रूप से शामी वृक्ष की पूजा की जाती है। इस पूजा को मुख्य रूप से उत्तर-पूर्व भारत में किया जाता है। यह पूजा परंपरागत रूप से योद्धाओं या क्षत्रिय द्वारा की जाती थी।

अपराजिता पूजा: दशहरा पर अपराजिता पूजा भी करने की परंपरा है और इस दिन देवी अपराजिता से प्रार्थना की जाती हैं। ऐसा मान्यता है कि भगवान श्रीराम ने रावण को युद्ध में परास्त करने के लिए पहले विजय की देवी, देवी अपराजिता का आशीर्वाद प्राप्त किया था। यह पूजा अपराहन मुहूर्त के समय की जाती है, साथ आप चौघड़िये पर अपराहन मुहूर्त भी देख सकते हैं।

वर्ष के शुभ मुहूर्तों में से एक दशहरा-विजयादशमी

दशहरा की गिनती शुभ एवं पवित्र तिथियों में होती है, यही कारण है कि अगर किसी को विवाह का मुहूर्त नहीं मिल रहा हो, तो वह इस दिन शादी कर सकता हैं। यह हिन्दू धर्म के साढ़े तीन मुहूर्त में से एक है जो इस प्रकार है- चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, अश्विन शुक्ल दशमी, वैशाख शुक्ल तृतीया, एवं कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को आधा मुहूर्त माना गया है। यह अवधि किसी भी कार्यों को करने के लिए उत्तम मानी गई है।

दशहरा -विजयादशमी कथा– Dussera Story

अयोध्या नरेश राजा दशरथ के पुत्र भगवान श्रीराम अपनी अर्धागिनी माता सीता और भाई लक्ष्मण के साथ 14 वर्ष के वनवास पर गए थे। वन में दुष्ट रावण ने माता सीता का अपहरण कर लिया और उन्हें लंका ले गया।

अपनी पत्नी सीता को दुष्ट रावण से मुक्त कराने के लिए दस दिनों के भयंकर युद्ध के बाद भगवान राम ने रावण का वध किया था। उस समय से ही प्रतिवर्ष दस सिरों वाले रावण के पुतले को दशहरा के दिन जलाया जाता है|जो मनुष्य को अपने भीतर से क्रोध, लालच, भ्रम, नशा, ईर्ष्या, स्वार्थ, अन्याय, अमानवीयता एवं अहंकार को नष्ट करने का संदेश देता है।

महाभारत में वर्णित पौराणिक कथा के अनुसार, जब पांडव दुर्योधन से जुए में अपना सब कुछ हार गए थे। उस समय एक शर्त के अनुसार पांडवों को 12 वर्षों तक निर्वासित रहना पड़ा था, ओर एक साल के लिए उन्हें अज्ञातवास पर भी रहना पड़ा था।

अज्ञातवास के समय उन्हें सबसे छिपकर रहना था और यदि कोई उन्हें पहचान लेता तो उन्हें दोबारा 12 वर्षों का निर्वासन झेलना पड़ता। इसी वजह से अर्जुन ने उस एक वर्ष के लिए अपनी गांडीव धनुष को शमी नामक पेड़ पर छुपा दिया था|

राजा विराट के महल में एक ब्रिहन्नला का छद्म रूप धारण करके कार्य करने लग गए थे। एक बार जब विराट नरेश के पुत्र ने अर्जुन से अपनी गायों की रक्षा के लिए सहायता मांगी तब अर्जुन ने शमी वृक्ष से अपने धनुष को वापिस निकालकर दुश्मनों को पराजित किया था।

दशहरा-विजयादशमी पर क्यों होता है शस्त्र पूजन- Why is weapon worship performed on Dussehra?

दशहरा (Dussehra) एक हिन्दू पर्व है जो अश्विन माह की शुक्लपक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है. इस बार, 23 अक्टूबर को यह पर्व पूरे देश में मनाया जाएगा। इस दिन विशेष रूप से शस्त्र पूजन (Shashtra Puja Dussehra) का विधान है ।

दशहरा को विजय दशमी भी कहा जाता है, और इस दिन मां दुर्गा और भगवान श्रीराम की पूजा की जाती है। इस दिन किए जाने वाले कामों का शुभ फल मिलता है, और यह भी मान्यता है कि शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने के लिए इस दिन शस्त्र पूजा करनी चाहिए।

जानें किस तरह शुरू हुई ये परंपरा-Know how this tradition began.

दशहरा बुराई पर अच्छाई और असत्य पर सत्य की जीत का पर्व है. मान्यता है| इस दिन भगवान श्री राम ने रावण का वध कर लंका पर विजय प्राप्त की थी|दशहरे के इस पर्व को विजय दशमी के नाम से भी जानते हैं. साथ ही मान्यता ये भी है कि मां दुर्गा ने महिषासुर नामक राक्षस का इसी दिन वध किया था|

रावण के दस सिर किस बात का प्रतीक हैं- What is the symbol of Ravana’s ten heads?

अहंकार का प्रतीक रावण के 10 सिर को अहंकार का प्रतीक माना जाता है। कहा जाता है कि 10 सिर में 10 प्रकार की बुराइयां छुपी हुई है|

पहला सिर -काम,

दूसरा सिर -क्रोध,

तीसरा सिर -लोभ,

चौथा सिर- मोह,

पांचवा सिर -मद,

छठा सिर- मत्सर,

सातवां सिर -वासना,

आठवां सिर -भ्रष्टाचार,

नौवां सिर -सत्ता, एवं शक्ति का दुरुपयोग ईश्वर से विमुख होना,

दसवां सिर -अनैतिकता और दसवा अहंकार का प्रतीक माना जाता है।

दशहरे-विजयादशमी के बारे में रोचक बाते | Dussehra Facts In hindi

दशहरा का अर्थ: दशहरा एक संस्कृत के शब्द दश हारा से आता है, जिसका अंग्रेजी में अनुवाद ‘सूर्य की हार’ है। हिंदू शास्त्रों के अनुसार, यदि भगवान राम ने रावण को नहीं हराया होता, तो सूर्य फिर कभी नहीं उगता।

महिषासुर कथा: महिषासुर राक्षसों और असुरों का एक राजा था, और बहुत शक्तिशाली था। वह निर्दोष लोगों पर अत्याचार करता। उस समय, ब्रह्मा, विष्णु और महेश की सामूहिक शक्तियों द्वारा शक्ति को महिषासुर के बुरे कार्यों को समाप्त करने के लिए बनाया गया था।

देवी दुर्गा की आवश्यकता: पौराणिक कथा के अनुसार, देवी दुर्गा को अद्भुत शक्ति की आवश्यकता थी, इसलिए अन्य सभी देवी-देवताओं ने उनकी शक्तियों को उनके पास स्थानांतरित कर दिया। परिणामस्वरूप, वे मूर्तियों के रूप में स्थिर रहे।

नवरात्रि की परंपरा: उत्तर भारत में, नवरात्रि के पहले दिन मिट्टी के बर्तनों में जौ के बीज बोने की परंपरा है। दशहरे के दिन, इन स्प्राउट्स का उपयोग भाग्य के प्रतीक के रूप में किया जाता है। पुरुष उन्हें अपनी टोपी में या कान के पीछे रखते हैं।

दुर्गा का पारिवारिक संयोग: कुछ किंवदंतियों में यह भी उल्लेख किया गया है कि देवी दुर्गा, अपने बच्चों, लक्ष्मी, गणेश, कार्तिक और सरस्वती के साथ कुछ समय के लिए पृथ्वी पर अपने जन्मस्थान में आगमन हुवी थी। दशहरे के दिन, वह अपने पति भगवान शिव के पास लौट गयी थी।

दशहरा का पर्व: हिंदू कैलेंडर के 10 वें महीने अश्विन में दशहरा पर्व मनाया जाता है। यह अक्टूबर या नवंबर के आस पास कभी-कभी भी होता है और 2023 में दशहरा Monday, 23 October को मनाया जायेगा।

विजय दशमी: हिंदू धर्म की कुछ उप-संस्कृतियों में, दशहरा को विजय दशमी भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है दसवें दिन जीत। इसे दानव राजा महिषासुर पर देवी दुर्गा की विजय के रूप में विजय दशमी के रूप में भी मनाया जाता है।

मैसूर में पूजा: मैसूर में, देवी चामुंडेश्वरी की पूजा दशहरे के दिन की जाती है।

रामलीला: रामलीला द्वारा पूरे देश में नवरात्रि के 10 दिनों को अंकित किया जाता है। दशहरे के अंतिम दिन, भगवान राम द्वारा रावण को पराजित करने का दृश्य सबसे खास होता है। रामलीला के अंत को चिह्नित करने के लिए, रावण का एक पुतला जलाया जाता है।

गोलू उत्सव: तमिलनाडु में, दशहरे के उत्सव को गोलू कहा जाता है। मूर्तियाँ विभिन्न दृश्यों को बनाने के लिए बनाई गई हैं जो उनकी संस्कृति और विरासत को दर्शाती हैं।

दशहरा का आयोजन: दशहरा का पहला भव्य उत्सव 17 वीं शताब्दी में तत्कालीन राजा, वोडेयार के आदेश पर मैसूर पैलेस में हुआ था। तब से, पूरे देश में दशहरा धूमधाम से मनाया जाता रहा है।

अंतर्राष्ट्रीय महत्व: आपको जानकर हैरानी होगी की दशहरा केवल भारत में ही नहीं बल्कि बांग्लादेश, नेपाल और मलेशिया में भी मनाया जाता है। यह मलेशिया में एक राष्ट्रीय अवकाश भी होता है। यह इन देशों में समान उत्साह के साथ मनाया जाता है क्योंकि उनके पास एक बड़ी हिंदू आबादी है।

फसलों का महत्व: दशहरा खरीफ फसलों की कटाई और रबी फसलों की बुवाई का प्रतीक है। यह सभी विश्वासों के किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर होता है।

मौसम का संकेत: दशहरे के मौसम का अंत भी होता है क्योंकि गर्मियों के अंत का समय है और सर्दियों के मौसम का समय है।

दशहरा का संदेश: दशहरा भगवान राम और देवी दुर्गा दोनों की शक्ति को प्रकट करने का प्रतीक है। देवी दुर्गा ने भगवान राम को राक्षस राजा रावण को मारने का रहस्य उजागर किया था।

Navratri 2023

नवरात्रि: हिन्दू धर्म का महत्वपूर्ण पर्व

नवरात्रि के दौरान, भक्त दुर्गा माता की पूजा करने के लिए ध्यान, भजन, और पूजा के आयोजन करते हैं। यह नौ दिन देवी के नौ रूपों की पूजा के रूप में भी मनाई जाती है, जिन्हें शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, और सिद्धिदात्रि कहा जाता है।

नवरात्रि के इन दिनों, लोग नेत्रा व्रत, कन्या पूजन, और यज्ञों का आयोजन करते हैं और दुर्गा माता के प्रति अपनी विशेष श्रद्धा और आस्था का प्रकटीकरण करते हैं। नवरात्रि के आयोजन के दौरान, महिलाएं विशेष रूप से आकर्षक श्रृंगार करती हैं और नवीन वस्त्र पहनती हैं।

नवरात्रि हिन्दू धर्म में एक महत्वपूर्ण त्योहार है जिसे पूरे उत्साह और आनंद के साथ मनाया जाता है। इस पर्व का महत्व विभिन्न तरीकों से मनाया जाता है और यह हर साल नौ दिनों के अवसर पर मनाया जाता है। इस लेख में, हम आपको Navratri 2023 के महत्व, तिथियाँ, और पूजा की विधि के बारे में जानकारी देंगे।

Check Video here : https://youtu.be/B5hOc7KzT5A

नवरात्रि का महत्व-The significance of Navratri.

नवरात्रि का महत्व हिन्दू धर्म में अत्यधिक है। इस त्योहार के दौरान मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा होती है, जिन्हें नौ दिनों तक पूजा जाता है। इन दिनों में, भक्त अपनी श्रद्धा और भक्ति के साथ मां दुर्गा की पूजा करते हैं और उनके आशीर्वाद की प्राप्ति करते हैं।

वर्ष में कुल चार नवरात्रि मनाई जाती है, लेकिन इनमें से दो नवरात्रि गुप्त होती हैं, जिन्हें चैत्र और आश्वयुज मास में मनाया जाता है। दूसरी ओर, दो नवरात्रि गृहस्थी लोगों द्वारा धूमधाम और हर्षोल्लास से मनाई जाती है, जो शारदीय और वसंत नवरात्रि के रूप में होती है।

शारदीय नवरात्रि 2023 तिथि-The date of Sharad Navratri in 2023

नवरात्रि का आयोजन इस वर्ष 15 अक्टूबर को रविवार को होगा और 24 अक्टूबर को मंगलवार को समाप्त होगा। शारदीय नवरात्रि का आरंभ प्रतिपदा तिथि को होगा, जो 14 अक्टूबर को शनिवार को रात 11 बजकर 24 मिनट पर होगा, और इसका समापन 16 अक्टूबर को सोमवार को रात 12 बजकर 3 मिनट पर होगा।

नवरात्रि का आयोजन शुभ मुहूर्त में किया जाता है। घटस्थापना मुहूर्त 15 अक्टूबर को सुबह 11 बजकर 44 मिनट से शुरू होगा और दोपहर 12 बजकर 30 मिनट पर समाप्त होगा। घटस्थापना की कुल अवधि 46 मिनट होती है, जिसमें पूजा की समय सीमा शामिल होती है।

शारदीय नवरात्रि 2023 पूजा सामग्री-Sharadiya Navratri 2023 Puja Items

नवरात्रि पूजन की सामग्री महत्वपूर्ण होती है और इसमें कई आवश्यक चीजें शामिल होती हैं। यह सामग्री पूजा के अवसर पर इस्तेमाल की जाती है और मां दुर्गा की पूजा को समर्पित किया जाता है।

कलश: घटस्थापना के लिए कलश एक महत्वपूर्ण भूषण होता है।

मिट्टी का पात्र: जौ बोने के लिए मिट्टी का पात्र का उपयोग किया जाता है।

गंगाजल: पूजा में शुद्धता के लिए गंगाजल का उपयोग होता है।

रोली, कलावा: रोली और कलावा पूजा सामग्री के रूप में उपयोग होते हैं।

सुपारी, दूर्वा, पीपल या आम के पत्ते: ये भी पूजा के लिए आवश्यक होते हैं।

नारियल: रेशेदार ताजा नारियल पूजा में उपयोग होता है।

हवन के लिए सूखा नारियल: हवन के लिए सूखा नारियल बनाने में मदद करता है।

कलश के ढक्कन: कलश को ढकने के लिए मिट्टी या तांबे का ढक्कन उपयोग होता है।

हवन सामग्री: हवन के लिए आवश्यक सामग्री भी तैयार की जाती है।

कुंकुम, सिन्दुर, सुपारी, चावल, पुष्प, इलायची, लौग, पान, दुध, घी, शहद, बिल्वपत्र, यज्ञोपवीत, चन्दन, इत्र, चौकी, फल, दीप, नैवैध(मिठाई), नारियल आदि।

माता के श्रृंगार की सामग्री

माता के शिर्न्गर के लिए मोतियों या फूलों की माला, सुंदर सी साड़ी, माता की चुनरी, कुमकुम, लाल बिंदी, लाल चूड़ियां, सिंदूर, शीशा, मेहंदी आदि खरीदें।

कलश का महत्व- Importance of kalash

विशेष धारणा का पात्र – कलश

कलश का महत्व हमारे पौराणिक और धार्मिक परंपरा में महत्वपूर्ण है। यह एक पवित्र जल से भरा जाता है और श्रद्धा और पवित्रता का प्रतीक होता है।

कलश के गले में कलावा बाँधने का महत्व

कलावा का अर्थ है पात्रता को आदरणीय तरीके से बाँधना। यह एक प्रतीक है कि हम पात्रता को ईश्वर के साथ जोड़ना चाहते हैं।

नारियल का महत्व

नारियल हमारे धार्मिक उपकरणों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है और सुख-सौभाग्य की वर्षा करता है।

कलश स्थापना के लिए सामग्री

कलश स्थापना के लिए निम्नलिखित सामग्री की आवश्यकता होती है:

कलश: यह तांबे, कासा या मिट्टी का कलश होता है, जिसमें पात्रता को स्थापित किया जाता है।

घेरा (ईडली): कलश को नीचे रखने के लिए एक घेरा या ईडली की आवश्यकता होती है।

शुद्ध जल: पवित्र जल कलश में भरने के लिए शुद्ध और पवित्र जल की आवश्यकता होती है।

कलावा: कलश के गले में कलावा बाँधने के लिए कलावा की आवश्यकता होती है।

मंगल द्रव्य: कलश में दूर्वा, कुश, पूगीफल, पुष्प और पल्लव डालने के लिए मंगल द्रव्य की आवश्यकता होती है।

पाँच उपचार पूजन

कलश स्थापना के पाँच महत्वपूर्ण उपचार पूजन

1. घटस्थापन

इस उपचार में, कलश को उच्च स्थान पर स्थापित किया जाता है। मन्त्रों के साथ कलश को निर्धारित स्थान या चौकी पर स्थापित किया जाता है, और भावना की जाती है कि हम अपने प्रभाव क्षेत्र की पात्रता को ईश्वर के चरणों में स्थापित कर रहे हैं।

मंत्र:

“ॐ आजिग्घ्र कलशं मह्या, त्वा विशन्त्विन्दवः।

पुनरूर्जा निवर्त्तस्व, सा नः सहस्रं धुक्ष्वोरुधारा, पयस्वती पुनर्मा विशताद्रयिः।।”

2. जलपूरण

इस उपचार में, कलश में शुद्ध जल डाला जाता है, और भावना की जाती है कि समर्पित पात्रता का खालीपन श्रद्धा, संवेदना, तरलता, और सरलता से भरा जा रहा है।

मंत्र:

“ॐ वरुणस्योत्तम्भनमसि, वरुणस्य स्कम्भसर्जनी स्थो,

वरुणस्यऽऋतसदन्यसि, वरुणस्यऽऋत सदनमसि, वरुणस्यऽऋतसदनमासीद॥”

3. मंगल द्रव्य स्थापन

इस उपचार में, मंत्रों के साथ कलश में दूर्वा, कुश, पूगीफल, पुष्प और पल्लव डाले जाते हैं, और भावना की जाती है

मंत्र:

“ॐ त्वां गन्धर्वाऽअखनँस्त्वाम्, इन्द्रस्त्वां बृहस्पतिः।

त्वामोषधे सोमो राजा, विद्वान्यक्ष्मादमुच्यत॥”

4. सूत्रवेष्टन

इस उपचार में, कलश में कलावा बाँधा जाता है। इससे पात्रता को अवाञ्छनीयता से जोड़ने का अवसर नहीं दिया जाता है और उसे आदरणीय तरीके से अनुबंधित किया जाता है, ईश्वर के अनुशासन में बाँधा जाता है।

मंत्र:

“ॐ सुजातो ज्योतिषा सह, शर्मवरूथ माऽसदत्स्वः।

वासोऽ अग्ने विश्वरूपœ, सं व्ययस्व विभावसो॥”

5. नारियल संस्थापन

इस उपचार में, कलश के ऊपर नारियल रखा जाता है। इसके माध्यम से दिखाया जाता है कि पात्रता सुख-सौभाग्य की आधार बन रही है और यह दिव्य कलश जो स्थापित हुआ है, वहाँ की जड़-चेतना सारी पात्रता इन्हीं संस्कारों से भर रही है।

मंत्र:

“ॐ याः फलिनीर्या ऽ अफला, अपुष्पा याश्च पुष्पिणीः।

बृहस्पतिप्रसूतास्ता, नो मुञ्चन्त्वœ हसः।।”

नवरात्री में कलश स्थापना कैसे करें? Kalash Sthapana Kaise Kare ?

यदि आप अपने घर में कलश स्थापना कर रहे हैं, तो सबसे पहले कलश पर स्वास्तिक बनाएं। फिर कलश पर मौली बांधें और उसमें जल भरें। कलश में साबुत सुपारी, फूल, इत्र और पंचरत्न व सिक्का डालें। इसमें अक्षत भी डालें।

कलश स्थापना हमेशा शुभ मुहूर्त में करनी चाहिए। नित्य कर्म और स्नान के बाद ध्यान करें।

इसके बाद पूजन स्थल से अलग एक पाटे पर लाल व सफेद कपड़ा बिछाएं।

इस पर अक्षत से अष्टदल बनाकर इस पर जल से भरा कलश स्थापित करें। कलश का मुँह खुला न रखें, उसे किसी चीज़ से ढक देना चाहिए।

अगर कलश को किसी ढक्कन से ढका है, तो उसे चावलों से भर दें और उसके बीचों-बीच एक नारियल भी रखें।

इस कलश में शतावरी जड़ी, हलकुंड, कमल गट्टे व रजत का सिक्का डालें।

दीप प्रज्वलित कर इष्ट देव का ध्यान करें। तत्पश्चात देवी मंत्र का जाप करें।

अब कलश के सामने गेहूं व जौ को मिट्टी के पात्र में रोंपें।

इस ज्वारे को माताजी का स्वरूप मानकर पूजन करें। अंतिम दिन ज्वारे का विसर्जन करें।

कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त- Kalash Sthapana Muhurat

घटस्थापना मुहूर्त 15 अक्टूबर को सुबह 11 बजकर 44 मिनट से शुरू होगा और दोपहर 12 बजकर 30 मिनट पर समाप्त होगा। घटस्थापना की कुल अवधि 46 मिनट होती है, जिसमें पूजा की समय सीमा शामिल होती है

Kalsh Sthapana Mantra

कलशस्य मुखे विष्णु: कंठे रुद्र: समाश्रित:। मूले तत्र स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणा: स्मृता:।। कुक्षौ तु सागरा: सर्वे सप्तद्वीपा वसुंधरा। ऋग्वेदोअथ यजुर्वेद: सामवेदो ह्यथवर्ण:।। अंगैच्श सहिता: सर्वे कलशं तु समाश्रिता:। अत्र गायत्री सावित्री शांतिपृष्टिकरी तथा। आयांतु मम शांत्यर्थ्य दुरितक्षयकारका:।। सर्वे समुद्रा: सरितस्तीर्थानि जलदा नदा:। आयांतु मम शांत्यर्थ्य दुरितक्षयकारका:।।

कलश के मुख में विष्णुजी, कण्ठ में रुद्र, मूल में ब्रह्मा और कलश के मध्य में सभी मातृशक्तियां निवास करती हैं। कलश स्थापना का अर्थ है नवरात्रि के समय ब्रह्मांड में उपस्थित शक्तितत्त्व का घट अर्थात कलश में आवाहन कर उसे सक्रिय करना। शक्तितत्व के कारण वास्तु में उपस्थित कष्टदायक तरंगे नष्ट हो जाती हैं। नवरात्र के पहले दिन पूजा की शुरुआत दुर्गा पूजा निमित्त संकल्प लेकर ईशानकोण में कलश-स्थापना करके की जाती है।

नवरात्री तिथि-Navratri Date 2023

नवरात्री के दौरान, तिथियों का महत्व विशेष रूप से माना जाता है। नवरात्री का पूरा आयोजन नवमी तिथि के अगले दिन तक चलता है, जब दशमी तिथि का विसर्जन होता है। इसके पहले नौ दिन के अवसर पर, नवरात्री के प्रत्येक दिन का महत्वपूर्ण होता है, और भक्त विशेष रूप से देवी दुर्गा की पूजा करते हैं।

यह तिथियाँ अनुसरणीय होती हैं और नवरात्री के पूजन और उपासना का अवसर प्रदान करती हैं। इस दौरान, विशेष रूप से बड़े मन्त्र, आरती, और पूजन क्रियाओं का आयोजन किया जाता है, जो नवरात्री के महत्वपूर्ण हिस्से होते हैं।

नवरात्री के नौ दिनों के अवसर पर भक्त देवी की आराधना करते हैं और उनके प्रति अपनी अद्भुत श्रद्धा का प्रकटीकरण करते हैं। यह तिथियाँ नारी शक्ति की महत्वपूर्ण प्रतीक होती हैं और उनके अवसर पर मां दुर्गा का आशीर्वाद प्राप्त करने की कोशिश की जाती है।

15 अक्टूबर 2023- मां शैलपुत्री की पूजा

16 अक्टूबर 2023- मां ब्रह्मचारिणी की पूजा

17 अक्टूबर 2023- मां चंद्रघंटा की पूजा

18 अक्टूबर 2023- मां कुष्मांडा की पूजा

19 अक्टूबर 2023- मां स्कंदमाता की पूजा

20 अक्टूबर 2023- मां कात्यायनी की पूजा

21 अक्टूबर 2023- मां कालरात्रि की पूजा

22 अक्टूबर 2023- मां सिद्धिदात्री की पूजा

23 अक्टूबर 2023- मां महागौरी की पूजा

24 अक्टूबर 2023 – मां दुर्गा विसर्जन, (दशहरा) विजयादशमी, शस्त्र पूजन दिवस

नवरात्रि उपवास की सामग्री-Navratri Fasting Items

नवरात्रि के उपवास के लिए सात्विक भोजन के लिए घी, मूंगफली, सिंघाड़े का आटा या कुट्टू का आटा, मखाना, आलू, लौकी, हरी मिर्च, व्रत में खाई जाने वाली सब्जी और ताजे फल आदि सामग्री घर लाएं।

नवरात्रि के पहले दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें। स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा स्थल को साफ करें। मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित करें। फिर कलश रखें। इसके बाद मिट्टी के घड़े के गले में पवित्र धागा बांधे। कलश को भरपूर मिट्टी और अनाज के बीज से भरें। इसके बाद कलश में पवित्र जल भी भरकर रखें। फिर सुपारी, गंध, अक्षत, दूर्वा घास, सिक्के डालें। कलश के मुख पर एक साबुत नारियल रखें। कलश को आम के पत्तों से सजाएं। इसके बाद माता रानी की पूजा आरंभ करें।

सबसे पहले माता रानी का श्रृंगार करें। माता रानी को फल, फूल, धूप, दीप आदि चढ़ाएं। माता रानी को सुंदर फूलों की माला पहनाएं। इसके बाद उन्हें चुनरी उढ़ाएं। मां के मंत्रों का जाप करें। मां दुर्गा के ‘दुर्गासप्तशती स्तोत्र’ का पाठ करें। फिर मां को उनके प्रिय व्यंजन का भोग लगाएं। मां की आरती उतारें और भोग वितरित करें। 

शारदीय नवरात्री में आदि शक्ति माँ दुर्गा के नौ दिनों में अलग अलग रूप की आराधना पूजा किया जाता है

माँ की मूर्ति या तसवीर स्थापना:-माँ दुर्गा जी की मूर्ती या तसवीर को लकड़ी की चौकी पर लाल अथवा पीले वस्त्र(अपनी सुविधानुसार) के उपर स्थापित करना चाहिए। जल से स्नान के बाद, मौली चढ़ाते हुए, रोली अक्षत(बिना टूटा हुआ चावल), धूप दीप एवं नैवेध से पूजा अर्चना करना चाहिए।

अखण्ड ज्योति:-नवरात्र के दौरान लगातार नौ दिनो तक अखण्ड ज्योति प्रज्जवलित की जाती है। किंतु यह आपकी इच्छा एवं सुविधा पर है। आप केवल पूजा के दौरान ही सिर्फ दीपक जला सकते है।

आसन:-लाल अथवा सफेद आसन पूरब की ओर बैठकर नवरात्रि करने वाले विशेष को पूजा, मंत्र जप, हवन एवं अनुष्ठान करना चाहिए।

नवरात्र पाठ:-माँ दुर्गा की साधना के लिए श्री दुर्गा सप्तशती का पूर्ण पाठ अर्गला, कवच, कीलक सहित करना चाहिए।

भोगप्रसाद:- प्रतिदिन देवी एवं देवताओं को श्रद्धा अनुसार विशेष अन्य खाद्द्य पदार्थो के अलावा हलुए का भोग जरूर चढ़ाना चाहिए।

नौ दिन तक चलने वाले इस महायोग में आप माता को निम्न भोग लगाये:- प्रथम दिन घी का, दूसरे दिन शक्कर का, तीसरे दिन दूध, चौथे दिन मालपुआ, पांचवें दिन केला, छठे दिन शहद, सातवें दिन गुड़, आठवें दिन नारियल, नौंवे दिन काले तिल का भोग लगाने से माता प्रसन्न होती है।

विसर्जन:- विजयादशमी के दिन समस्त पूजा हवन इत्यादि सामग्री को किसी नदी या जलाशय में विसर्जन करना चाहिए।

संकल्प:- दाहिने हाथ मे गंगा जल, कुंकुम, लाल पुष्प, चावल ले कर संकल्प करे

संकल्प करने की विधि: Sankalp Karne ki Vidhi

पूजा स्थल की तैयारी: संकल्प करने से पहले, पूजा स्थल को साफ़ और शुद्ध रूप में तैयार करें। एक सफेद कपड़ा या आसन पर बैठें।

मौन रहें: संकल्प करने से पहले, आपको निरंतरता और शांति के साथ बैठना है। किसी भी तरह की बहस और बक-बक से बचें।

मानसिक तैयारी: आपको यह विचार करना होगा कि आपका संकल्प क्या होगा और क्या उद्देश्य होंगे। आपका संकल्प व्यक्तिगत या आध्यात्मिक भी हो सकता है।

प्रारंभिक मंत्र: संकल्प करने के पहले, आपको कुछ प्रारंभिक मंत्रों का उच्चारण करना होगा, जैसे “ओम श्री गणेशाय नमः” या “ओम नमः शिवाय”। इससे मन को शुद्ध करें और ध्यान केंद्रित करें।

संकल्प का देवता के साथ संबंधित होना: आपका संकल्प किस देवता या देवी के साथ संबंधित होना चाहिए। यदि आप किसी विशेष देवता के संकल्प कर रहे हैं, तो उनकी मूर्ति या तस्वीर के सामने बैठें।

संकल्प का उच्चारण: आपको अब अपना संकल्प ज़ोरदार आवाज़ में उच्चारण करना है। आपको अपने संकल्प के उद्देश्य और लक्ष्य को स्पष्ट रूप से व्यक्त करना होगा।

संकल्प की स्वीकृति: संकल्प करने के बाद, आपको इसे देवता की प्रसाद मानकर आदरपूर्वक स्वीकार करना होगा।

ध्यान और धारणा: संकल्प करने के बाद, आपको ध्यान और धारणा करनी चाहिए जो आपके संकल्प को पूरा करने में मदद करेगी।

संकल्प करते समय यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि आपका मन पूरी तरह से शांत और लक्ष्य में निहित हो, और आपका संकल्प पूर्णत: स्पष्ट और समर्थ हो। संकल्प करने से पहले सीधे हाथ में कुंकुम, लाल पुष्प, गंगाजल, अक्षत और कुछ धन रख कर मुट्ठी बंद करे और उसे बाये हाथ की हथेली के ऊपर रखकर ही संकल्प पढ़े

“ॐ विष्णु र्विष्णु: श्रीमद्भगवतो विष्णोराज्ञाया प्रवर्तमानस्य, अद्य, श्रीबह्मणो द्वितीय प्ररार्द्धे श्वेत वाराहकल्पे जम्बूदीपे भरत खण्डे आर्यावर्तैक देशान्तर्गते, मासानां मासोत्तमेमासे अश्वनी मासे शुक्ल पक्षे प्रतिपदा तिथौ ……..वासरे (अपने गोत्र का उच्चारण करें) गोत्रोत्पन्न: (अपने नाम का उच्चारण करें) नामा: अहं (सपरिवार/सपत्नीक) सत्प्रवृतिसंवर्धानाय, लोककल्याणाय, आत्मकल्याण्य, ………..(अपनी कामना का उच्चारण करें) कामना सिद्दयर्थे दुर्गा पूजन विद्यानाम तथा साधनाम करिष्ये।“

कुन्जिका स्तोत्रं : Kunjika Strotra

श्री दुर्गा सप्तसती में वर्णित अत्यंत प्रभावशली सिद्धि कुन्जिका स्त्रोत्र प्रस्तुत कर रहा हूँ इस सिद्धि कुन्जिका स्त्रोत्र का नित्य पाठ करने से संपूर्ण श्री दुर्गा सप्तशती पाठ का फल मिलता है ..

यह महामंत्र देवताओं को भी दुर्लभ नहीं है , इस मंत्र का नित्य पाठ करने से माँ भगवती जगदम्बा की कृपा बनी रहती है ..

शिव उवाच

शृणु देवि प्रवक्ष्यामि कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम्‌

येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजापः भवेत्‌॥1

कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं रहस्यकम्‌

सूक्तं नापि ध्यानं न्यासो वार्चनम्‌॥2

कुंजिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत्‌

अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम्‌॥ 3

गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरिव पार्वति।

मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम्‌

पाठमात्रेण संसिद्ध्‌येत् कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम्‌ ॥4

अथ मंत्र

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ॐ ग्लौ हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा

॥ इति मंत्रः॥

नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि।

नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिन ॥1

नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै निशुम्भासुरघातिन ॥2

जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरुष्व मे।

ऐंकारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका॥3

क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते।

चामुण्डा चण्डघाती यैकारी वरदायिनी॥ 4

विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मंत्ररूपिण ॥5

धां धीं धू धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी।

क्रां क्रीं क्रूं कालिका देविशां शीं शूं मे शुभं कुरु॥6

हुं हु हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी।

भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः॥7

अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं

धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा॥

पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा॥ 8

सां सीं सूं सप्तशती देव्या मंत्रसिद्धिंकुरुष्व मे॥

इदंतु कुंजिकास्तोत्रं मंत्रजागर्तिहेतवे।

अभक्ते नैव दातव्यं गोपितं रक्ष पार्वति॥

यस्तु कुंजिकया देविहीनां सप्तशतीं पठेत्‌

तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा॥

इतिश्रीरुद्रयामले गौरीतंत्रे शिवपार्वती संवादे कुंजिकास्तोत्रं संपूर्णम्‌

दुर्गा क्षमा-प्रार्थना मंत्र: Kshma Prathna Mantra

अपराधसहस्त्राणि  क्रियन्तेऽहर्निशं मया।

दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वरि॥ 1

आवाहनं जानामि जानामि विसर्जनम्।

पूजां चैव जानामि क्षम्यतां परमेश्वरि ॥ 2

मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि।

यत्पूजितं मया देवि परिपूर्णं तदस्तु मे ॥ 3

अपराधशतं कृत्वा जगदम्बेति चोच्चरेत्।

यां गतिं समवाण्नोति तां ब्रह्मादयः सुराः॥ 4

सापराधोऽस्मि शरणं प्राप्तस्त्वां जगदम्बिके।

इदानीमनुकम्प्योऽहं यथेच्छसि तथा कुरु ॥ 5

अज्ञानाद्विस्मृतेभ्र्रान्त्या यन्न्यूनमधिकं कृतम्।

तत्सर्वं क्षम्यतां देवि प्रसीद परमेश्वरि॥ 6

कामेश्वरि जगन्मातः सच्चिदानन्दविग्रहे।

गृहाणार्चामिमां प्रीत्या प्रसीद परमेश्वरि॥ 7

गुह्यातिगुह्यगोप्नी त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपम्।

सिद्धिर्भवतु मे देवि त्वत्प्रसादात्सुरेश्वरि॥ 8॥

क्षमा प्रार्थना मंत्र हिंदी अनुवाद

1. हे परमेश्वरी मेरे द्वारा रात-दिन बहुत से अपराध होते रहते है। मुझे अपना दास समझकर मेरे उन अपराधों को आप कृपा पूर्वक क्षमा करिये।

2. परमेश्वरी मैं आवाहन करना नहीं जानता, विसर्जन करना नहीं जानता तथा पूजा करने का ढंग भी नहीं जानता। हे माँ मुझे क्षमा करिए।

3. देवि सुरेश्वरि मैने जो मन्त्रहीन (ना मंत्रो को जानता हूँ), कियाहीन (ना क्रियाओ को जानता हूँ), और भक्तिहीन (ना भक्ति के प्रकार जानता हूँ) पूजन किया है, वह सब आपकी कृपा से पूरे हों ।

4. सैकड़ों अपराध करने के बाद भी जो आपके शरण में आ के जगदम्बा कहकर पुकारता है, उसे वह गति प्राप्त होती है, जो ब्रम्हादि देवताओं के लिये भी पाना आसान नहीं है।

5. जगदम्बिके ! मैं अपराधी हूँ, किंतु आपकी शरण में आया हूँ। इस समय दया का पात्र हूँ। आप जैसा चाहे, वैसा करे।

6. हे देवी परमेश्वरी अज्ञान वस, भूल से या बुद्धि भ्रष्ट होने के कारण मैं ने जो भी न्यूनता या अधिकता कर दी हो, वह सब क्षमा करें और प्रसन्न हों ।

7. सच्चिदानन्दस्वरूपा परमेश्वरि! जगतमाता कामेश्वरि ! आप प्रेमपूर्वक मेरी यह पूजा स्वीकार करें और मुझ पर प्रसन्न रहें ।

8. देवि! सुरेश्वरि! आप गोपनीय से भी गोपनीय वस्तु की रक्षा करने वाली हैं। मेरे निवेदन किये हुए इस जपको ग्रहण करिये। आपकी कृपा से मुझे सिद्धि प्राप्त हो।

इस प्रकार क्षमा प्रार्थना मंत्र के पाठ से दुर्गा माता आप के जाने अनजाने में हुए सारे अपराधों को क्षमा करेंगी और उनकी कृपा सदैव आपके ऊपर बनी रहेगी ।

आरती अंबे जी की

आरती अंबे जी की के ध्वनि से मन में उत्साह उमड़ता है। मां शेरवाली की महिमा का गान करते सभी भक्त अपने मन को शांति और आनंद से भरते हैं। इस पावन आरती में मां अंबे के महत्वपूर्ण गुणों की महिमा होती है, जो हमें आदर्श और प्रेरणा प्रदान करते हैं। यह आरती भक्तों के दिलों को सुख, शांति, और आत्मा की ऊर्जा से भर देती है।

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी ।

तुमको निशदिन ध्यावत । हरि ब्रह्मा शिवरी ॥

ॐ जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी ॥

मांग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को|

उज्ज्वल से दोउ नैना,  चंद्रवदन नीको ॥

ॐ जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी ॥

कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै ।

रक्तपुष्प गल माला कंठन पर साजै ॥

ॐ जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी ॥

केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी ।

सुर-नर-मुनिजन सेवत, तिनके दुखहारी ॥

ॐ जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी ॥

कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती ।

कोटिक चंद्र दिवाकर, सम राजत ज्योती ॥

ॐ जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी ॥

शुंभ-निशुंभ बिदारे, महिषासुर घाती ।

धूम्र विलोचन नैना, निशदिन मदमाती ॥

ॐ जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी ॥

चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे ।

मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे ॥

ॐ जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी ॥

ब्रह्माणी, रूद्राणी, तुम कमला रानी ।

आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी ॥

ॐ जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी ॥

चौंसठ योगिनी मंगल गावत, नृत्य करत भैरों ।

बाजत ताल मृदंगा, अरू बाजत डमरू ॥

ॐ जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी ॥

तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता|

 भक्तन की दुख हरता,  सुख संपति करता ॥

ॐ जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी ॥

भुजा चार अति शोभित, खडग खप्पर धारी ।

मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी ॥

ॐ जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी ॥

कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती ।

श्रीमालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योती ॥

ॐ जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी ॥

श्री अंबेजी की आरति, जो कोई नर गावे ।

कहत शिवानंद स्वामी, सुख -संपति पावे ॥

 ॐ जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी ॥

नवरात्रि के नौ दिन: मां दुर्गा के नौ रूप-The Nine Forms of Goddess Durga

भारतीय संस्कृति में नवरात्रि का महत्वपूर्ण स्थान है, जिसमें मां दुर्गा के नौ विभिन्न रूपों की पूजा की जाती है। यह नौ दिन का त्योहार हर साल आवागमन होता है और हम सभी भक्त इसे बड़े श्रद्धा भाव से मनाते हैं। इस लेख में, हम आपको बताएंगे कि नवरात्रि के प्रत्येक दिन मां दुर्गा के कौन-कौन से रूप पूजे जाते हैं और उनके भोग कैसे चढ़ाते हैं।

नव दुर्गा देवियों के मंत्र-Nav Durga Mantra

नवरात्रि का पहला दिन – शैलपुत्री देवी- Kaun hai Devi Shailputri

पहली दुर्गा शैलपुत्री हैं । ये पर्वतों के राजा हिमवान् की पुत्री तथा नौदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा हैं। ये पूर्वजन्म में दक्षप्रजापति की कन्या सती भवानी- अर्थात् भगवान् शिव की पत्नी थीं। जब दक्ष ने यज्ञ किया, तब उसने शिवजी को यज्ञ में नहीं बुलाया। सती अत्याग्रहपूर्वक वहाँ पहुँची तो दक्ष ने शिव का अपमान भी किया।

पति के अपमान को सहन न कर सती ने अपने माता एवं पिता की उपेक्षा कर योगाग्नि द्वारा अपने शरीर को जलाकर भस्म कर दिया। फिर जन्मान्तर में पर्वतों के राजा हिमवान् की पुत्री ‘पार्वती- हैमवती’ बनकर पुनः शिव की अर्धांगिनी बनीं।
प्रसिद्ध औपनिषद कथानुसार जब इन्हीं भगवती हेमवती ने इन्द्रादि देवों का वृत्रवधजन्य अभिमान खण्डित कर दिया, तब वे लज्जित हो गये। उन्होंने हाथ जोड़कर उनकी स्तुति की और स्पष्ट कहा ‘वस्तुतः आप ही शक्ति है’ आपसे ही शक्ति प्राप्त कर हम सब- ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव भी शक्तिशाली हैं। आपकी जय हो, जय हो।

ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः॥

शैलपुत्री की प्रार्थना:

वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्ध कृतशेखराम् ।

वृषारूढाम् शूलधराम् शैलपुत्रीम् यशस्विनीम् ॥

अर्थ : मैं अपनी वंदना/श्रद्धांजलि देवी मां शैला-पुत्री को देता हूं, जो भक्तों को सर्वोत्तम वरदान देती हैं। अर्धचंद्राकार चंद्रमा उनके माथे पर मुकुट के रूप में सुशोभित है। वह बैल पर सवार है। वह अपने हाथ में एक भाला रखती है। वह यशस्विनी हैं – प्रसिद्ध माँ दुर्गा।

नवरात्रि का दूसरा दिन – ब्रह्मचारिणी देवी-Kaun hai Devi Brahmcharini

दूसरी दुर्गा शक्ति ब्रह्मचारिणी हैं। ब्रह्म अर्थात् तप की चारिणी-आचरण करने वाली हैं । यहाँ ‘ब्रह्म’ शब्द का अर्थ ‘तप’ है। ‘वेदस्तत्त्वं तपो ब्रह्म’- इस कोष-वचन के अनुसार वेद, तत्व एवं तप ‘ब्रह्म’ शब्द के अर्थ हैं। ये देवी ज्यातिर्मयी भव्यमूर्ति है। इनके दाहिने हाथ में जप की माला और बायें हाथ में कमण्डलु है तथा ये आनन्द से परिपूर्ण हैं |

इनके विषय में ये कथानक प्रसिद्ध हैं कि ये पूर्व जन्म मेंं हिमवान् की पुत्री पार्वती हेमवती थी। एक बार अपनी सखियों के साथ क्रीड़ा में रत थीं। उस समय इधर-उधर घूमते हुये नारद जी वहाँ पहुँचे और इनकी हस्त रेखाओं को देखकर बोले- ‘तुम्हारा तो विवाह उसी भोले बाबा से होगा जिनके साथ पूर्वजन्म में भी तुम दक्ष की कन्या सती के रूप में थीं’ किन्तु इसके लिये तुम्हें तपस्या करनी पड़ेगी नारद जी के चले जाने के बाद पार्वती ने अपनी माता मेनका से कहा की ‘वरउँ संभु न त रहउँ कुआरी।’

यदि मैं विवाह करूँगी तो भोले-बाबा शम्भु से ही करूँगी, अन्यथा कुआरी ही रहूँगी, इतना कहकर वे (पार्वती) तप करने लगी। इसलिये इनका ‘ब्रह्मचारिणी’ यह नाम प्रसिद्ध हो गया। इतना ही नहीं, जब ये तप करने में लीन हो गयीं, तब मेनका ने इनको ‘पुत्री ! तप मत करो -‘ उ मा तप’ ऐसा कहा तबसे इनका नाम ‘उमा’ भी प्रसिद्ध हो गया ।

ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नम:

ब्रह्मचारिणी की प्रार्थना:

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू।

देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥

अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और ब्रह्मचारिणी के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ।

नवरात्रि का तीसरा दिन – चंद्रघंटा देवी-Kaun hai Devi Chandraghanta

तीसरी शक्ति का नाम चन्द्रघण्टा है। इनके मस्तक में घण्टा के आकार का अर्ध-चन्द्र है। ये लावण्यमयी दिव्यमूर्ति हैं। स्वर्णके सदृश्य इनके शरीर का रंग है। इनके तीन नेत्र और दस हाथ हैं, जिसमें दस प्रकार के खड्ग आदि शस्त्र और बाण आदि अस्त्र हैं।

ये सिंह पर आरूढ़ हैं तथा लड़ने के लिये युद्ध में जाने को उन्मुख हैं। ये वीर रस की अपूर्व मूर्ति हैं। इनके चण्ड- भयंकर घण्टे की ध्वनि से सभी दुष्ट दैत्य दानव एवं राक्षस त्रस्त हो उठतें हैं।

ॐ देवी चंद्रघण्टायै नम:

माँ चंद्रघंटा ध्यान मंत्र:

पिण्डज प्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकैर्युता। प्रसीदम तनुते महयं चन्द्रघण्टेति विश्रुता।।

माँ चंद्रघंटा की प्रार्थना:

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और चंद्रघंटा के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे सब पापों से मुक्ति प्रदान करें।

नवरात्रि का चौथा दिन – कुष्मांडा देवी-Kaun hai Devi Kushmanda

चौथी दुर्गा का नाम कूष्माण्डा है। ईषत् हँसने से अण्ड को अर्थात् ब्रह्माण्ड को जो पैदा करती है, वे शक्ति कूष्माण्डा हैं। ये सूर्यमण्डल के भीतर निवास करती हैं। सूर्य के समान उनके तेज की झलक दसां दिशाओं में व्याप्त है। इनकी आठ भुजायें हैं।

सात भुजाओं में सात प्रकार के अस्त्र चमक रहे हैं तथा दाहिनी भुजा में जप माला है। सिंह पर आसीन होकर ये देदीप्यमान हैं। कुम्हड़े की बलि में इन्हें अतीव प्रिय है। अतएव इस शक्ति का ‘कूष्माण्डा’ यह नाम विश्व में प्रसिद्ध हो गया- ऐसी व्याख्या रूद्रयामल एवं कुन्जिकागम तन्त्र में उपोद्वलित है।

ॐ देवी कुष्माण्डा नम:

सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।

दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे॥

कुष्माण्डा की प्रार्थना:

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और कूष्माण्डा के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे सब पापों से मुक्ति प्रदान करें।

नवरात्रि का पांचवा दिन – स्कंदमाता-Kaun hai Devi Skand Mata

पाँचवीं दुर्गा का नाम स्कन्दमाता है। शैलपुत्री ने ब्रह्मचारिणी बनकर तपस्या करने के बाद भगवान् शिव से विवाह किया तदन्तर स्कन्द उनके नामक पुत्र रूप में उत्पन्न हुये। उनकी माता होने से ये ‘स्कन्द माता’ कहलाती है।

ये स्कन्द देवताओं की सेना का संचालन करने से सेनापति हैं। ये स्कन्दमाता अग्निमण्डल की देवता हैं, स्कन्द इनकी गोद में बैठे हैं। इनकी तीन आँखें व चार भुजायें हैं। ये शुभ्रवर्णा हैं तथा पद्म के आसन पर विराजमान हैं।

ॐ देवी स्कन्दमातायै नम:

सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।

शुभदाऽस्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥

स्कंदमाता की प्रार्थना:

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ स्कंदमाता रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और स्कंदमाता के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे सब पापों से मुक्ति प्रदान करें। इस दिन साधक का मन ‘विशुद्ध’ चक्र में अवस्थित होता है। इनके विग्रह में भगवान स्कंदजी बालरूप में इनकी गोद में बैठे होते हैं।

नवरात्रि का छठा दिन – कात्यायनी देवी-Kaun hai Devi Katyayni

कात्यायनी ये छठी दुर्गा शक्ति का नाम है। ‘कत’ का पुत्र ‘कात्य’ है। इस कात्य के गोत्र में पैदा होने वाले ऋषि कात्यायन हुए । इसी नाम के कात्यायन आचार्य हुए हैं, जिन्होंने पाणिनिकी अष्टाध्यायी की पूर्ति करने के लिये ‘वार्तिक’ बनाये हैं इन्हीं को ‘वररूचि’ भी कहते हैं।

इन कात्यायन ऋषि ने इस धारणा से भगवती पराम्बा की तपस्या की कि आप मेरी पुत्री हो जायें। भगवती ऋषि की भावना की पूर्णता के लिये उनके यहाँ ये पुत्री के रूप में अवतीर्ण हुई। इससे इनका नाम ‘कात्यायनी’ पड़ा।

वृन्दावन की गोपियों ने श्रीकृष्ण को पति-रूप में पाने के लिये मार्गशीर्ष के महीने में कालिन्दी-यमुना नदी के तट पर ‘कात्यायनी’ की पूजा की थी। इससे सिद्ध है कि यह वज्रमण्डल की अधीश्वरी देवी हैं। इनका स्वर्णमय दिव्य स्वरूप है। इनके तीन नेत्र तथा आठ भुजाएँ हैं। इन आठ भुजाओं में आठ प्रकार के अस्त्र-शस्त्र हैं। इनका वाहन सिंह है।

ॐ देवी कात्यायन्यै नम:

स्वर्णाआज्ञा चक्र स्थितां षष्टम दुर्गा त्रिनेत्राम्।

वराभीत करां षगपदधरां कात्यायनसुतां भजामि॥

चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।

कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानव-घातिनी॥

कात्यायनी की प्रार्थना:

या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥

अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और शक्ति -रूपिणी प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ।

इसके अतिरिक्त जिन कन्याओ के विवाह मे विलम्ब हो रहा हो, उन्हे इस दिन माँ कात्यायनी की उपासना अवश्य करनी चाहिए, जिससे उन्हे मनोवान्छित वर की प्राप्ति होती है।

ॐ कात्यायनी महामाये महायोगिन्यधीश्वरि ।

नंदगोपसुतम् देवि पतिम् मे कुरुते नम:॥

नवरात्रि का सातवां दिन – कालरात्रि देवी-Kaun hai Devi Kalratri

सातवीं दुर्गा शक्ति का नाम ‘कालरात्रि’ है। इनके शरीर का अंग अंधकार की तरह गहरा काला है। इनके सिर के केश बिखरे हुए हैं। इनके गले में विद्युत्-सदृश चमकीली माला है। इन तीन नेत्रों से विद्युत् की ज्योति चमकती रहती है।

नासिका से श्वास-प्रश्वास छोड़ने पर हजारों अग्नि की ज्वालाएँ निकलती रहती हैं। ऊपर उठे हुये दाहिने हाथ में चमकती तलवार है। उसके नीचे वाले हाथ में वरमुद्रा है, जिससे भक्तों को अभीष्ट वर देती हैं।

बाँयें हाथ में जलती हुई मसाल है और उसके नीचे वाले बाँयें हाथ में अभय-मुद्रा है जिससे अपने सेवकों को अभयदान करती और अपने भक्तों को सब प्रकार के कष्टों से मुक्त करती हैं। अतएव शुभ करने से यह ‘शुभंकरी’ भी हैं।

ॐ देवी कालरात्र्यै नम:

एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।

लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी॥

वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा।

वर्धन्मूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी॥

ॐ ऐं ह्रीं क्रीं कालरात्रै नमः |

कालरात्रि की प्रार्थना:

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और कालरात्रि के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे पाप से मुक्ति प्रदान करें ।

नवरात्रि का आठवां दिन – महागौरी देवी-Kaun hai Devi Mahagauri

आठवीं दुर्गा-शक्ति का नाम ‘महागौरी’ है। इनका वर्ण इन्दु एवं कुन्द के सदृश गौर है। इनकी अवस्था आठ वर्ष की है- ‘अष्टवर्षा भवेद् गौरी।’ इनके वस्त्र एवं आभूषण सभी श्वेत, स्वच्छ है। इनके तीन नेत्र हैं। ये वृषभवाहिनी और चार भुजाओं वाली हैं। ऊपर वाले वामहस्त में अभय-मुद्रा और नीचे के बाँयें हाथ में त्रिशूल है। ऊपर के दक्षिण हस्त में डमरू वाद्य और नीचे वाले दक्षिण हस्त में वरमुद्रा है। यह सुवासिनी, ये शान्तमूर्ति और शान्त-मुद्रा हैं।


‘नारद-पाञ्चरात्र’ में लिखा है कि ‘व्रियेऽहं वरदं शम्भुं नान्यं देवं महेश्वरात।’ इस प्रतिज्ञा के अनुसार शभ्भु की प्राप्ति के लिये हिमालय में तपस्या करते समय गौरी का शरीर धूल-मिट्टी से ढककर मलिन हो गया था। जब शिवजी ने गंगाजल से मलकर उसे धोया, तब महागौरी का शरीर विद्युत् के सदृश कान्तिमान् हो गया-अत्यन्त गौर हो गया। इसी से ये विश्व में ‘महागौरी’ के नाम से प्रसिद्ध हुई।

ॐ देवी महागौर्यै नमः॥

सर्वमंगल मंग्ल्ये, शिवे सर्वार्थ साधिके।

शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोस्तुते॥

श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः।

महागौरी शुभं दद्यान्महादेव-प्रमोद-दा॥

महागौरी की प्रार्थना:

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ गौरी रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और माँ गौरी के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। हे माँ, मुझे सुख-समृद्धि प्रदान करो।

नवरात्रि का नौवां दिन – सिद्धिदात्री देवी-Kaun hai Devi Siddhidatri

नवीं दुर्गा-शक्ति ‘सिद्धिदात्री’ हैं। मार्कण्डेयपुराण में अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व एवं वशित्व- ये आठ सिद्धियाँ बतलायी गयी हैं। इन सबको देनेवाली ये महाशक्ति हैं।
ब्रह्मवैवर्तपुराण के श्रीकृष्ण-जन्मखण्ड में 1- अणिमा, 2- लघिमा, 3- प्राप्ति, 4- प्राकाम्य, 5- महिमा, 6- ईशित्व, वशित्व, 7- सर्वकामावसायिता, 8- सर्वज्ञत्व, 9- दूरश्रवण, 10- परकायप्रवेशन, 11- वाकसिद्धि, 12- कल्पवृक्षत्व, 13- सृष्टि, 14- संहारकरण सामर्थ्य, 15- अमरत्व, 16- सर्वन्यायकत्व, 17- भावना, 18- सिद्धि ‘सिद्धयोऽष्टादश स्मृताः’ इन अठारह सिद्धियों का उल्लेख है। इन सबको ये देती हैं।
देवीपुराण में कहा गया है कि भगवान् शिव ने इनकी आराधना करके सब सिद्धियाँ पायी और इनकी कृपा से उनका आधा अंग देवी हो गया, जिससे उनका नाम जगत् में -‘अर्द्धनारीश्वर’ प्रसिद्ध हो गया।
ये देवी सिंहवाहिनी तथा चतुर्भजा और सर्वदा प्रसन्नवदना है। दुर्गा के इस स्वरूप की देव, ऋषि-मुनि, सिद्ध, योगी-साधक और भक्त सभी सर्वश्रेय की प्राप्ति के लिये आराधना-उपासना करते हैं।

सिद्धगन्धर्व-यक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि।

सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी।।

गन्धर्व + यक्ष + आद्य -> का अर्थ (स्वर्गलोकनिवासी उपदेवता गण, जिन में गन्धर्व, यक्ष, इत्यादि आद्य हैं), और असुर (राक्षस) , अमर (देव) गण भी, इन सब से जिसकी सेवा होती है ।

सिद्धगन्धर्व-यज्ञज्ञैरसुरैरमरैरपि यह पाठभेद भी दिखता है । यज्ञज्ञ = वह जो यज्ञों के विधान आदि जानता हो

वन्दे वांछित मनोरथार्थ चन्द्रार्घकृत शेखराम्।

कमलस्थितां चतुर्भुजा सिद्धीदात्री यशस्वनीम्॥

स्वर्णावर्णा निर्वाणचक्रस्थितां नवम् दुर्गा त्रिनेत्राम्।

शख, चक्र, गदा, पदम, धरां सिद्धीदात्री भजेम्॥

सिद्धिदात्री की प्रार्थना:

या देवी सर्वभू‍तेषु सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और माँ सिद्धिदात्री के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे अपनी कृपा का पात्र बनाओ।

Days- Colors & Bhog

1. देवी शैलपुत्री: प्रथम दिन

नवरात्रि का पहला दिन मां दुर्गा का पहला रूप देवी शैलपुत्री होता है। इनकी पूजा और अर्चना इस दिन की जाती है। शैलपुत्री को पार्वती या हेमवती के रूप में भी पूजा जाता है। इस दिन शुद्ध देसी घी माता के पैरों पर अर्पित किया जाता है और भोग भी शुद्ध घी का ही बनता है। इसके साथ मां को मीठी खीर जरूर चढ़ानी चाहिए।

नवरात्रि के पहले दिन माता शैलपुत्री की पूजा की जाती है.माना जाता है कि माता शैलपुत्री को पीला रंग बहुत प्रिय है.इसलिए इस दिन पीले रंग के कपड़े पहनकर मां की पूजा करने से मां शैलपुत्री प्रसन्न होती हैं.

2. देवी ब्रह्मचारिणी: दूसरा दिन

नवरात्रि के दूसरे दिन, देवी ब्रह्मचारिणी को समर्पित है। उनका रूप अत्यंत पवित्रता और भक्ति का है। शक्ति के इस रूप को धारण करना तपस्या, त्याग, पुण्य और बड़प्पन की भावना का आह्वान करने के लिए जाना जाता है। देवी ब्रह्मचारिणी सादा भोजन और प्रसाद पसंद करती हैं। उनके लिए आप चीनी और फलों का भोग लगा सकते हैं।

नवरात्रि के दूसरे दिन माता ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना होती है. मान्यता है कि माता ब्रह्मचारिणी को हरा रंग बहुत पसंद है. इसलिए उनकी चुनरी और श्रंगार भी हरे रंग से किया जाता है.भक्तों को उनकी पूजा हरे रंग के कपड़े पहनकर करनी चाहिए.

3. देवी चंद्रघंटा: तीसरा दिन

दुर्गा की तीसरी अभिव्यक्ति देवी चंद्रघंटा होती है। उन्हें क्रोध में दहाड़ते हुए एक 10-सशस्त्र देवी के रूप में चित्रित किया जाता है। नवरात्रि के तीसरे दिन देवी के लिए पकवान बनाए जाते हैं। उनकी पसंद का प्रसाद बनाया जाता है। अगर आप मां दुर्गा को प्रसन्न करना चाहते हैं तो तीसरे दिन दूध, मिठाई या खीर चढ़ाकर उन्हें खुश जरूर करें।

नवरात्रि के तीसरे दिन मां दुर्गा के चंद्रघंटा स्वरूप की पूजा की जाती है.उन्हें भूरा रंग बहुत भाता है.इसलिए उनका वस्त्र विन्यास भी भूरे रंग के कपड़ों से किया जाता है.भक्तों को नवरात्र के तीसरे दिन भूरे रंग के कपड़े पहनकर मां की पूजा करनी चाहिए.

4. देवी कुष्मांडा: चौथा दिन

नवरात्रि के चौथे दिन, मां कुष्मांडा की पूजा की जाती है। कुष्मांडा नाम तीन अन्य शब्दों ‘कू’ (छोटा), ‘ऊष्मा’ (ऊर्जा) और ‘अमंडा’ (अंडा) से बना है जिसका अर्थ है जिसने ब्रह्मांड को ऊर्जा और गर्मी के साथ ‘लिटिल कॉस्मिक एग’ के रूप में बनाया है। देवी के इस रूप की पूजा भव्य तरीके से की जाती है और भोग के रूप में मालपुआ चढ़ाकर देवी की पूजा करते हैं।

नवरात्रि के चौथे दिन मां कुष्मांडा की आराधना की जाती है.मान्यता है कि उन्हें नारंगी रंग बहुत प्रिय है.उनकी पूजा के दौरान सारा श्रंगार भी नारंगी रंग के कपड़ों से किया जाता है.इसलिए भक्तों को उनकी पूजा नारंगी रंग के कपड़े पहनकर करनी चाहिए.

5. देवी स्कंदमाता: पांचवा दिन

मां दुर्गा का पांचवां रूप स्कंदमाता होता है। देवी स्कंदमाता को चार भुजाओं वाली देवी के रूप में दर्शाया जाता है, जो कमंडल और घंटी के साथ अपनी दो भुजाओं में कमल धारण करती है। देवी को केले का भोग लगाया जाता है और कहा जाता है कि इससे भक्तों का स्वास्थ्य अच्छा रहता है।

नवरात्रि के पांचवें दिन मां स्कंदमाता की आराधना की जाती है.माना जाता है कि मां स्कंदमाता को सफेद रंग से बेहद लगाव है. इसलिए उनकी पूजा करते हुए भक्तों को सफेद रंग के कपड़े जरूर पहनने चाहिएं.भक्तों को इस श्रद्धा का फल जरूर मिलता है.

6. देवी कात्यायनी: छठा दिन

देवी कात्यायनी को छठे दिन (षष्ठी) पर पूजा की जाती है, देवी कात्यायनी शक्ति का एक रूप है, जिसे चार भुजाओं वाली और तलवार लिए हुए दिखाया जाता है। भक्त देवी कात्यायनी को प्रसाद के रूप में शहद चढ़ाते हैं। उनका आशीर्वाद उनके जीवन को मिठास से भर देता है और उन्हें कड़वी परेशानियों से छुटकारा दिलाने में मदद करता है।

नवरात्रि के छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा का माना जाता है.मान्यता है कि मां कात्यायनी को लाल रंग काफी प्रिय है.इसे देखते हुए उनका श्रंगार भी लाल रंग के कपडों से किया जाता है.भक्तों को भी मां को प्रसन्न करने के लिए छठे दिन लाल रंग के कपड़े पहनने चाहिए.

7. देवी कालरात्रि: सातवां दिन

नवरात्रि के सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा की जाती है। हिंदू शास्त्रों के अनुसार, देवी कालरात्रि चार भुजाओं वाली देवी हैं। इनका वाहन गर्दभ (गदहा) है। मां कालरात्रि को प्रसन्न करने के लिए भक्त गुड़ या गुड़ से बनी मिठाई का भोग लगाते हैं। इसे दक्षिणा के साथ ब्राह्मणों को प्रसाद में भी दिया जाता है।

नवरात्रि के सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा की जाती है. उन्हें नीला रंग बहुत प्रिय है. उनकी प्रतिमा के वस्त्रों और पूजा के दूसरे सामानों का रंग भी नीला ही रखा जाता है. भक्तों को उनकी आराधना करते हुए नीले रंग के कपड़े धारण करने चाहिए.

8. देवी महागौरी: आठवां दिन

नवरात्रि का आठवां दिन देवी महागौरी को समर्पित है। शास्त्रों के अनुसार, महागौरी को चार भुजाओं वाले देवी के रूप में पूजा जाता है जो बैल या सफेद हाथी पर सवार होती हैं। देवी महागौरी को भक्तों द्वारा नारियल का भोग चढ़ाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि अष्टमी पर ब्राह्मणों को नारियल दान करने से निः संतान दंपति को संतान की प्राप्ति होती है।

नवरात्रि के आठवें दिन मां महागौरी की पूजा की जाती है. उन्हें गुलाबी रंग से बेहद लगाव माना जाता है. इसलिए उन्हें प्रसन्न करने के लिए नवरात्र के आठवें दिन गुलाबी रंग के कपड़े पहनने चाहिए.

9. देवी सिद्धिदात्री: नौवां दिन

नवरात्रि के नौवें दिन, देवी सिद्धिदात्रीकी पूजा की जाती है, जिन्हें कमल पर शांति से बैठे चार भुजाओं के साथ दर्शाया जाता है। उनके पास एक कमल, गदा, चक्र और एक पुस्तक होती है। देवी सिद्धिदात्री पूर्णता का प्रतीक हैं। नवरात्रि के नौवें दिन, भक्त उपवास रखते हैं और भोग के रूप में उन्हें तिल या तिल तेल का चढ़ाते हैं।

नवरात्रि के नौवें और आखिरी दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा-अर्चना की जाती है. माना जाता है कि जामुनी रंग मां सिद्धिदात्री को बहुत भाता है. इसलिए उनकी पूजा करते समय जामुनी रंग के कपड़े) पहनने चाहिए.

अब आप भी 9 दिनों में मां के लिए ये अलग-अलग तरह के भोग बनाकर उन्हें खुश करें। इससे देवी मां की असीम कृपा आप पर बनेगी और आपके काम सिद्ध होंगे।

Note : किसी भी देवी की सिद्धि प्राप्त करने या आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए नवरात्री के दिनों में १ माला प्रतिदिन जाप करे| कात्यायनी देवी की सिद्धि या कृपा प्राप्त करने, शीघ्र विवाह हेतु १ दिन में १०८ माला का जाप करे

नवरात्रि में निषेध वस्तुएँ- Restricted Items During Navratri

प्याज और लहसुन: नवरात्रि के दौरान प्याज और लहसुन का सेवन नहीं किया जाता, क्योंकि इन्हें तामसिक माना जाता है और ये शुभ अवसर के दौरान नहीं खाए जाते।

अल्कोहल: शराब और अन्य अल्कोहोली द्रवियों का सेवन भी नवरात्रि के दौरान नहीं किया जाता, क्योंकि इसे अशुभ माना जाता है।

मांस: नवरात्रि के दौरान मांस का सेवन नहीं किया जाता, क्योंकि यह एक शाकाहारी आहार का समय होता है और भगवान दुर्गा की पूजा के दौरान यह अनुचित माना जाता है।

अभद्र वचन: बुरी भाषा या अशुभ शब्दों का उपयोग भी नवरात्रि के दौरान नहीं किया जाना चाहिए।

नवदुर्गा बीज मंत्र-Nav Durga Beej Mantra

मां शैलपुत्री का बीज मंत्र: “ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं काल्यै नमः।”

मां ब्रह्मचारिणी का बीज मंत्र: “ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्रये नमः।”

मां चंद्रघंटा का बीज मंत्र: “ॐ ऐं व्रीं क्लीं श्रीं चंद्रघण्टायै नमः।”

मां कूष्माण्डा का बीज मंत्र: “ॐ ह्रीं क्लीं हूं ह्रां कूष्माण्डायै नमः।”

मां स्कंदमाता का बीज मंत्र: “ॐ ह्रौं स्क्लीं सौः सौः कारग्रिवस्य बीजपुरायै नमः।”

मां कात्यायनी का बीज मंत्र: “ॐ ह्रीं कात्यायन्यै नमः।”

मां कालरात्रि का बीज मंत्र: “ॐ क्रीं कालरात्र्यै नमः।”

मां महागौरी का बीज मंत्र: “ॐ ऐं नमो महागौर्यै।”

मां सिद्धिदात्री का बीज मंत्र: “ॐ ह्रीं सिद्धिदात्र्यै नमः।”

नवदुर्गा के ध्यान मंत्र: Nav Durga Dhyan Mantra

 नवरात्रि और मां दुर्गा की पूजा में उपयोग किए जाते हैं ताकि भक्त उनकी ध्यान और साकार रूप में आराधना कर सकें। ये मंत्र आपके मानसिक शांति, शक्ति, और साधना को बढ़ावा देने में मदद कर सकते हैं।

मां शैलपुत्री के ध्यान मंत्रShailputri Dhyan Mantra

“वन्दे वाद्द्रिचतलाभिरर्धकुचापारेन्द्रानीम।

रुपां देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।”

मां ब्रह्मचारिणी के ध्यान मंत्रBrahmcharini Dhyan Mantra

“या देवी सर्वभूतेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।”

मां चंद्रघंटा के ध्यान मंत्रChandraganta Dhyan Mantra

“पिण्डजप्रवरारुढ़ा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।

प्रसादं तनुते मह्यम् चंद्रघण्टेति विश्रुता।”

मां कूष्माण्डा के ध्यान मंत्र-Kumanda Dhyan Mantra

“सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।

दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे।”

मां स्कंदमाता के ध्यान मंत्रSkandmata Dhyan Mantra

“सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।

शुभदास्तु सदा देवी स्कंदमाता यशस्विनी।”

मां कात्यायनी के ध्यान मंत्रKatyayani Dhyan Mantra

“चंद्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।

कात्यायनी शुभं दद्याद् देवी दानवघातिनी।”

मां कालरात्रि के ध्यान मंत्रKalratri Dhyan Mantra

“एकवेणी जपाकर्णपूरं तुङ्गे पिङ्गलाध्वजा।

कालरात्रिं शुभं दद्यान् महाकालरात्रिं शुभां गृहे।”

मां महागौरी के ध्यान मंत्रMahagauri Dhyan Mantra

“श्वेते वृषे समारूढ़ा श्वेतांबरधरा शुचिः।

महागौरी शुभं दद्यान् महादेवप्रमोददा।”

मां सिद्धिदात्री के ध्यान मंत्रMaa Siddhidatri Dhyan Mantra

“सिद्धिदात्रीमये देवी सर्वकामप्रदायिनी।

यथा त्वं यथा त्वं कुरु कुरु मां सिद्धयै।”

Navratri 2022:

आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से शारदीय नवरात्रि शुरू होगी। नवरात्र के नौ दिनों में मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। इस साल नवरात्रि 26 सितंबर से शुरू होगी और 5 अक्टूबर को समाप्त होगी। मान्यताओं के अनुसार शारदीय नवरात्र में देवी धरती पर आती हैं और भक्तों को आशीर्वाद देती हैं। इस दौरान भक्त मां आदि शक्ति की कृपा पाने के लिए पूजा और व्रत रखते हैं। नवरात्रि में महाष्टमी और महानवमी तिथि का विशेष महत्व है।

FAQ

नवरात्रि क्या होता है?

नवरात्रि हिन्दू धर्म में मां दुर्गा की पूजा के रूप में मनाया जाने वाला महत्वपूर्ण त्योहार है।

नवरात्रि कब मनाई जाती है?

नवरात्रि वर्ष 2023 में 15 अक्टूबर से शुरू होकर 24 अक्टूबर को समाप्त होगी।

नवरात्रि का क्या महत्व है?

नवरात्रि में मां दुर्गा की नौ दिनों की पूजा करने से भक्त उनके आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

नवरात्रि के दौरान कितने प्रकार की पूजा की जाती है?

नवरात्रि के दौरान, मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है, जिनमें शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, और सिद्धिदात्री शामिल हैं।

नवरात्रि के दौरान रात्रि को कैसे पूजा जाता है?

रात्रि के दौरान, दीप जलाकर मां दुर्गा का आराधना किया जाता है और भजन-कीर्तन किया जाता है।

नवरात्रि के दौरान व्रत क्यों रखा जाता है?

व्रत रखने से भक्त अपनी श्रद्धा और भक्ति के साथ मां दुर्गा की पूजा करते हैं और उनके आशीर्वाद की प्राप्ति करते हैं।


नवरात्रि के दौरान कौन-कौन सी खास खाद्य चीजें खाई जाती हैं?

नवरात्रि के दौरान व्रत के अंतर्गत साबूदाना, कुट्टू के आटे, फल, सिंधाव, और दही जैसी खाद्य चीजें खाई जाती हैं।

नवरात्रि के दौरान दंडिया रास क्या होता है?

दंडिया रास नवरात्रि के दौरान खेले जाने वाले एक पॉपुलर गुजराती नृत्य और संगीत का हिस्सा होता है।

नवरात्रि के दौरान कैसे मां दुर्गा की मूर्ति स्थापित की जाती है?

नवरात्रि के प्रारंभ में, मां दुर्गा की मूर्ति को कलश और मिट्टी के पात्र में स्थापित किया जाता है।

नवरात्रि के दौरान कौन-कौन सी रंगीन पूजाएँ की जाती हैं?

नवरात्रि के दौरान माता की मूर्ति के श्रृंगार के लिए मोतियों या फूलों की माला, साड़ी, चुनरी, कुमकुम, लाल बिंदी, चूड़ियां, सिंदूर, शीशा, मेहंदी, और अन्य रंगीन आभूषण का उपयोग किया जाता है। यह सभी आइटम माता को सुंदरता के साथ सजाने में मदद करती हैं और उनकी पूजा को और भी आकर्षक बनाती है।

मां शैलपुत्री की पूजा कब और कैसे करनी चाहिए?

मां शैलपुत्री की पूजा 15 अक्टूबर 2023 को करनी चाहिए। पूजा में मां की मूर्ति या तस्वीर का स्थापना करें, रंगीन वस्त्र पहनाएं, और फूल और दीपक चढ़ाएं। मां के मंत्रों का जाप करें और व्रत में प्रिय भोग चढ़ाएं।

मां ब्रह्मचारिणी की पूजा के दौरान कौनसे मंत्र पढ़ने चाहिए?

मां ब्रह्मचारिणी की पूजा के समय “ब्रह्मचारिण्यै नमः” मंत्र का जाप करें। इसके साथ, व्रत में दूध, फल, और सिंघाड़े का आटा चढ़ाएं।

मां चंद्रघंटा की पूजा कैसे करें?

मां चंद्रघंटा की पूजा में उनकी मूर्ति को सफेद वस्त्र में धारण करें और चंद्रमा के चिन्ह के साथ पूजन करें। चंद्रघंटा मंत्र का जाप करें और घी, मिष्ठान्न, और फल उनको चढ़ाएं।

मां कुष्मांडा की पूजा में क्या उपासना करें?

मां कुष्मांडा की पूजा में कद्दू की मूर्ति या छायाचित्र का स्थापना करें और कद्दू के बीजों से पूजा करें। कुष्मांडा मंत्र का जाप करें और उनको मिठाई, आलू, और सिंधाड़े का आटा चढ़ाएं।

मां स्कंदमाता की पूजा के दिन कौनसी पूजा करनी चाहिए?

मां स्कंदमाता की पूजा में श्री स्कंदमाता की मूर्ति या तस्वीर को स्थापित करें और उनके मंत्र का जाप करें। उनके पसंदीदा भोग के रूप में मिठाई और फल चढ़ाएं।

मां कात्यायनी की पूजा में कैसे उपासना करें?

मां कात्यायनी की पूजा में उनकी मूर्ति को शुद्ध वस्त्र पहनाकर स्थापित करें और काजल और फूलों की माला पहनाएं। कात्यायनी मंत्र का जाप करें और खीर और मूंगफली का भोग चढ़ाएं।

मां कालरात्रि की पूजा के दौरान क्या सावधानियाँ रखनी चाहिए?

मां कालरात्रि की पूजा के समय विशेष सावधानियाँ रखनी चाहिए। आपको धूप और दीपक के साथ उनकी पूजा करनी चाहिए, और रात के समय जागरूक रहना चाहिए। मां के मंत्रों का जाप करें और व्रत में फल, दूध, और व्रत के खाद्य पदार्थ चढ़ाएं।

मां सिद्धिदात्री की पूजा के दौरान क्या ध्यान देना चाहिए?

मां सिद्धिदात्री की पूजा में उनकी मूर्ति को स्थापित करें और उनके विभूषणों से श्रृंगार करें। सिद्धिदात्री मंत्र का जाप करें और खीर, दूध, और खजूर का भोग चढ़ाएं।

मां महागौरी की पूजा में कौनसे मंत्र पढ़ने चाहिए?

मां महागौरी की पूजा के समय “श्वेते वृषे समारूढ़ा श्वेताम्बरधरा शुचिः” मंत्र का जाप करें। उनको सफेद वस्त्र पहनाएं और शुद्ध दूध चढ़ाएं।

दशहरा के दिन क्या महत्व है?

दशहरा को दुर्गा विसर्जन, विजयादशमी, और शस्त्र पूजन का दिन माना जाता है। इस दिन मां दुर्गा की मूर्ति को नदी या जलाशय में विसर्जन किया जाता है, जिससे उनका विदायी गणेश जी के साथ होता है। इस दिन भगवान राम ने रावण को विजय प्राप्त की थी, इसलिए यह भी विजयादशमी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन शस्त्रों की पूजा भी की जाती है, जिसमें व्यक्ति अपने शस्त्रों को सजाकर पूजते हैं।

प्रथम दिन, देवी शैलपुत्री की पूजा के दौरान, भोग के रूप में कौनसे प्रकार के आहार का सेवन किया जाता है?

प्रथम दिन, देवी शैलपुत्री को शुद्ध देसी घी का भोग चढ़ाया जाता है और मीठी खीर भी उनके लिए बनाई जाती है।

दुसरे दिन, देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा में कौनसे आहार का भोग चढ़ाया जाता है?

दुसरे दिन, देवी ब्रह्मचारिणी को चीनी और फलों का भोग चढ़ाया जाता है।

तीसरे दिन, देवी चंद्रघंटा के पूजा के समय कौनसे प्रकार के आहार का भोग किया जाता है?

तीसरे दिन, देवी चंद्रघंटा को पकवान और शहद का भोग चढ़ाया जाता है।

चौथे दिन, देवी कुष्मांडा की पूजा के दौरान, कौनसे प्रकार के भोग की प्राथमिकता होती है?

चौथे दिन, देवी कुष्मांडा को मालपुआ का भोग चढ़ाया जाता है, और इसे दक्षिणा के साथ ब्राह्मणों को भी दिया जाता है।

पांचवे दिन, देवी स्कंदमाता की पूजा के दौरान, कौनसे भोग का आयोजन किया जाता है?

पांचवे दिन, देवी स्कंदमाता को केले का भोग चढ़ाया जाता है, जो उन्हें खुश करने में मदद करता है।

छठे दिन, देवी कात्यायनी की पूजा के दौरान, कौनसे प्रकार के भोग का सेवन किया जाता है?

छठे दिन, देवी कात्यायनी को गुड़ या गुड़ से बनी मिठाई का भोग चढ़ाया जाता है।

सातवे दिन, देवी कालरात्रि की पूजा के समय, कौनसे प्रकार के आहार का भोग किया जाता है?

सातवे दिन, देवी कालरात्रि को गुड़ या गुड़ से बनी मिठाई का भोग चढ़ाया जाता है, और इसे दक्षिणा के साथ ब्राह्मणों को भी दिया जाता है।

आठवे दिन, देवी महागौरी की पूजा के दौरान, कौनसे प्रकार के आहार का भोग चढ़ाया जाता है?

आठवे दिन, देवी महागौरी को नारियल का भोग चढ़ाया जाता है, और यह भक्तों को संतान की प्राप्ति में मदद करता है।

नौवे दिन, देवी सिद्धिदात्री की पूजा के दौरान, कौनसे प्रकार के भोग का सेवन किया जाता है?

नौवे दिन, देवी सिद्धिदात्री को तिल या तिल तेल का भोग चढ़ाया जाता है, और यह भक्तों को पूर्णता की प्राप्ति में मदद करता है।

देवी शैलपुत्री को किस रंग के कपड़े पहनकर पूजा करना चाहिए?

देवी शैलपुत्री को पीले रंग के कपड़े पहनकर पूजन करने से वे प्रसन्न होती हैं।

देवी चंद्रघंटा को पूजन के दौरान कौन-कौन से कपड़े पहनने चाहिए?

देवी चंद्रघंटा की पूजा के समय भूरा रंग के कपड़े पहनने चाहिए, और उनकी चुनरी भी हरे रंग की होनी चाहिए.

देवी कुष्मांडा को प्रसन्न करने के लिए किस रंग के कपड़े पहनने चाहिए?

देवी कुष्मांडा को नारंगी रंग के कपड़े पहनकर पूजन करने की सिफारिश की जाती है।

देवी स्कंदमाता को प्रसन्न करने के लिए कौन-कौन से कपड़े पहनने चाहिए?

देवी स्कंदमाता की पूजा के समय सफेद रंग के कपड़े पहनने चाहिए।

देवी कात्यायनी की पूजा में किस रंग के कपड़े पहनने चाहिए?

देवी कात्यायनी को लाल रंग के कपड़े पहनकर पूजन करने की सिफारिश की जाती है।

देवी कालरात्रि को प्रसन्न करने के लिए कौन-कौन से कपड़े पहनने चाहिए?

देवी कालरात्रि की पूजा के समय नीला रंग के कपड़े पहनने चाहिए।

देवी महागौरी को प्रसन्न करने के लिए किस रंग के कपड़े पहनने चाहिए?

देवी महागौरी को गुलाबी रंग के कपड़े पहनकर पूजन करने की सिफारिश की जाती है.

देवी सिद्धिदात्री को प्रसन्न करने के लिए किस रंग के कपड़े पहनने चाहिए?

देवी सिद्धिदात्री को जामुनी के कपड़े पहनकर पूजन करने की सिफारिश की जाती है.

Vasumati Yog

Vasumati Yog (वसुमती योग)

परिभाषा: वसुमती योग एक ग्रह योग है जो तब बनता है जब किसी के लग्न से या चन्द्रमा से उपचय भावों (३, ६, १० और ११) में शुभ ग्रह शुभ रूप से स्थित होते हैं।

फल: इस योग के प्रसार में, जातक किसी के ऊपर निर्भर नहीं होता, बल्कि वह काफी धन का स्वामी होता है। किसी भी प्रकार के योग की उपस्तिथि से ही केवल ये नहीं कहा जा सकता है की योग का पूरा फल आपको प्राप्त होगा , इसके लिए ग्रहो का बल और दूसरे ग्रहो की दृष्टि की गणना करना भी आवश्यक है |

विवरण : योग का संबंध अधिकतर धन से होता है, और इस बारे में पाया जाता है कि लग्न से वसुमती योग अधिक प्रभावी होता है, चन्द्रमा से वसुमती योग के इस निहितार्थ का यह भी अर्थ होता है कि दो शुभ ग्रह कम धन देते हैं जबकि एक शुभ ग्रह साधारण धन देता है।

यदि उपचय के ग्रह उच्च के होते हैं, तो योग पूरी तरह बली होता है, हालांकि यदि उपचय के ग्रह नीचे होते हैं, तो विपरीत परिणाम देते हैं। चन्द्रमा से गिनती करते समय, सभी चार उपचय भावों में ग्रह नहीं हो सकते, क्योंकि केवल तीन ही शुभ ग्रह होते है

वराहमिहिर ने इस योग को बेहद गंभीरता से देखा है और इसे सभी योगों में अत्यंत प्रमुख माना है, क्योंकि इसकी भविष्यवाणी कभी गलत नहीं होती है।

Chatu Sagar Yog

Chatu Sagar Yog (चतुः सागर योग)

परिभाषा: चतुः सागर योग एक ग्रह योग है जो तब बनता है जब किसी कुंडली में सभी केन्द्र भावों में ग्रह स्थित होता है।

फल: इस योग के प्रसार में, जातक की प्रसिद्धि होती है, वह शासकों के समान उच्च पद पर होता है, उसकी आयु लम्बी होती है, वह सम्पन्न और धनवान होता है, उसके बच्चे उत्तम होते हैं, उसका स्वास्थ्य अच्छा होता है, और वह चारों सागरों की यात्रा करता है।

किसी भी प्रकार के योग की उपस्तिथि से ही केवल ये नहीं कहा जा सकता है की योग का पूरा फल आपको प्राप्त होगा , इसके लिए ग्रहो का बल और दूसरे ग्रहो की दृष्टि की गणना करना भी आवश्यक है |

विवरण: केन्द्रपति के सिद्धान्त के अनुसार, कुण्डली के केन्द्र में स्थित ग्रह की शक्ति बढ़ती है। कुण्डली के चार कोण किसी भवन की चार दीवारों के समान होते हैं, इसलिए इस परिणाम को ज्यों का त्यों लागू नहीं किया जाना चाहिए।

दसम केन्द्र में स्थित ग्रह सप्तम केन्द्र में स्थित ग्रह से बली होता है; सप्तम केन्द्र में स्थित ग्रह चतुरं केन्द्र में स्थित ग्रह से बली होता है। इसी तरह, चतुर्थ केन्द्र में स्थित ग्रह प्रथम भाव में स्थित ग्रह से बली होता है, हालांकि लग्न का केन्द्र अपवाद होता है।

दशा फल पर विचार करते समय, शुभ और अशुभ स्वामी ग्रहों की स्थिति का विचार करना चाहिए। चतुस्सागर योग में वित्तीय समृद्धि होती है, और उस व्यक्ति का प्रसिद्ध नाम होता है, यह देखने का माध्यम नहीं होता कि वह व्यक्ति शासक है या नहीं।

Adhiyog

Adhiyog(अधियोग)

परिभाषा: अधियोग ज्योतिष शास्त्र में एक महत्त्वपूर्ण योग है जो चन्द्रमा के शुभग्रह से संबंधित है। यदि किसी की कुंडली में चन्द्रमा ६, ७, और १२वें भाव में शुभग्रहों के साथ स्थित होता है, तो उसे अधियोग माना जाता है।

फल: अधियोग के प्रसार में, व्यक्ति नम्र और विश्वासी होता है। उसका जीवन खुशहाल होता है, और वह ऐश और आराम की वस्तुओं से घिरा रहता है। वह अपने शत्रुओं पर विजयी होता है, स्वस्थ रहता है, और उसकी आयु लम्बी होती है।

किसी भी प्रकार के योग की उपस्तिथि से ही केवल ये नहीं कहा जा सकता है की योग का पूरा फल आपको प्राप्त होगा , इसके लिए ग्रहो का बल और दूसरे ग्रहो की दृष्टि की गणना करना भी आवश्यक है |

विवरण: अधियोग को पापाधियोग और शुभाधियोग में बाँटा जाता है, हालांकि कुछ ज्योतिषी इस वर्गीकरण को मान्यता नहीं देते हैं। बराहमिहिर की पुस्तकों के विद्वान व्याख्याकार भट्टोत्पल कहते हैं कि पापाधियोग होता है। वराहमिहिर इसे सौम्य योग मानते हैं, जिसमें वे केवल सौम्य ग्रहों (बुध और बृहस्पति) को लेते हैं। इन ग्रहों को ६, ७, या १२वें भावों में होने की शर्त में देखा जाता है। यदि किसी एक भाव में ग्रह पूर्ण रूप से बली हो, तो व्यक्ति नेता बनता है। दो बली ग्रहों के साथ, वह मंत्री बन सकता है, और तीन बली ग्रहों के साथ, वह जीवन में महत्वपूर्ण पद प्राप्त कर सकता है। अधियोग को राजयोग या इसके बराबर का योग माना जाता है।

Chandra Mangal Yog

Chandra Mangal Yog (चन्द्र-मंगल योग)

परिभाषा: यदि मंगल चन्द्रमा से समानित (संयुक्त) हो तो यह योग बनता है।


फल : कदाचार साधनों से आय, स्त्रियों को बेचने वाला, मां के साथ रूखा और उसके तथा अन्य सम्बन्धियों के साथ दुव्र्व्यवहार करने वाला होगा ।किसी भी प्रकार के योग की उपस्तिथि से ही केवल ये नहीं कहा जा सकता है की योग का पूरा फल आपको प्राप्त होगा , इसके लिए ग्रहो का बल और दूसरे ग्रहो की दृष्टि की गणना करना भी आवश्यक है |

विवरण: ऊपर दिये गये फल प्राचीन लेखकों के अनुसार है। इस विज्ञान के युग में प्राचीन विद्वानों के प्रति आदर भाव रखते हुए मैं यह कहना चाहता हूँ कि किसी व्यक्ति की वित्तीय स्थिति सुदृढ़ बनाने में चन्द्र-मंगल योग का महत्वपूर्ण योगदान होता हैं ।


सामान्यतः आधुनिक युग में ठेका शराब की दुकान, शराबखाना आदि जैसे व्यवसायों से आय होगी। जातक लोगों की मूल आवश्यकताएं पूरी करेगा परन्तु जब चन्द्रमा और मंगल उत्तम स्थिति में हों तो अन्य उचित माध्यमों से आय होगी ।

ऐसा कहा जाता है कि मंगल और चन्द्रमा की युति से यह योग बनता है कि यदि चन्द्रमा और मंगल में परस्पर दृष्टि परिवर्तन हो तो भी यह योग बनता है। मान लें कि चन्द्रमा वृषभ में और मंगल वृश्चिक में है।
चन्द्रमा कर्क में और मंगल मकर में है। यह उत्कृष्ट स्थिति होती है। इस योग से बहुत उत्तम फल होगा यदि यह योग २, ९, १० या ११वें भावों में बनता हो ।

Kemdrum Yog

Kemdrum Yog -केमद्रुम योग

परिभाषा : यदि चन्द्रमा के दोनों ओर कोई ग्रह न हो तो केमद्रुम योग बनता है।

फल: जातक गन्दा, दुखी, अनुचित काम करने वाला, गरीब, दूसरे पर निर्भर, दुष्ट और ठग होगा ।

किसी भी प्रकार के योग की उपस्तिथि से ही केवल ये नहीं कहा जा सकता है की योग का पूरा फल आपको प्राप्त होगा , इसके लिए ग्रहो का बल और दूसरे ग्रहो की दृष्टि की गणना करना भी आवश्यक है |

विवरण : कुछ लेखकों का कहना है कि यदि जन्म लग्न या चन्द्रमा से केन्द्र में ग्रह हों या चन्द्रमा किसी ग्रह से युक्त हो तो केमद्रुम योग नहीं बनता। फिर भी कुछ अन्य लेखकों का मत है कि ये योग केन्द्र और नवांश से बनते हैं किन्तु यह मत सामान्यतः स्वीकार्य नहीं है।


वराहमिहिर इस बात पर जोर देते हैं कि राजकीय परिवारों में पैदा होने वाले व्यक्तियों की कुण्डली में इस प्रकार के योग बनते हों तो उनके मामले में साधारण परिवारों में पैदा होने वाले व्यक्तियों की अपेक्षा अधिक दुर्भाग्य की भविष्यवाणी करनी चाहिए। दुःख का अर्थ शारीरिक तथा मानसिक दुःख होता है । मूलतः नीच शब्द का प्रयोग किया जाता है और इससे ऐसे कामों का सम्बन्ध होता है जो धर्म नैतिकता और सामाजिक व्यवस्था से मना है और इसे अपमानजनक माना जाता है।

Durudhara Yog

Durudhara Yog –दुरुधरा योग

परिभाषा: यदि चन्द्रमा के दोनों ओर ग्रह स्थित हो तो जो योग बनता है उसे दुरुधरा योग कहा जाता है ।


फल : जातक सुन्दर होता है और उसके पास काफी धन और सवारियां होंगी।

किसी भी प्रकार के योग की उपस्तिथि से ही केवल ये नहीं कहा जा सकता है की योग का पूरा फल आपको प्राप्त होगा , इसके लिए ग्रहो का बल और दूसरे ग्रहो की दृष्टि की गणना करना भी आवश्यक है |

विवरण : विभिन्न योगों के लिए निहित फल चाहे जो भी हो, एक महत्त्वपूर्ण सत्य उद्भूत होता है जो यह है कि जातक धन, शक्ति, नाम और प्रसिद्धि अलग-अलग श्रेणी में प्राप्त करता है। वास्तव में यह प्रत्येक योग में लागू नहीं होता है। पाँच ग्रहों के परिवर्तन और संयोजन द्वारा अनेक प्रकार के सुनफा, अनफा और दुरुधरा योग बनते हैं और उनके फलों पर विशेष रूप से ध्यान देना चाहिए ।


यदि दूसरे में मंगल और १२वें में बुध हो तो एक प्रकार का दुरुधरा योग बनता है। इसी प्रकार १२व में मंगल और दूसरे में बुध हो तो अन्य प्रकार का योग बनता है और दूसरे में बृहस्पति तथा १२वें में बुध हो तो एक और अन्य प्रकार का योग बनता है।


यद्यपि इन सबको दुरुधरायोग कहते हैं। इन परिवर्तनों में प्रत्येक संधि में अलग- अलग फल होता है । एक साधारण उदाहरण के रूप में मान लेते हैं कि दूसरे भाव में मकर राशि में मंगल है जहाँ वह उच्च का है और १२वें भाव में वृश्चिक में वृहस्पति अपनी निम्न राशि में है. अब दूसरे भाव में बृहस्पति ( नीच ) को लें और १२वें भाव में मंगल (स्वराशि) को लें, क्या दोनों ही मामलों में फल एक जैसा होगा ?

इन सभी परिवर्तनों का सावधानी पूर्वक विश्लेषण करना चाहिए। मुनफा के ३१ प्रकार हो सकते हैं और अनफा योग के भी इतने ही प्रकार हो सकते हैं और दुरुधरा योग के लगभग १८० प्रकार हो सकते हैं। अधिक विवरण के लिए बृहत्जातक देखें ।

Anfa Yog

Anfa Yog – अनफा योग


परिभाषा : यदि चन्द्रमा से १२ वें भाव मे ग्रह स्थित हो तो अनफा योग बनता है।

Anfa Yog 1


फल: जातक के अंग गठीले मुखाकृति आकर्षक होती है। यह प्रसिद्ध होता है, यह नम्र, उदार, आत्मसम्मानी कपड़ों तथा मनोरंजन का प्रेमी होता है, जीवन के अन्तिम काल में त्यागी और सन्यासी बनता है ।

किसी भी प्रकार के योग की उपस्तिथि से ही केवल ये नहीं कहा जा सकता है की योग का पूरा फल आपको प्राप्त होगा , इसके लिए ग्रहो का बल और दूसरे ग्रहो की दृष्टि की गणना करना भी आवश्यक है |

विवरण: अनफा योग में भी सूर्य को हिसाब में नहीं लिया जाता है । सुनफा के लिये दिए गए विवरण को कुछ अन्तर के साथ यहाँ भी लागू किआ जाता है |

चन्द्रमा से १२ भाव में बृहस्पति और शनि स्थित होने के कारण अनफा योग बनता है। यह योग क्षीण है क्योंकि बृहस्पति नीच का है, यद्यपि नीच भंग है क्योंकि शनि लग्न से केन्द्र में स्थित है । इस योग के अपने हिस्से का फल शनि अपनी दशा में देगा । इस तथ्य को भी ध्यान में रखें कि १२ वें भाव का सम्बन्ध मोक्ष या त्याग से होता है | अतः जातक जीवन के आखिरी काल में सांसारिक वस्तुओं से विरक्त हो जायेगा |

Gandmool Poojan Samgri List

गंडमूल पूजन सामग्री विवरण 

S. N0 पूजन सामग्रीमात्रा
1रोली1 पैकेट
2कलावा5 पैकेट
3सिन्दूरपैकेट
4लौंग108
5इलायची20
6सुपारी15
7गरी गोला1 नग
8शहद50 ग्राम
9इत्र5 ग्राम
10गंगाजल100 ग्राम
11गुलाब जल100 ग्राम
12अबीर- गुलाल100 ग्राम
13हल्दी100 ग्राम
14लाल कपड़ा1.25 मीटर
15पीला कपडा1.25 मीटर
16कलश मिटटी का ढक्कन के साथ1 नग
17सकोरा10 नग
18दिए मिटटी के20 नग
19धूपबत्ती1 पैकेट
20रूईबत्ती1 पैकेट
21कपूर100 ग्राम
22देशी घी500 ग्राम
23जनेऊ-यज्ञोपवित5 नग
24पीली सरसो100 ग्राम
25पंचमेवा100 ग्राम
26सप्तमातृका2 नग
27सप्तधान्य1 किलो
28पंचरत्न1 नग
29सर्वौषधि1 पैकेट
30दोना20 नग
31माचिस1 नग
32रंग- लाल, हरा, पीला, काला,2-2पुड़िया
33झंडा- हनुमान जी का1 नग
34सत्ताईस वृक्षों के पत्ते4-4 नग
35सत्ताईस नक्षत्र हवन समिधा1 पैकेट
36सत्ताईस कुओ का पानी500 ग्राम
37सत्ताईस किलो अनाज1 नग
38सत्ताईस कुल्हड़1 नग
39सत्ताईस छिद्रो वाला कलश1 नग
40सत्ताईस प्रकार की औषधि1 नग
41कम्बल या चद्दर1 नग
42चाँदी की गाय- अथवा गौदान1 नग
43ब्रह्मपूर्ण पात्र- धातु पात्र ( भगोना ) – ५ किलो1 नग
44कटोरा- छाया दान हेतु1 नग
45नवग्रह समिधा1 पैकेट
46हवन सामग्री500 ग्राम
47आम की समिधा3 किलो
48हवन कुंड- लोहे का इस्तेमाल न करे1 नग
49लकड़ी की चौकी1 नग
50लकड़ी का पीठा1 नग
51आम का पत्ता50 नग
52फूल माला5 नग
53खुले फूल500 ग्राम
54फल – ५ प्रकार के500 ग्राम
55मिठाई – ५ प्रकार की500 ग्राम
56पान के पत्ते20 नग
57दूध500 ग्राम
58दही500 ग्राम
59नारियल पानी वाला1 नग

गण्ड मूल योग में जन्मे जातक का भविष्य और उपाय :

गण्ड मूल को शास्त्रों में गण्डान्त की संज्ञा प्रदान की गई है। यह एक संस्कृत भाषा का शब्द है गण्ड का अर्थ निकृष्ट से है एवं तिथि लग्न व नक्षत्र का कुछ भाग गण्डान्त कहलाता है। मूलत: अश्विनी, अश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल व खेती ये छः नक्षत्र गण्डमूल कहे जाते हैं। इनमें चरण विशेष में जन्म होने पर भिन्न-भिन्न फल प्राप्त होते है। इन नक्षत्र चरणों में यदि किसी जातक का जन्म हुआ हो तो, जन्म से 27वें दिन में जब पुनः वही नक्षत्र आ जाता है तब विधि विधान पूर्वक पूजन एवं हवनादि के माध्यम से इनकी शान्ति कराई जाती है।

क्या है गंडांत योग :

तिथि गन्डान्त- पूर्णातिथि (5, 10, 15) के अंत की घड़ी, नंदा तिथि (1, 6, 11) के आदि में 2 घड़ी कुल मिलाकर 4 तिथि को गंडांत कहा गया है। प्रतिपद, षष्ठी व एकादशी तिथि की प्रारम्भ की एक घड़ी अर्थात प्रारम्भिक 24 मिनट एवं पूर्णिमा, पंचमी व दशमी तिथि की अन्त की एक घड़ी, तिथि गन्डान्त कहलाता है।

नक्षत्र गण्डान्त- इसी प्रकार रेवती और अश्विनी की संधि पर, आश्लेषा और मघा की संधि पर और ज्येष्ठा और मूल की संधि पर 4 घड़ी मिलाकर नक्षत्र गंडांत कहलाता है। इसी तरह से लग्न गंडांत होता है। खेती, ज्येष्ठा व अश्लेषा नक्षत्र की अन्त की दो दो घडि़यां अर्थात 48 मिनट अश्विनी, मघा व मूल नक्षत्र के प्रारम्भ की दो दो घडि़यां, नक्षत्र गण्डान्त कहलाती है।

लग्न गण्डान्त- मीन लग्न के अन्त की आधी घड़ी, कर्क लग्न के अंत व सिंह लग्न के प्रारम्भ की आधी घड़ी, वृश्चिक लग्न के अन्त एवं धनु लग्न की आधी-आधी घड़ी, लग्न गण्डान्त कहलाती है। अर्थात मीन-मेष, कर्क-सिंह तथा वृश्चिक-धनु राशियों की संधियों को गंडांत कहा जाता है। मीन की आखिरी आधी घटी और मेष की प्रारंभिक आधी घटी, कर्क की आखिरी आधी घटी और सिंह की प्रारंभिक आधी घटी, वृश्चिक की आखिरी आधी घटी तथा धनु की प्रारंभिक आधी घटी लग्न गंडांत कहलाती है। इन गंडांतों में ज्येष्ठा के अंत में 5 घटी और मूल के आरंभ में 8 घटी महाअशुभ मानी गई है। यदि किसी जातक का जन्म उक्त योग में हुआ है तो उसे इसके उपाय करना चाहिए।

क्या होता है : ज्येष्ठा नक्षत्र की कन्या अपने पति के बड़े भाई का विनाश करती है और विशाखा के चौथे चरण में उत्पन्न कन्या अपने देवर का नाश करती है। आश्लेषा के अंतिम 3 चरणों में जन्म लेने वाली कन्या या पुत्र अपनी सास के लिए अनिष्टकारक होते हैं तथा मूल के प्रथम 3 चरणों में जन्म लेने वाले जातक अपने ससुर को नष्ट करने वाले होते हैं। अगर पति से बड़ा भाई न हो तो यह दोष नहीं लगता है। मूल नक्षत्र के प्रथम चरण में पिता को दोष लगता है, दूसरे चरण में माता को, तीसरे चरण में धन और अर्थ का नुकसान होता है। चौथा चरण जातक के लिए शुभ होता है।

गंडांत दोष के उपाय : गंडांत योग में जन्म लेने वाले बालक के पिता उसका मुंह तभी देखें, जब इस योग की शांति हो गई हो। इस योग की शांति हेतु किसी पंडित से जानकर उपाय करें। गंडांत योग को संतान जन्म के लिए अशुभ समय कहा गया है। इस योग में संतान जन्म लेती है तो गण्डान्त शान्ति कराने के बाद ही पिता को शिशु का मुख देखना चाहिए। पराशर मुनि के अनुसार तिथि गण्ड में बैल का दान, नक्षत्र गण्ड में गाय का दान और लग्न गण्ड में स्वर्ण का दान करने से दोष मिटता है। संतान का जन्म अगर गण्डान्त पूर्व में हुआ है तो पिता और शिशु का अभिषेक करने से और गण्डान्त के अंतिम भाग में जन्म लेने पर माता एवं शिशु का अभिषेक कराने से दोष कटता है।

ज्येष्ठा गंड शांति में इन्द्र सूक्त और महामृत्युंजय का पाठ किया जाता है। मूल, ज्येष्ठा, आश्लेषा और मघा को अति कठिन मानते हुए 3 गायों का दान बताया गया है। रेवती और अश्विनी में 2 गायों का दान और अन्य गंड नक्षत्रों के दोष या किसी अन्य दुष्ट दोष में भी एक गाय का दान बताया गया है।

पाराशर होरा ग्रंथ शास्त्रकारों ने ग्रहों की शांति को विशेष महत्व दिया है। फलदीपिका के रचनाकार मंत्रेश्वरजी ने एक स्थान पर लिखा है कि-

दशापहाराष्टक वर्गगोचरे, ग्रहेषु नृणां विषमस्थितेष्वपि।

जपेच्चा तत्प्रीतिकरै: सुकर्मभि:, करोति शान्तिं व्रतदानवन्दनै:।।

अर्थात जब कोई ग्रह अशुभ गोचर करे या अनिष्ट ग्रह की महादशा या अंतरदशा हो तो उस ग्रह को प्रसन्न करने के लिए व्रत, दान, वंदना, जप, शांति आदि द्वारा उसके अशुभ फल का निवारण करना चाहिए।

Gandmool Nakshtra List

अश्विनी, आश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल और रेवती से ये 6 नक्षत्र गण्डमूल कहलाते हैं।

इन नक्षत्रों में जन्मा हुआ बालक माता-पिता, कुल और अपने शरीर को नष्ट करता है। स्वयं का शरीर नष्ट न हो तो धन, वैभव, ऐश्वर्य तथा घोड़ों का स्वामी होता है। गण्डमूल में जन्में हुए बालक का मुख 27 दिन तक पिता न देखे। प्रसूतिस्नान के पश्चात् शुभ बेला में बालक का मुख देखना चाहिए। उपरोक्त गण्डमूल के चारों चरणों में से जिस चरण में बच्चा पैदा हो, उसका विशेष फल निम्न चक्र से मालूम कर ले

Sunfa Yog

Sunfa-Yog-सुनफा योग

परिभाषा – यदि चन्द्रमा से दूसरे भाव में ग्रह हों (सूर्य को छोड़कर) तो सुनफा योग बनता है।

फल – जातक के पास स्वअर्जित सम्पत्ति होगी। वह राजा, शासक या उसके समतुल्य, तेज बुद्धि वाला, घनी और प्रसिद्ध होगा। किसी भी प्रकार के योग की उपस्तिथि से ही केवल ये नहीं कहा जा सकता है की योग का पूरा फल आपको प्राप्त होगा , इसके लिए ग्रहो का बल और दूसरे ग्रहो की दृष्टि की गणना करना भी आवश्यक है |

व्याख्या: सुनफा योग में और निम्नलिखित दो योगों में चन्द्रमा का काफी महत्त्वपूर्ण हाथ होता है। दूसरे भाव में सूर्य के सिवाय ग्रहों का होना आवश्यक हैं  दूसरे भाव में मंगल, बुध, वृहस्पति, शुक्र और शनि अकेले या एक साथ हो सकते हैं । पुनः इस योग का स्वरूप मुख्यतः दूसरे भाव में स्थित अधिपतियों के स्वभाव पर अधिक सीमा तक निर्भर करता है ।

इस प्रकार मान लिया जाय कि चन्द्रमा वृषभ राशि में है और बुध, वृहस्पति और शुक्र दूसरे भाव में है। यह एक प्रबल सुनफा योग है जो काफी धन देता है। इस मामले में यदि लग्न भाव में सिंह राशि हो तो इस योग की गहनता अधिक होगी क्योंकि योग का सम्बन्ध १० वें और ११ वें भावों से होगा । योग बनाने के लिए जिम्मेदार ग्रहों की दशा और मुक्ति में इस योग के फल प्राप्त होंगे है |

Vrat Tyohar Oct 2023

Vrat Tyohar Oct 2023

2 अक्टूबर 2023,सोमवार : महात्मा गांधी जयंती, संकष्टी चतुर्थी व्रत

4 अक्टूबर 2023, बुधवार : रोहिणी व्रत, छठा श्राद्ध

6 अक्टूबर 2023, शुक्रवार : श्री महालक्ष्मी व्रत समाप्त, जीवित्पुत्रिका व्रत

9 अक्टूबर 2023, सोमवार : एकादशी श्राद्ध

10 अक्टूबर 2023, मंगलवार : मघा श्राद्ध, इंदिरा एकादशी

11 अक्टूबर 2023, बुधवार : प्रदोष व्रत

12 अक्टूबर 2023, गुरुवार : मासिक शिवरात्रि

14 अक्टूबर 2023,शनिवार : सर्वपितृ अमावस्या, सूर्य ग्रहण

15 अक्टूबर 2023, रविवार : शारदीय नवरात्रि प्रारंभ, महाराजा अग्रसेन जयंती

18 अक्टूबर 2023, बुधवार : तुला संक्रांति, विनायक चतुर्थी

19 अक्टूबर 2023, गुरुवार : उपांग ललिता व्रत

20 अक्टूबर 2023, शुक्रवार : सरस्वती आवाहन, स्कंद षष्ठी

21 अक्टूबर 2023, शनिवार : सरस्वती पूजन

22 अक्टूबर 2023,रविवार : सरस्वती बलिदान, सरस्वती विसर्जन, श्री दुर्गाष्टमी

23 अक्टूबर 2023, सोमवार : महानवमी, शारदीय नवरात्रि का समापन , बंगाल महानवमी

24 अक्टूबर 2023, मंगलवार : नवरात्रि पारणा, दुर्गा विसर्जन, विजयदशमी, बुद्ध जयंती

25 अक्तूबर 2023,बुधवार : पापांकुशा एकादशी

26 अक्टूबर 2023, गुरुवार : प्रदोष व्रत, कोजागर पूजा

28 अक्टूबर 2023, शनिवार : शरद पूर्णिमा व्रत, महर्षि वाल्मिकी जयंती, खण्डग्रास चंद्रग्रहण, कार्तिक स्नान प्रारंभ, मीराबाई जयंती, अश्विन पूर्णिमा

29 अक्टूबर 2023, रविवार : कार्तिक मास आरंभ, चंद्र ग्रहण

गजकेसरी योग

गजकेसरी योग-GajKesari Yog

परिभाषा – यदि चन्द्रमा से केन्द्र में बृहस्पति हो तो गजकेसरी योग बनता है ।

फल – जातक के सम्बन्धी अनेक होंगे, वह नम्र और उदार स्वभाव का होगा । वह गाँव या शहर का निर्माण करेगा या उनके ऊपर शासन करेगा; मृत्यु के बाद भी उसकी प्रसिद्धि बनेगी । किसी भी प्रकार के योग की उपस्तिथि से ही केवल ये नहीं कहा जा सकता है की योग का पूरा फल आपको प्राप्त होगा , इसके लिए ग्रहो का बल और दूसरे ग्रहो की दृष्टि की गणना करना भी आवश्यक है |

व्याख्या – यहाँ और अन्यत्र फलों की प्राप्ति में काफी अन्तर की व्याख्या कर देनी चाहिये । लेखक कहते हैं कि इस योग में उत्पन्न व्यक्ति गाँव या शहरों का निर्माण करेगा। इन फलों की शाब्दिक व्याख्या से किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता ।

उन्हें आधुनिक स्थिति और देश के अनुसार अपनाना चाहिए। इस योग में उत्पन्न व्यक्ति नगर पालिका का सदस्य बन सकता है, इंजीनियर बन सकता है या यदि योग वास्तव में प्रबल है तो मेयर बन सकता है।

किसी योग के निर्धारित फल में योगकारक के बली और निर्बल होने के अनुसार संशोधन करना चाहिये । गाँव से जिला में मजिस्ट्रेट होते हैं और उनके अलग-अलग अधिकार होते हैं । एक छोटे से पुण्य स्मारक के निर्माण और बड़े मन्दिर के निर्माण में काफी अन्तर है।

योग दिया जाता है किन्तु ग्रहों, भावों और नक्षत्रों के बल के अनुसार योग के फलों में अन्तर हो जाता है।

सवाल 1: परिभाषा क्या है – यदि चन्द्रमा से केन्द्र में बृहस्पति हो तो गजकेसरी योग बनता है?

उत्तर: गजकेसरी योग का अर्थ होता है कि जन्मकुंडली में चन्द्रमा के केन्द्र में और बृहस्पति के साथ होने पर यह योग बनता है।

सवाल 2: इस योग का क्या फल होता है?

उत्तर: जब गजकेसरी योग बनता है, तो जातक नम्र और उदार स्वभाव का होता है। वह गाँव या शहर का निर्माण कर सकता है या उनके ऊपर शासन कर सकता है। मृत्यु के बाद भी उसकी प्रसिद्धि बढ़ती

सवाल 3: इस योग के फलों की अभ्युक्तियाँ क्या हैं?

उत्तर: गजकेसरी योग के फलों की अभ्युक्तियाँ किसी निष्कर्ष पर पहुंचना मुश्किल हो सकता है। इसके फल उत्पन्न व्यक्ति के आधुनिक स्थिति और उनके देश के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं।

सवाल 4: इस योग में उत्पन्न व्यक्ति क्या बन सकता है?

उत्तर: इस योग में उत्पन्न व्यक्ति नगर पालिका का सदस्य बन सकता है, इंजीनियर बन सकता है या यदि योग वास्तव में प्रबल है तो मेयर बन सकता है। इसका फल उनके कार्य और प्रयासों पर भी निर्भर करता है।

सवाल 5: क्या इस योग के फलों में योगकारक के बल का महत्व होता है?

उत्तर: हाँ, किसी योग के निर्धारित फल में योगकारक के बल के अनुसार संशोधन किया जा सकता है। यह दिखाता है कि गजकेसरी योग के प्रत्येक प्राणी के लिए विशेष फल हो सकते हैं।

सवाल 6: इस योग के फलों में ग्रहों, भावों, और नक्षत्रों का क्या महत्व है?

उत्तर: योग दिया जाता है किन्तु ग्रहों, भावों, और नक्षत्रों के बल के अनुसार योग के फलों में अन्तर हो सकता है। ग्रहों की स्थिति और बल योग के प्रभाव को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण होते हैं।

सवाल 7: क्या इस योग के फल व्यक्ति की व्यक्तिगत गुणों पर भी निर्भर हो सकते हैं?

उत्तर: हाँ, गजकेसरी योग के फल व्यक्ति की व्यक्तिगत गुणों पर भी निर्भर हो सकते हैं। यह योग केवल जन्मकुंडली के भिन्न प्रतिभागों के साथ व्यक्ति की पूर्ण प्रोफ़ाइल पर प्रभाव डालता है।

सवाल 8: गजकेसरी योग का योगकारक क्या होता है?

उत्तर: गजकेसरी योग का योगकारक चन्द्रमा होता है, क्योंकि इसमें चन्द्रमा का केन्द्रीय भावों में बल बढ़ जाता है।

सवाल 9: इस योग के फलों के लिए किस तरह की नक्षत्रों का महत्व होता है?

उत्तर: गजकेसरी योग के फलों के लिए व्यक्ति के जन्मकुंडली में चन्द्रमा के साथ बृहस्पति की स्थिति और नक्षत्र का महत्वपूर्ण होता है। यह योगकारक के बल को प्रभावित करता है।

सवाल 10: क्या इस योग के फलों में साप्ताहिक या मासिक ग्रहों का भी प्रभाव होता है?

उत्तर: हाँ, साप्ताहिक और मासिक ग्रहों का भी प्रभाव इस योग के फलों पर होता है, क्योंकि यह जन्मकुंडली में समय के साथ परिवर्तन कर सकते हैं और योग के प्रभाव को मोड़ सकते हैं।

Match Making Astrology

Match Making Astrology & Rules-कुंडली मिलान ज्योतिष और नियम

“जानिए कुंडली मिलान के महत्व को और अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए कैसे करें।”

सुन्दर विचार, शिष्टाचारवाली स्त्री धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को देनेवाली होती है। ऐसा आचरण जन्म लग्न, नक्षत्र, ग्रह के वश में होता है। इसलिए विवाह-समय में इसका विचार कर लेना आवश्यक है। क्योंकि पुत्र (सन्तान), स्वभाव, आचरण, धर्म ये गृहलक्ष्मी पर निर्भर करता है।

विवाह-योग का प्रश्न विचार -Consideration of Marriage Yoga:

स्वस्थ-चित्त बैठे ज्योतिषी की धनादि से पूजा करके प्रश्न करना चाहिए। प्रश्नकाल में यदि चन्द्रमा 10/11/3/7 या 5 वें स्थान में से किसी एक स्थान में हो और गुरु से देखा जाता हो अथवा प्रश्न- लग्न में वृष, तुला या कर्क लग्न हो और शुभ ग्रह से देखा जाता हो, तो शीघ्र विवाह का योग समझना चाहिए। प्रश्नकाल में चन्द्रमा और शुक्र यदि विषम राशि या विषम राशि के नवांश में बली होकर लग्न को देखता हो तो वर को स्त्री तथा कन्या को पति शीघ्र प्राप्त होगा शुक्र, चन्द्रमा यदि सम राशि नवांश में हो और बली होकर लग्न को देखता हो तो वर को शीघ्र स्त्री-लाभ कराता है।

विवाह भंग योग-Marriage Cancellation Yoga

कृष्ण पक्ष का चन्द्रमा यदि प्रश्न लग्न से समसंख्यक राशि में हो; पाप ग्रह से देखा जाता हो अथवा छठें या आठवें स्थान में हो तो विवाह पक्का नहीं होने देता।

बाल-विधवा योग परिहार-Remedies for Child Widowhood Yoga

जन्म-काल या प्रश्न-काल से विधवा-योग देखकर कन्या को सावित्री या पीपल व्रत कराकर, शुभ लग्न में विष्णु भगवान् की मूर्ति या पीपल वृक्ष, कदली या कुम्भ-विवाह कराकर किसी चिरंजीवि वर के साथ व्याह दें। इसमें पुनर्विवाह का दोष नहीं लगता है। यह धर्मशास्त्र का कथन है। कुम्भादि विवाह गुप्त करना चाहिए।

सन्तान भेद से जन्म-मासादि फल-The Effects of Child Discrimination on Birth Month and Other Factors

जन्म मास, जन्म नक्षत्र, जन्म तिथि में प्रथम सन्तान (पुत्र, अथवा कन्या) का विवाह शुभ नहीं होता है। द्वितीय गर्भ से उत्पन्न सन्तान का विवाह उक्त समय में सन्तति देने वाला होता है। ऐसा विद्वानों का विचार है।

विवाह में विशेष विचार-Special Considerations in Marriage

लड़के के विवाह के बाद छः महीने के भीतर लड़की का विवाह नहीं करना चाहिए। लड़की के विवाह के बाद छः महीने तक अपने कुल में किसी का मुण्डन नहीं कराना चाहिए। दो सहोदरों को, दो सहोदर कन्या नहीं व्याहनी चाहिए। छः माह के भीतर दो सहोदर या दो सहोदर कन्याओं का विवाह शास्त्र वर्जित है।

गणना क्यों देखी जाती है-Why is Astrological Compatibility Checked?

प्राचीन युग के लोग शास्त्र पर आँख मूँद कर विश्वास कर लेते थे। लेकिन आधुनिक युग में मेलापक विषय का वैज्ञानिक रहस्य बतलाना आवश्यक है। तभी इस पर संसार विश्वास कर सकता है। भारत आर्यों का निवास-स्थान और पुण्य-भूमि है। प्राचीनकाल में यहाँ का मानव-समाज ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य, वानप्रस्थ और संन्यास इन्हीं चार आश्रमों में विभक्त था। अन्य तीन आश्रम गृहस्थाश्रम पर ही निर्भर रहते थे। गृहस्थाश्रम का प्रथम सोपान विवाह ही है। यह विवाह मंगलदायक हो तो गृहस्थाश्रम सुखपूर्वक व्यतीत हो जाता है। दाम्पत्य-जीवन के सुखपूर्वक निर्वाह होने की जानकारी के लिए ही नक्षत्र और ग्रह मेलापक किया जाता है।

नवग्रह और दसवाँ ग्रह पृथ्वी एक-दूसरे क आकर्षण से शून्य में टिके हुए हैं। मनुष्य पृथ्वी पर है। अतः अन्य नवग्रहों के आकर्षण का प्रभाव मनुष्यों पर भिन्न-भिन्न रूप से पड़ता है। मनुष्य स्वयं कुछ भी नहीं करते हैं, वरन् यह ग्रहों के आकर्षण का प्रभाव ही उन्हें प्रभावित करता है और मनुष्य उसी के अनुसार कार्य भी करते हैं। मनुष्य का शरीर जिससे बना है उन तत्त्वों के साथ ग्रहों का सम्बन्ध है। अतः जो ग्रह बुरा प्रभाव वाला होता है तो मनुष्य भी बुरा काम कर बैठता है और उन तत्त्वों में बड़बड़ी हो जाती है। वर-वधू के नक्षत्र और ग्रहों में कैसा आकर्ष है तथा इसका प्रभाव क्या होता है, इसको जानने के लिए ही नक्षत्र और ग्रह मिलाये जाते हैं।

कुण्डली मिलाने की रीति-The Process of Horoscope Matching

स्त्री-नाशक या पति नाशक जो योग हैं, उन योगों के अनुसार पति के ग्रहों का प्रबल होना आवश्यक है। कुण्डली में लग्न, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम और द्वादश में पाप ग्रह का होना प्रायः पति- नाशक या पत्नी-नाशक है। इसमें पति को मंगला और स्त्री को मंगली कहते हैं।

इसके लिए पण्डितों का अनुभव है कि, सबसे अधिक दोषकारक मंगल, उससे कम बाकी पाप ग्रह होते हैं। इस योग को चन्द्रमा, शुक्र और सप्तमेश से भी देखना चाहिए। द्वितीय, सप्तम भावों में भी पाप योग होता है। स्त्री की कुण्डली में सप्तम, अष्टम स्थान में शुभ योग होना सौभायवर्द्धक है। सप्तमेश अष्टमेश का योग अथवा अष्टमेश का सप्तमेश में होना भी उसी प्रकार का योग होता है । सन्तान प्रतिबन्धक योग भी प्रायः वैधव्य- सूचक होते हैं। एकादश या पञ्चम में भी विशेष पाप योग वैधव्यसूचक होता है। इन योगों के विचार से यदि ग्रह प्रबल पड़े तो वह विवाह करना योग्य है। इसके बाद आयु, सन्तान और भाग्य योग को देखना युक्तिसंगत है।

प्रश्न- लग्न या जन्म लग्न से स्त्री की कुण्डली में छठें या आठवें चन्द्रमा हों, लग्न में चन्द्रमा और सातवें पाप ग्रह हों, लग्न में चन्द्रमा और सातवें मंगल हो तो भी वैधव्य कारक योग होता है। यदि कन्या का प्रबल वैधव्य योग हो तो अश्वत्थ विवाह, कुम्भ विवाह या विष्णु प्रतिमादि के साथ विवाह करके चिरंजीवि वर के साथ विवाह किया जाय तो पुनर्विवाह का दोष नहीं होता। परन्तु यह काम गुप्त करना चाहिए। सप्तमेश, षष्ठ, सप्तम, नवम, अष्टम, द्वादश में पापयुक्त हो तो भी सौभाग्य के लिए अनिष्टप्रद होता है। सप्तमेश का पञ्चम भाव में होना भी अच्छा नहीं होता। ज्योतिष-फलित शास्त्र में दो ही वस्तुओं की अधिक प्रधानता है-लग्न और चन्द्रमा। लग्न को शरीर और चन्द्रमा को मन कहते हैं। प्रेम मन से होता है, शरीर से नहीं। अतएव जन्म-राशि के वश मेलापक विचार किया जाता है। गणना जन्म नाम से देखी जाती है।

विवाह, यात्रा, उपनयन, चूडाकरण (मुण्डन), गोवर- विचार, मंगल कृत्य इत्यादि कार्यों में जन्म-नाम ही प्रधान है। जन्म-नाम न मिलने पर प्रसिद्ध नाम से गणना देखनी चाहिए। प्रसिद्ध नाम कई हों तो अन्तिम नाम ग्रहण कर गणना देखने का विधान है। किसी का जन्म और प्रसिद्ध दोनों नाम हो और दूसरे का केवल प्रसिद्ध ही नाम हो तो मेलापक प्रसिद्ध नाम से और सूर्य-गुरु- चन्द्रमा के बल जन्म-नाम से देखना उत्तम है। एक का प्रसिद्ध नाम और दूसरे का जन्म-नाम ग्रहण कर मेलापक विचार करने का विधान नहीं है। वर- कन्या यदि एक ही गोत्र के हों तो विवाह नहीं करना चाहिए।

विवाह के मास-The Months Suitable for Marriage

मिथुन, कुम्भ, मकर, वृश्चिक, वृष, मेष इन राशियों के सूर्य में विवाह शुभ होता है। मिथुन का सूर्य आषाढ़ शुक्ल 10 तक शुभ है। वृश्चिक के सूर्य होने पर कार्तिक में, मेष का सूर्य होने से चैत्र में, मकर का सूर्य होने पर पौष में विवाह शुभ होता है।

विवाह मुहूर्त-Marriage Auspicious Time

नक्षत्र – तीनों उत्तरा, रोहिणी, मृगशिरा, मघा, मूल, अनुराधा, हस्त एवं स्वाती । लग्न – कन्या, तुला, और मिथुन । मास- फाल्गुन, माघ, मार्गशीर्ष, आषाढ़, ज्येष्ठ और वैशाख । दिन- भौम तथा शनि को छोड़कर शेष शुभ दिन। तिथि- रिक्ता तथा अमावस्या को छोड़कर विवाह शुभ है।

नौ ताराओं के नाम-Names of the Nine Planets

जन्म-नक्षत्र से दिन नक्षत्र तक संख्या गिनकर 9 का भाग देने से शेष 1. जन्म, 2. सम्पत्, 3. विपत्, 4. क्षेम, 5. प्रत्यरि, 6. साधक, 7. वध, 8. मैत्र, 9. अतिमैत्र। ये नौ ताराओं के नाम हैं।

दुष्टतारा दान-Malefic Planetary Donation

वध में स्वर्ण तथा तिल, विपत् में गुड़, जन्म में शाक तथा प्रत्यरि में लवण (नमक) दान करना चाहिए।

नोट : प्रत्येक तारा की तीन आवृति होती है। पहली आवृत्ति में विपत् का प्रथम, प्रत्यरि का चतुर्थ, वध का तृतीय चरण शुभ होता है, बाकी सब अशुभ। तीसरी आवृत्ति में सभी ताराएँ शुभ होती है।

रवि-चन्द्र-गुरु शुद्धि-Sun-Moon-Jupiter Conjunction

रवि : जन्म राशि से 3/6/10/11वें रवि शुभ हैं। यदि रवि 13 अंश से अधिक हो तो 2/5/9 राशि में भी शुभ है।

चन्द्र : 1/3/6/7/10/11 वें स्थान में चन्द्रमा शुभ होता है। 2/5/9 शुक्लपक्ष में शुभ होता है। 4/8/12 अशुभ है।

गुरु : 2/5/7/9/11 वें स्थान में शुभ होता है। 10/6/3/1 इनमें शान्ति करने पर शुभ तथा 4/ 8/12 में अशुभ होता है। बालक का यज्ञोपवीत, कन्या तथा वर के विवाह में शुभ-अशुभ विचार करना आवश्यक है। गुरु अपने उच्च राशि, मित्र गृह तथा अपने नवांश में रहे तो अशुभ भी शुभ होता है। नीच राशि या शत्रु गृह में शुभ भी अशुभ होता है। बाकी सब ग्रह रवि, चन्द्र आदि अपने उच्च स्थान पर रहने पर अनिष्ट स्थान में भी शुभ फल देते हैं।

वर्ण-विचार-Caste Consideration

कर्क, मीन, वृश्चिक, ब्राह्मण वर्ण । मेष, सिंह, धनु, क्षत्रिय । कन्या, वृष, मकर वैश्य । मिथुन, तुला, कुम्भ शूद्र वर्ण होते हैं। वर-कन्या का वर्ण एक होवे या वर का वर्ण कन्या के वर्ण से हमेशा श्रेष्ठ होना चाहिए।

गणादि-दोष- परिहार-Remedies for Gana Dosha

राशि स्वामियों में मैत्री हो या अंश-स्वामी में मैत्री हो, तो गणादि दुष्ट रहने पर विवाह पुत्र-पौत्र को बढ़ाने वाला होता है।

राशि-कूटZodiac Sign Compatibility

वर की राशि से कन्या की राशि तक और कन्या की राशि से वर की राशि तक गिनने पर 6/8 में दोनों की मृत्यु, 9/5 में सन्तान हानि और 2/12 में दरिद्रता होती है।

दुष्ट- भकूट- परिहार -Remedies for Malefic Bhakoot Dosha:

वर कन्या की राशि के स्वामी एक ही ग्रह हों अथवा दोनों राशियों मैत्री हो, नाड़ी, नक्षत्र शुद्ध होने पर दुष्ट भकूट ग्रह नहीं होता है।

नाड़ी-विचार-Consideration of Nadis(Pulse) :

वर-कन्या की एक नाड़ी में विवाह वर्जित है। मध्य नाड़ी मृत्यु तथा भिन्न नाड़ी शुभ होता है।

विशेष-Special : ब्राह्मण को नाड़ी-दोष, क्षत्रियों को वर्णदोष, वैश्यों को गण-दोष और शूद्रों को योनि-दोष विचार करना चाहिए।

किसी आचार्य ने नक्षत्र मेलापक के दस, किसी ने बारह और किसी अठारह भेद माने हैं, परन्तु सर्व- प्रसिद्ध निम्नलिखित ये ही आठ भेद हैं- 1. वर्ण, 2. वश्य, 3. तारा नक्षत्र, 4. योनि, 5. ग्रहमैत्री, 6. गण, 7. भकूट या राशिकूट, 8. नाड़ी। इन आठों में शास्त्रकारों ने नाड़ी पर अधिक जोर दिया है। इस तथ्य का पता आगे नाड़ी-विवेचन में लगेगा।

वर्ण-Caste :

सामाजिक वर्णों की तरह इसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ये ही चार वर्ण होते हैं। उच्च वर्ण में ऊँचे होने का भाव रहता है जैसे, क्षत्रिय वर्ण के मनुष्य पर यदि शूद्र वर्ण का मनुष्य प्रभाव दिखाना चाहे तो वह क्षत्रिय उसका शीघ्र शमन कर देगा। इसी प्रकार यदि ब्राह्मण या क्षत्रिय वर्ण की कन्या हो और शूद्र वर्ण का वर हो तो वह कन्या उच्च वर्ण की होने से सदा वर को दबाती रहेगी। इस तरह स्त्री-पुरुष का जीवन गृहस्थाश्रम में सुखपूर्वक व्यतीत नहीं हो सकता। इसी झगड़े से बचने के लिए ‘वर्ण’ का विचार किया जाता है।

वश्य-Vasya :

वश्य से विचार किया जाता है कि, स्त्री पति के अधीन में रहने वाली है या नहीं। वास्तव में स्त्री का पति के अधीन रहना भी आवश्यक है। शास्त्र में लिखा है कि बचपन में देख-रेख पिता, यौवन में पति और वृद्धावस्था में पति के जीवित न रहने पर पुत्र ही करे। क्योंकि स्वतन्त्र स्त्री को अनर्थ से बचने तथा सुखपूर्वक गृहस्थाश्रम व्यतीत करने के लिए ‘वश्य’ का विचार किया जाना आवश्यक है।

तारा-Tara( Star) :

पूर्व वर्णित ग्रहों की तरह तारा का प्रभाव होता है। चन्द्र-ग्रह शास्त्रानुसार मनुष्य का मन है। इसका विचार भकूट या राशि के नाम से होता है। चन्द्र तारा पति कहलाता है। जब चन्द्रमा का विचार होता है तो ताराओं का भी विचार आवश्यक है। कृष्णपक्ष में चन्द्र की क्षीणावस्था का विचार किया जाता है।

योनि-Genitalia(Yoni) :

योनि शब्द का अर्थ तो सरल ही है। इससे स्त्री-पुरुष की प्रीति की जानकारी की जाती है। जैसे-गज और गज योनि में परस्पर प्रेम एवं गज और सिंह योनि में परस्पर वैर होता है। अन्य योनियों में भी इसी तरह प्रीति और वैर होता है। अतः दम्पति में प्रेम रहने की जानकारी के लिए वैर-योनि को छोड़कर प्रीति योनि को ही ग्रहण करना चाहिए।

ग्रह-मैत्री -Planetary Friendship:

ग्रहों में भी परस्पर स्वाभाविक मित्रता, समता और शत्रुता होती है। इसी तरह वर-वधू के राशि स्वामियों में भी मित्रता हो तो दोनों का जीवन मित्रवत् बीत जाता है। यदि समता हुई तो कभी प्रसन्नता और कभी लड़ाई होती है और शत्रुता होने से दोनों में शत्रुता उत्पन्न होती है। अतः मित्रवत् जीवन व्यतीत होने की जानकारी होने के लिए ग्रह-मैत्री देखनी आवश्यक है

गण-Gana (Personality Type):

गण तीन होते हैं-देव, मनुष्य मनुष्य और राक्षस । को यह पता लग जाय कि वर मनुष्य और कन्या राक्षस गण की है, तो वह अनायास ही राक्षस प्रकृति याद कर बोल उठेगा कि तब तो कन्या वर को निगल जायेगी अर्थात् लड़का काल के गाल में चला जायेगा। यदि देव और राक्षस गण हों तो देव और राक्षस की लड़ाई होती रहेगी। मनुष्य को देवता में जिस तरह की प्रीति होती है, वैसी ही प्रीति इन गणों में भी होगी और समान गण हों, तो प्रेम होता ही है। इसलिए राक्षस गण की दृष्टि से बचने और प्रीति के लिए गण का विचार होता है।

भकूट या राशिकूट-Bhakoot or Rashikoot (Aspect Compatibility) :

वर-वधू के जन्म-समय में चन्द्रमा जिन राशियों पर होता है, वे ही उनकी राशियाँ होती हैं। ग्रहों की तरह इन राशियों में भी मित्रता, शत्रुता आदि होती है। इनमें मित्रता होने से दम्पति प्रसन्नतापूर्वक रहते हैं। शत्रु षडष्टक और विषम सप्तम में मृत्यु, नव-पञ्चम में अनपत्यता, अशुभ द्विर्द्वादश में निर्धनता एवं अशुभ, दशम-चतुर्थ में दौर्भाग्य और दैन्य होता है। राशियों के विचार करने से ही मनुष्य के मन में चन्द्रमा का विचार हो जाता है। इसलिए दोनों की राशियों का विचार कर लेना चाहिए। नाड़ी : ‘नाड़ी’ के नाम से समझना चाहिए कि यह वह नाड़ी है जिसे देखकर वैद्य, हकीम या डॉक्टर रोग का पता लगाते हैं। इसी नाड़ी को अंग्रेजी में ‘पुल्स’ भी कहते हैं। ज्योतिष में तीन नाड़ियाँ मानी गयी हैं-आदि, मध्य, अन्त्य । ये तीन नाड़ियाँ वैद्यक के अनुसार क्रम से वात, पित्त और कफ की नाड़ियाँ हैं। यदि वर-वधू दोनों की आदि (वायु) नाड़ी हो तो दोनों के संयोग से वात का आधिक्य होने से पति की हानि होगी। यदि दोनों के मध्य (पित्त) नाड़ी हो, तो दोनों के संयोग से पित्त का आधिक्य होने से पति की हानि होगी। और यदि दोनों की अन्त्य (कफ) नाड़ी होगी तो कफ का आधिक्य दोनों की मृत्यु करा देगा। शरीर की क्रिया नाड़ी पर अवलम्बित है। इसलिए शास्त्रकारों ने नाड़ी पर अधिक जोर देकर कहा है-

सदा नाशयत्येकनाड़ी समाजो भकूटादिकान् सप्तभेदास्तथा च।’

अर्थ : वर्णादि सातों ठीक हों और नाड़ी एक तो भी विवाह नहीं करना चाहिये। परन्तु साथ-साथ उन्होंने सूक्ष्म विचार करके परिहार भी लिखे हैं।

अब मंगल ग्रह की विशेषता पर विचार किया जाता है। सभी ग्रहों के अंशों के मेल से यह शरीर बनता है। और रक्त संचालन क्रिया पर निर्भर करता है। यह रक्त ज्योतिष का मंगल ग्रह माना गया है। यदि दोनों का मंगल (रक्त) ठीक मिल गया अर्थात् दोनों का रक्त एक-दूसरे के उपयुक्त हुआ तो उनका जीवन आधी-व्याधि से व्यथित नहीं होगा। इसके विपरीत दोनों का मंगल (रक्त) उपयुक्त नहीं है तो जिस तरह दूध में विकार हो जाने से वह फट जाता है और बरबाद हो जाता है। इसी तरह एक-दूसरे के रक्त भी अनुपयोगी हो जाता है और रक्त पर निर्भर करने वाला मनुष्य का शरीर टिक नहीं सकता। इसलिए रक्त की उपयुक्तता जानने के लिए मंगल मिलाना आवश्यक है।

इन सब बातों पर विचार करने से यही पता लगता है नक्षत्र और ग्रह गणना न करने से मनुष्य की, समाज और देश की बड़ी हानि होती है।

सिंहस्थ- गुरु व्यवस्था-Bhakoot or Rashikoot (Aspect Compatibility) :

सामान्य रूप से गुरु की राशि पर सूर्य और सूर्य की राशि में गुरु के आने पर गुर्वादित्य नामक दोष होता है।

गुरुक्षेत्रगते भानौ भानुक्षेत्रगते गुरौ

गुर्वादित्यः विज्ञेयो गर्हितः सर्वकर्मसु

इसी प्रकार सामान्य रूप से लगभग 12 वर्षों के बाद सिंह राशि पर गुरु के आने से गुर्वादित्य दोष, विवाहादि शुभ कार्य में वर्जित है।

‘अस्ते वर्ज्य सिंहनक्रस्थजीवे वर्ज्यं केचिद्वक्रगे चातिचारे।
गुर्वादित्ये विश्वघस्त्रेऽपि पक्षे प्रोचुस्तद्वद्दन्तरत्नादिभूषाम्।। 1 ।।
 सिंहे गुरौ सिंहलवे विवाहो नेष्टोऽथ गोदोत्तरतश्च यावत् ।
भागीरथी- याम्यतटं हि दोषो नान्यत्र देशे तपनेऽपि मेषे ॥ 2 ॥
मघादि-पञ्चपादेषु गुरुः सर्वत्र निन्दितः ।
गंगागोदान्तरं हित्वा शेषांघ्रिषु न दोषकृत् ॥3॥
मेषेऽर्के सन् व्रतोद्वाहो गंगा-गोदान्तरेऽपि च।
सर्वः सिंहे गुरुर्वर्ण्यः कलिंगे गौडगुर्जरे ॥ 4 ॥

                                   (मुहूर्त चिन्तामणि, शु०प्र०)

सिंहराशौ तु सिंहांशे यदा भवति वाक्पतिः। सर्वदेशे स्वयं त्याज्यो दम्पत्योर्निधनप्रदः॥

                                                                                                            (राज० मा०)

श्रीलल्ल के वचनानुसार सिंह राशि के गुरु में गोदावरी के उत्तर तट से भागीरथी के दक्षिण के स्थलों में विवाहादि शुभ कार्य वर्जित हैं।

 यथा-

गोदावर्युत्तरतो यावद् भागीरथीतटं याम्यं, यत्र विवाहो नेष्टः सिंहस्थे देव पतिं पूज्यः

 ‘भागीरथ्युत्तरे कुले गौतम्याः दक्षिणे तथा विवाहो व्रतबन्धो वा सिंहस्थेज्ये दुष्यति ॥ (व.सं.) 4

सबका सारांश अधोलिखित है—

1. सिंह राशि का गुरु कलिंग, गौड़ और गुर्जर। देशों में शुभ कार्य के लिए वर्जित है।

2. सिंह राशि में सिंह नवांश का, गौतमी के दक्षिण तटवासी नगरों में सिंहस्थ गुरु होने पर व्रतबन्ध, होता है। अतः मेष के सूर्य में समस्त देश में विवाहादि शुभ कार्य नहीं किये जा सकेंगे।

Reference : Pt. R.N. Tripathi

Satta Lottery- Share Market Astrology

Satta Lottery- Share Market Astrology –सट्टा लाटरी शेयर मार्किट से लेना है लाभ ?

तुरंत करे ये उपाय :

  1. ऊं रां राहवे नम: मंत्र का प्रतिदिन एक माला जाप करें।
  2. पंचधातु या लोहे की अंगुठी में नौ रत्ती का गोमेद जड़वा कर शनिवार को राहु के बीज मंत्र द्वारा अभिमंत्रित करके दांये हाथ की मध्यमा अंगुली में धारण करें।
  3. प्रतिदिन दुर्गा चालीसा का पाठ करें।
  4. प्रतिदिन शिवलिंग पर जलाभिषेक करें।
  5. तामसिक आहार और मदिरा का सेवन बिलकुल ना करें।
  6. अगर आपने तामसिक आहार और मदिरा का सेवन किया तो ऐसा करने से राहु आपके और भी अधिक प्रतिकूल हो जाएगा।

अचानक धन लाभ के कुछ योग ,

जानते है की कौन से योग होने पर मिलता है अचानक धन

  1. जातक की कुंडली में अगर राज योग हो तभी लाटरी, सट्टा, जुआ और शेयर बाजार से लाभ होता हे। राज योग में धन भाव (दूसरा भाव) या लाभ स्थान एकादश भाव और दसवे घर क स्वामी उच्च राशि के बैठे हों और उन पर सौम्ये ग्रह की दृस्टि हो तो लाटरी निकलने की प्रबल संभावना होती है।
  2. लाटरी खरीदने के वक़्त बुध ग्रह अपने भाव मित्र राशि में उच्च का बैठा और गोचर में वेद ना हो तो लाटरी निकलती है अगर बुध जन्म कुंडली में उच्च का न हो तो लाटरी, सट्टा, जुआ और शेयर बाजार से हानि होती है।
  3. महादशा, अंतर और प्रत्यंतर दशा योगकारक ग्रह या उच्च के ग्रह की हो तो लाटरी निकलने की सभावना होगी।
  4. योगनी दशा में मंगला, सिद्धा चल रही हो तो अचानक धन लाभ होता है।
  5. जिस जातक के लग्न में बुध उच्चराशिगत हो, मकर में मंगल, धनु राशि में गुरु, चन्द्रमा,और शुक्र बैठे हों तो राजयोग होता है ऐसे योग में उत्पन बालक को अचानक धन लाभ होता है।
  6. जातक के जन्म कुंडली में चन्द्रमा सूर्य के नवमांश में हो तो कभी लाटरी, सट्टा, जुआ से लाभ ना होगा।
  7. शेयर बाजार में डेली ट्रेडिंग (Daily Treding) करने वालों की कुण्डली में मंगल ( Mangal) और गुरू अनुकूल होने चाहिए और कमोडिटी बाजार (Commodity Market) में राहु (Rahu) राज करता है, बारिश के सट्टे में चंद्रमा (Moon) की अनुकूलता चाहिए और क्रिकेट के सट्टे (Cricket Satta) में चंद्रमा (Moon) और मंगल ( Mangal) की।
  8. यदि जातक की जन्म कुण्डली में अष्टम भाव बेहद मजबूत हो तो भी सट्टा, लाटरी, शेयर आदि में अच्छा लाभ कमाने का योग बनता है।

Read About Writer : K.N.Tiwari

लक्ष्मी के योग (Laxmi Yog) अलग होते हैं। अगर पंचम भाव की प्रतिकूलता (Fifth house adversity) को एकादश भाव (11th House) की अनुकूलता मिले तो ही जातक सट्टे से लाभ (Profit by betting) कमा पाता है।

“सट्टे, जुआ, लॉटरी, और अन्य जुआ-जुआगर क्रियाओं से धन कमाने के योग में अष्टम भाव भी शामिल हो सकता है। हम जानते हैं कि अष्टम भाव अशुभ भी माना जाता है और इसमें दुख, कष्ट, और मृत्यु से भी संबंध हो सकते हैं। साथ ही, सट्टे के कारक ग्रह राहु होता है, जो क्रूर और पाप ग्रह माना जाता है, इसलिए सट्टे और इसके सम्बंधित गतिविधियों से कमाया धन शुभ नहीं माना जाता। इस प्रकार का धन आने पर उसे खूबसूरती से दान करना चाहिए, ताकि इसकी अशुभता को दूर किया जा सके।

यह सत्य है कि हमें कभी-कभी धन कई असमय खो सकता है, लेकिन दान और पुण्य का फल हमारे साथ हमेशा रहेगा। शास्त्रों में कहा गया है कि धर्म और कर्म व्यक्ति को बुराई से बचा सकते हैं, बड़ी मुश्किलों से भी उबार सकते हैं।”

इसके बाद, आपके दिए गए उदाहरण को बच्चों को शिक्षा देने के लिए उपयोग कर सकते हैं।

चूँकि सट्टे आदि से धन लाभ के योगों में अष्टम भाव भी सम्मिलित है और आप जानते ही होंगे की अष्टम भाव अशुभ भाव भी है, इसका दुःख, कष्ट,मृत्यु से भी सम्बन्ध है । और सट्टे का कारक ग्रह राहु है, जो की क्रूर ग्रह, पाप ग्रह है, इसलिए सट्टे आदि से कमाया हुआ धन शुभ नहीं होता है ।

यह अपने साथ दुःख, कष्ट आदि भी ले आता है, गलत आदतें भी इस धन से पड़ जाती है, यह धन जैसे आता है वैसे चला भी जाता है । इसलिए इस तरह का धन आने पर खूब दान पुण्य करना चाहिए तभी इस धन की अशुभता दूर होती है ।

धन तो पता नहीं कब चला जाये लेकिन दान पुण्य का फल तो आपके साथ ही रहेंगा । और शास्त्र कहता है धर्मकर्म व्यक्ति को बुरे से बुरे, और बड़े से बड़े संकट से भी उबार लेता है ।

धर्मेण हन्तये व्याधि धर्मेण हन्तये ग्रहा: ।

धर्मेण हन्तये शत्रु यतो धर्मस्ततो जयः ।।

अर्थात – धर्म व्याधि का नाश करता है, धर्म ग्रहों के बुरे फलों से बचाता है, धर्म दुश्मनों का नाश करता है , जहाँ जहाँ धर्म है वहां वहां विजय है ।

अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनं द्वयं ।

परोपकाराय पुण्याय पापाय पर पीडनं ।।

अर्थात अट्ठारह पुराणों में व्यासजी के दो ही वचन है दूसरे का उपकार करना पुण्य है और दूसरे को पीड़ा देना पाप है ।

ज्योतिष के अनुसार, जिन लोगों की कुंडली में राहु अनुकूल होता है या जो राहु की महादशा में होते हैं, उन्हें यह धंधे लाभकारी हो सकते हैं। इसके साथ ही, कुण्डली में धन के संकेतक ग्रहों, जैसे कि लग्नेश, चतुर्थेश, पंचमेश, और भाग्येश की स्थिति भी मजबूत होनी चाहिए, तभी व्यक्ति इन व्यापारों से लाभ कर सकता है, चाहे उसे सट्टा, लॉटरी, या शेयर मार्केट की भी जानकारी न हो।

अगर किसी व्यक्ति की कुंडली में राहु अनुकूल होता है, और वह राहु की महादशा या अंतरदशा में होता है, और उसके अलावा धन देने वाले ग्रहों, लग्नेश, आदि भाग्येश भाव में होते हैं, तो उस व्यक्ति को जितने पैसे से सट्टा खेलना है, उससे कई गुना अधिक धन प्राप्त हो सकता है।

अगर ये ग्रह सही रूप से स्थित नहीं हैं, तो चाहे कितनी भी रुचि क्यों न रखें, सट्टा से दूरी बनाना ही बेहतर है। किसी भी जातक को ध्यान में रखना चाहिए कि वे राहु की महादशा, अंतरदशा, प्रत्यंतर अथवा सूक्ष्म के दौरान सट्टा नहीं खेलें।

यह न केवल सिद्धांत है, बल्कि व्यवहारिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है कि किसी जातक की कुण्डली में लग्न बलशाली हो, तृतीय भाव का अधिपति अनुकूल हो, मंगल प्रबल हो, पंचम भाव खराब हो, और योग की शक्तिशाली स्थिति हो, तो ही वह एक सफल सट्टा खिलाड़ी बन सकता है।

सट्टा, जुआ, लॉटरी, और शेयर मार्केट, ये सभी ज्योतिष में राहु के क्षेत्र में आते हैं। सट्टा, लॉटरी, और शेयर मार्केट, कमोडिटी बाजार, ये सभी राहु के प्रबल क्षेत्र हैं।

शेयर बाजार में रोजाना व्यापार करने वालों की कुण्डली में मंगल और गुरु का सहयोग होना चाहिए और कमोडिटी बाजार में, राहु का प्रभाव होता है, बारिश के सट्टे में चंद्रमा की साथीत्य चाहिए और क्रिकेट सट्टे में चंद्रमा और मंगल की।

यदि किसी जातक की जन्म कुण्डली में अष्टम भाव मजबूत है, तो वह सट्टा, लॉटरी, और शेयर मार्केट में अच्छा लाभ कमाने की संभावना होती है।

लक्ष्मी योग विशेष होते हैं। अगर पंचम भाव की प्रतिकूलता को एकादश भाव की साथीत्य मिलती है, तो ही जातक सट्टा खिलाड़ी बन सकता है।

सट्टा, जुआ, लॉटरी, और शेयर मार्केट, ये सभी ज्योतिष में राहु के क्षेत्र में माने जाते हैं। जन्म कुण्डली के अनुसार, जो व्यक्ति इन व्यवसायों में रुचि रखता है, उसे विशेष ध्यान और सावधानी के साथ काम करना चाहिए।

सिद्धांत के बजाय, व्यक्ति की कुण्डली में लग्नेश, नवमेश, दशमेश, एकादशेश, और चतुर्थेश की दशा-अंतरदशा चल रही हो, और इन ग्रहों की स्थिति मजबूत हो, तभी व्यक्ति सट्टा, जुआ, लॉटरी, और शेयर मार्केट से धन कमा सकता है।

ज्योतिष के आधार पर, पंचम स्थान सट्टे का भाव होता है। इस स्थान में केतु, राहु, चंद्रमा, और मंगल की युति का प्रभाव होता है, और ये स्थान सट्टा में भाग्य की दिशा में खेलते हैं।

केतु का प्रभाव ज्यादा होता है जब वह कमन्यूकेशन के कारक भावों में होता है या तीसरे, सातवें, या ग्यारहवें भाव से युति बनाता है, जिससे व्यक्ति फोन या इंटरनेट के माध्यम से यह काम कर सकता है। अगर केतु सूर्य के साथ युति बनाता है, तो सरकारी लॉटरी या योजनाओं से धन कमा सकता है, और अगर केतु बुध के साथ युति बनाता है, तो व्यक्ति को खेल-कूद वाले सट्टों के प्रति रुझान होता है। राहु का सम्बन्ध दूसरे और पांचवें स्थान पर होने पर व्यक्ति सट्टा, लॉटरी, और शेयर मार्केट से धन कमा सकता है।

पंचम स्थान मन्त्र और जिज्ञासा का स्थान होता है। इस स्थान के स्वामी धन स्थान पर लाभेष के साथ होते हैं, तो व्यक्ति को सट्टे द्वारा धन कमाने का योग मिलता है।

यह जरूरी है कि व्यक्ति जब भी सट्टा खेलता है, तो ग्रहों की स्थिति और गोचर को ध्यान में रखे। कुंडली में योग होने के बावजूद भी, ग्रहों की स्थिति बहुत महत्वपूर्ण होती है।

ज्योतिष के आधार पर, पंचम भाव तीसरे भाव का तीसरा भाव होता है, और इसमें सट्टे का भाव बनता है। इसमें केतु, राहु, चंद्रमा, और मंगल की युति का प्रभाव होता है, और ये ग्रह खेल के नतीजे पर बहुत प्रभाव डालते हैं।

किस प्रकार जाने कि कौन सा अंक है आपके लिए शुभ :

१. आपके लिए कौन से अंक शुभ है या अशुभ यह जाने बिना सट्टा, लाटरी या किसी प्रकार का ऑनलाइन गेम न खेले.

२. कौन सा शुभ अंक है कौन सा अशुभ यह आप अपनी कुंडली विश्लेषण से जान सकते है .

३.  शुभ अंक, शुभ दिन और शुभ समय और शुभ अक्षर का ज्ञान होने से सफलता का प्रतिशत बढ़ जाता है.

४. अगर आप पैसे लगाते समय दिन- अंक – मुहूर्त आदि का ध्यान रखते है तो आपके जीतने के चांस बढ़ जाते हैं.

५. कुंडली में जो गृह प्रबल है उसके आधार पर ही निर्णय ले और इसके लिए कुंडली अवश्य किसी ज्योतिषी से दिखवाए.

आप इस पेज पर प्रतिदिन

like .

  1. Satta King
  2. Satta Matka
  3. Gali
  4. Dishawar
  5. Kalyan Satta
  6. Delhi Satta
  7. UP Satta King
  8. Black Satta
  9. Faridabad
  10. Manipur Satta
  11. Sridevi
  12. Madhuri
  13. Time Bajar
  14. Milan Day
  15. Kalyan
  16. Rajdhani Night
  17. Satyam

पर एस्ट्रोलॉजी के हिसाब से नंबर्स पता कर सकते है जिनके द्वारा आपको आपकी जीत के लिए कुछ टिप्स मिल जायँगे

Declaimer:

महत्वपूर्ण सूचना:

निम्नलिखित पोस्ट में सट्टा-लॉटरी गेमिंग की चर्चा की गई है, जो कि सभी जुरिस्डिक्शन्स में कानूनी नहीं हो सकती है। किसी भी प्रकार के जुआ, सट्टा-लॉटरी सहित, में शामिल होने से पहले अपने क्षेत्र के कानून और विधियों को समझना महत्वपूर्ण है। कृपया इस अस्वीकरण को ध्यान से पढ़ें और आगे बढ़ने से पहले।

1. कानूनी अनुपालन:

इस पोस्ट का उद्देश्य केवल सूचना प्रदान करना है और किसी भी प्रकार के जुआ, सट्टा-लॉटरी सहित, को प्रवर्तित या समर्थित नहीं करता है। इस प्रकार की गतिविधियों में भाग लेने से पहले आपको अपने क्षेत्र के सभी प्राप्ति कानून और विधियों का पालन करना महत्वपूर्ण है। कुछ क्षेत्रों में जुआ कानूनी रूप से प्रतिबंधित हो सकता है।

2. आयु प्रतिबंध:

आपको किसी भी जुआ गतिविधि में भाग लेने के लिए अपने क्षेत्र में कानूनी जुआ आयु में होना चाहिए। अपराधानुरोध जुआ कानूनी रूप से प्रतिबंधित और पूरी तरह से वर्जित है।

4. जोखिम चेतावनी:

जुआ में जोखिम होता है, और आपको कभी ऐसा धन लगाना नहीं चाहिए जिसका आपको हानि हो सकती है। यह महत्वपूर्ण है कि आप जागरूक हों कि लंबे समय में अधिकांश खिलाड़ी हारते हैं ज्यादा धन जीतने की तरह नहीं।

5. जानकारी की सटीकता:

इस पोस्ट में प्रदान की गई जानकारी केवल सूचना के उद्देश्य से है और इसे वित्तीय या जुआ सलाह के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। हम किसी भी प्रदान की गई जानकारी की सटीकता, पूर्णता, या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं देते हैं।

6. तृतीय-पक्ष संदर्भ:

इस पोस्ट में तृतीय-पक्ष वेबसाइटों या प्लेटफार्मों के लिंक्स शामिल हो सकते हैं। हम इन बाह्य वेबसाइटों की सामग्री का समर्थन नहीं करते और उनकी सटीकता या कानूनिता के लिए जिम्मेदार नहीं हैं।

7. पेशेवर मदद खोजें:

यदि आप या आपके पास कोई जुआ की लत या समस्या है, तो कृपया जिम्मेदार गेमिंग और अधिकता पुनर्वस के लिए समर्पित संगठनों और संसाधनों से पेशेवर मदद लें।

इस पोस्ट को पढ़ने का आग्रह करने से आप स्वीकार करते हैं कि आपने इस अस्वीकरण को पढ़ा और समझा है और आप सभी दिए गए नियमों का पालन करके जानकारी का सवधानीपूर्वक और अपने क्षेत्र के कानूनों और विधियों के साथ करने के लिए सहमत हैं। यदि आप इन नियमों से सहमत नहीं हैं या अपने क्षेत्र में जुआ की कानूनिता के बारे में संदेह है, तो कृपया तुरंत इस पेज को बंद करें।

Food Astrology

खाद्य ज्योतिष क्या है?- Food Astrology

Food Astrology– खाद्य ज्योतिष ज्योतिष के विभागों में से एक है जो लोगों के राशि चिन्ह के अनुसार उनके बारे में कई जानकारी प्रदान करता है। इसके अलावा, भोजन का ज्योतिष भविष्यवाणियों और अशुभता को भी कवर करता है।

राशि चिन्ह के आधार पर भोजन करने से न केवल आपके जीवन में क्या हो सकता है उसे समझने में मदद मिलती है, बल्कि यह आपको और आपके जीवनशैली को स्वस्थ बनाता है। खाद्य ज्योतिष आपके राशि चिन्ह के आधार पर आपकी आहार आदतों के बारे में विवरणात्मक जानकारी प्रदान करता है। इसलिए, सही खाद्य आइटम आपको समृद्धि, स्वास्थ्य सुख, और दीर्घ जीवन के साथ आशीर्वादित करेगा।

तो यदि कोई भी अपने किसी ग्रह को अनुकूल बनाना चाहता है, तो वह उसे कुछ विशेष खाद्य सामग्री का सेवन करके ठीक कर सकता है। ज्योतिषी विश्वास करते हैं कि सोच समझकर और ज्योतिषीय दृष्टिकोण से खाना, आपको उस ग्रह के पक्षपाती प्रभावों से आशीर्वादित करेगा, और आपको जीवन की समस्याओं के माध्यम से मदद करेगा।

ग्रह: राशि चिन्ह और उनके शासित खाद्य सामग्री

सूर्य ग्रहPlanet Sun

सिंह राशि को सूर्य  ग्रह शासित करता है। अगर आप एक सिंह राशि  गुणों को देखते हैं, तो उनमें वे अपने खाने को लेकर बहुत चुनौतीपूर्ण होते हैं और वे चाहते हैं कि वह शानदार, तीखा और गरम हो।

इसलिए, आपके सूर्य को मजबूत करने के लिए, आपके आहार में अदरक और लाल मिर्च जैसे मसालों को शामिल करने से सहायक होगा। फल और सब्जियां भी इस राशि के लिए मायने रखते हैं, और वे उन्हें ताजा और ठीक से कटा हुआ पसंद करते हैं।

इसके अलावा, यदि आपके पास कमजोर सूर्य है, तो आप अपने आहार में नमक शामिल कर सकते हैं। यह आपके हड्डियों और पेट और दिल संबंधित समस्याओं में मदद करेगा।

सूर्य ग्रह का विशेष रूप से कड़वा प्रकार का स्वाद पसंद है। इसलिए, मिर्च, सरसों के बीज, दालचीनी, आदि जैसे कई मसालों से भरपूर मसालेदार खाद्य का सेवन करने से आपकी कुंडली और जीवन में सूर्य की ऊर्जा में सुधार होगा।

इसके अलावा, आम, अंगूर, आलूबुखारा और संतरे जैसे अकेले फल आपके सूर्य ग्रह को मजबूत बना देंगे। और यदि आपके पास मजबूत सूर्य है, तो आप स्पाइसी स्वाद वाले खाद्य को पसंद करेंगे। अनाज के मामले में, गेहूं सूर्य से जुड़ता है।

खाद्य ज्योतिष के अनुसार, यदि आप गर्व, नाम, प्रसिद्धि और शारीरिक ताकत का इच्छुक हैं, तो आपको अपने आहार में गेहूं शामिल करना चाहिए। इसके अलावा, खाद्य ज्योतिष के अनुसार, अपने व्यक्तिगत संबंधों को मजबूत करने के लिए गेहूं शामिल करने से मदद मिलेगी।

आप ग्रहों के हिसाब से जूस का उपयोग करके भी उन्हें मजबूत बना सकते हैं। कौन सा जूस पीना है, इसकी जानकारी के लिए यहां पर क्लिक करें।

Sun -सूर्य

Moon -चंद्रमा

Mars -मंगल

Mercury-बुध

Jupiter-बृहस्पति

Venus -शुक्र

Saturn-शनि

Rahu-राहु

Ketu-केतु

ग्रह चंद्रमा- Planet Moon

ग्रह चंद्रमा कर्क राशि का शासक होता है। कर्क राशि वाले बहुत भावनात्मक होते हैं और उन्हें रॉयल्टी और आकर्षक दृष्टिकोण का आलस्य होता है। वे असामान्य घटकों के खाद्य का अपना पसंदीदा होते हैं। खाद्य सामग्री जैसे की ब्रेड, आइसक्रीम, कुकीज आदि, उनके पसंदीदा होते हैं।

तो, यदि आपके पास कमजोर चंद्रमा है, तो आपको ब्रेड और चावल जैसा खाद्य करना चाहिए। यह आपको शांत रहने में मदद करेगा। इसके अलावा, यदि आपकी संकल्पशक्ति कम है और आपके पास भावनात्मक समस्याएँ हैं, तो आप उपर्युक्त आइटम का सेवन कर सकते हैं।

आप अपने चंद्रमा की ऊर्जा को बढ़ाने के लिए डेयरी प्रोडक्ट्स का सेवन कर सकते हैं। मां की प्रेम को दर्शाने वाली खाद्य सामग्री जैसे की सूप, आरामदायक खाद्य आदि आपके चंद्रमा को मजबूत बनाएगी और आपके जीवन में इसकी ऊर्जा को आने देगी।

यदि आपकी कुंडली में राहु और चंद्रमा का संयोजन है, तो चावल का सेवन करें।

ग्रह मंगल- Planet Mars

मंगल ज्योतिष के अनुसार मेष और वृश्चिक राशि का शासक होता है। और, खाद्य को मसालों के साथ भरपूर स्वादिष्ट और गुणवत्ता वाले होने चाहिए।

लेकिन, इससे भी बड़ी बात, वे चॉकलेट और बहुत गहरे तले हुए खाद्य का सेवन करने का बहुत दीवाना होते हैं।

और विशेष रूप से, उन्हें वह खाद्य सामग्री पसंद है जो लाल रंग में होती है और मजबूत स्वाद वाली होती है। तुरंत मुँह में आने वाले खाद्य को वो आकर्षित होते हैं।

अपने कुंडली में मंगल की ऊर्जा को बढ़ाने के लिए, आपको लाल रंग के खाद्य को खाना चाहिए। टमाटर और लाल मिर्च भी मंगल को मजबूत करने में मदद करते हैं।

तो, यदि आप उपर्युक्त उल्लिखित किसी आइटम को शामिल करते हैं, तो मंगल मजबूत हो जाएगा और उसके आशीर्वादों को सबसे अच्छे तरीके से दिलाएगा।

ग्रह बुध-Planet Mercury

बुध ज्योतिष में कन्या और मिथुन राशि का शासक होता है। और, इन राशियों के लोग तेज स्वाद को पसंद करते हैं। खाद्य ज्योतिष के अनुसार, कन्या और मिथुन के लोग ठंडे और ताजगी वाले खाद्य को आनंद उठाएंगे।

तो, यदि आप अपने बुध को मजबूत करना चाहते हैं, तो आपके खाने में पत्तियों वाले सब्जियां, गोभी, पत्तियों वाले सलाद, और अजमोद सहित शीतल स्वाद वाली चीजें शामिल कर सकते हैं। इसके अलावा, केला, अनार, सेब, और क्रैनबेरी जैसे फल आपके जीवन में बुध की स्थिति को सुधार सकते हैं। मिथुन वाले लोग व्यक्तिगत रूप से फास्ट फूड और त्वरित बाइट्स का सेवन करने के लिए पसंद करते हैं। दूसरी ओर, कन्या निवासी स्वस्थ चीजें खाने का अच्छा रुझान रखते हैं। हालांकि, सभी में, दोनों ही ताजगी और मजबूत स्वाद की पसंद करते हैं।

ग्रह बृहस्पति- Planet Jupiter

बृहस्पति Dhanu  और मीन राशि का शासक होता है। यदि आपके पास मजबूत बृहस्पति है, तो आप तेलीय, तीखा और मीठा स्वाद वाले खाद्य को पसंद करेंगे। बृहस्पति एक मजबूत व्यक्तित्व को धारण करता है। वे बोल्ड होने और सभी को सबसे अच्छे तरीके से शासन करने की प्रेफरेंस रखते हैं। दूसरी ओर, मीन वाले व्यक्ति पेपी रहने की पसंद करते हैं और कुछ भी करने के लिए परिवर्तनपूर्णता की पसंद करते हैं।

अगर आप उन्हें दलिया, लौकी की सब्जी या रस, आदि जैसे खाद्य सामग्री दें, तो वे ऐसे खाने में इनकार नहीं करेंगे। हालांकि, अगर आप तला हुआ और कुरकुरे खाद्य सामग्री दें, तो वे उन्हें प्यार से खाएंगे।

तो, यदि आपके पास कमजोर बृहस्पति है, तो आपके आहार में लहसुन, टमाटर और नींबू को शामिल करें। इसके अलावा, आप खाद्य सामग्री में आयरन से भरपूर खाद्य सामग्री भी खा सकते हैं। हालांकि, कमजोर बृहस्पति की ऊर्जा को मजबूत करने के लिए सबसे प्रभावी खाद्य सामग्री बेसन और चना दाल है।

यह आपको बड़ों के समर्थन में आदर्श और ज्ञान प्राप्त करने में मदद करेगा।

ग्रह शुक्र-Planet Venus

शुक्र Tula  और वृष राशि का शासक होता है। इसलिए, Venus -शासित चिन्हों को मीठा खाद्य सामग्री पसंद है। वास्तव में, वे मीठा और तेज़ स्वादों का मिश्रण पसंद करते हैं। खाद्य ज्योतिष के अनुसार, वे अत्यधिक रसों का आनंद लेते हैं।

अगर आपके पास मजबूत Venus  है, तो आप शहद, शकरकंद आदि की तरह की मीठी खाद्य सामग्री को पसंद करेंगे। हालांकि, यदि आपके पास कमजोर Venus है, तो आपको अंजीर, खजूर, आम, आदि जैसे मीठे फलों को शामिल करना चाहिए। घी से तैयार किया गया खाद्य शुक्र की ऊर्जा को बढ़ावा देगा। इसके अलावा, अपने ग्रह को मजबूत करने के लिए दही भी खा सकते हैं। कमजोर वीनस की कमजोरी समस्याओं का सामना कर सकता है। खाद्य ज्योतिष के अनुसार, इन समस्याओं में मदद करने के लिए इन आइटम्स को शामिल करने में मदद मिलेगी।

रोचक बात यह है कि वृष और तुला वाले लोग आमतौर पर रात के खाने और दोपहर के भोजन का समय नहीं बिताते हैं। उन्हें फास्ट फूड और जल्दी से समाप्त होने वाले भोजन पसंद है।

ग्रह शनि- Planet Saturn

शनि कुम्भ और मकर राशि का शासक होता है। इन दोनों राशियों के लोग कड़वे स्वाद वाले खाद्य का आनंद लेते हैं। वे कम और हल्का खाने का आनंद लेते हैं और अक्सर टॉनिक कार्य करने वाले भोजन करते हैं।

फलों में, शनि के शासित राशियों को सेब और अनार पसंद हैं। विशेष रूप से, खाद्य ज्योतिष के अनुसार, मकर लोग स्वास्थ्य और भलाइ के लिए मदद करने वाले भोजन का आनंद लेते हैं। वास्तव में, अगर उन्हें भूना हुआ खाने के आइटम भी दिया जाए, तो वे इसे स्वीकार कर लेंगे।

तो, यदि आपके पास कुंडली में कमजोर शनि है, तो आपको पीली दाल और ठंडे और कड़वे स्वाद वाले खाद्य सामग्री का सेवन करना चाहिए। खाद्य ज्योतिष के अनुसार, इससे आपके दैनिक जीवन में पैरों और पैरों के संबंधित मुद्दों के समाधान हो सकता है।

खाद्य ज्योतिष: आपके आहार पर प्रभाव डालने वाले महत्वपूर्ण घर

खाद्य ज्योतिष के अनुसार, आपके खाद्य सामग्री के चयन पर चार घर हो सकते हैं जो प्रभाव डाल सकते हैं और ये घर हैं पहला घर, दूसरा घर, नौवां घर और बारहवां घर।

पहला घर, ज्योतिष के अनुसार, आपके दिमाग, व्यक्तित्व, और दिल को शासित करता है। दूसरा घर, खाद्य ज्योतिष के अनुसार, आपके खाद्य सामग्री को नियंत्रित करता है और आपके आहार पर सबसे अधिक प्रभाव डालता है। यदि आप नौवां घर की ओर देखते हैं, तो इसका Food Quality  पर सीधा संबंध नहीं होता है। लेकिन, खाद्य की गुणवत्ता में इसका प्रभाव हो सकता है। आखिरकार बारहवां घर आता है। यह आपके जीवन में आप क्या छोड़ने की तैयारी करते हैं, इसे दिखाता है।

खाद्य संबंधित उपाय ज्योतिष के अनुसार

सूर्य को मजबूत बनाने के लिए, आपको अपने भोजन को सूर्य के नीचे खाना चाहिए। इसके अलावा, यदि आपके पास कमजोर सूर्य है, तो आप गेहूं दाना दान कर सकते हैं, खासकर 2 और 8 घर में।

चंद्रमा को मजबूत बनाने के लिए, आपको सूर्यास्त के बाद ठंडा खाना चाहिए। इसके अलावा, आपको पुराना खाद्य नहीं खाना चाहिए, यह भी महत्वपूर्ण है।

मंगल को मजबूत करने के लिए, आप भोजन के बाद गुड़ खा सकते हैं। इसके अलावा, मंगल को मजबूत करने के लिए आप मंगलवार को मसूर दाल दान कर सकते हैं।

बुध  अगर आप अपने बुध को मजबूत करना चाहते हैं, तो आपको पत्तियों वाले सब्जियों, पत्तियों वाले सलाद, खाद्य सामग्री को शामिल करना चाहिए। इसके अलावा, केला, अनार, सेब, और क्रैनबेरी जैसे फल आपके बुध की स्थिति को सुधार सकते हैं।

बृहस्पति को मजबूत करने के लिए, हल्दी सबसे बेहतरीन सामग्री है। आपके खाने में थोड़ा सा हल्दी शामिल करें, और बृहस्पति आपके चार्ट में मजबूत हो जाएगा।

शुक्र को मजबूत करने के लिए, आपको रोजाना मिठे खाद्य का सेवन करना चाहिए।

शनि को मजबूत करने के लिए, आप शनिवार को उड़द दाल दान कर सकते हैं।

राहु और केतु

आपको हर दिन नहाने के बाद दो तुलसी की पत्तियों को खाना चाहिए। खाद्य ज्योतिष के अनुसार, यह आपके चार्ट से इन ग्रहों के अनिष्ट प्रभावों को हटाने में मदद करेगा।

Vaman Jayanti 2023

Vaman Jayanti 2023- वामन जयंती की तिथि और श्रवण नक्षत्र समय- The date and time of Vaman Jayanti:

वामन जयंती के दिन भगवान विष्णु की पूजा का विशेष महत्व होता है। क्योंकि, वामन श्रीहरि विष्णु के ही पांचवें अवतार है। भगवान वामन की पूजा करने से सभी प्रकार की मनोकामना पूरी होती है। यदि आप भगवान विष्णु से मनचाहा आशीर्वाद प्राप्त करना चाहते हैं, तो भगवान विष्णु की वैदिक रीति से पूजा कर सकते हैं।

वामन जयंती तिथि-Vaman Jayanti Tithi

प्रारम्भ: 26 सितंबर 2023, मंगलवार, प्रातः 05:00 बजे

समाप्त: 27 सितंबर 2023, पूर्वाह्न 01:45 बजे

श्रवण नक्षत्र- Shrawan Nakshtra

प्रारम्भ: 25 सितंबर 2023, सुबह 11:55 बजे

समाप्त: 26 सितंबर 2023, पूर्वाह्न 09:42 बजे

वामन जयंती का महत्व – Vaman Jayanti Ka Mmahttava

वामन जयंती का त्योहार भगवान विष्णु पांचवें अवतार यानी वामन अवतार के जन्म के उपलक्ष्य में मनाई जाती है। पुराणों में बताया गया है कि श्री हरि विष्णु ने राजा बलि को ब्राह्मांड पर आधिपत्य जमाने से रोकने के लिए भाद्रपद शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को जन्म लिया था।

भागवत पुराण में बताया गया है कि वामन भगवान विष्णु के दस अवतारों में से पांचवे अवतार थे, और त्रेता युग में पहले अवतार थे। इससे पहले भगवान विष्णु ने जो चार अवतार लिए थे, सभी पशु के रूप में थे, जो क्रमशः मत्स्य अवतार, कूर्म अवतार, वराह अवतार और नृसिंह अवतार थे। अगर मनुष्य रूप में श्रीहरि विष्णु के अवतार की बात की जाए, तो वामन रूप में उनका पहला अवतार था।

वामन देव ने भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष द्वादशी को अभिजित मुहूर्त यानि श्रवण नक्षत्र में पैदा हुए थे। उन्होंने कश्यप ऋषि और अदिति के पुत्र के रूप में जन्म लिया था। इस साल वामन जयंती का यह पवित्र त्योहार 26 सितंबर को मनाया जाएगा। वामन जयंती पर परिवर्तिनी एकादशी, पार्श्व एकादशी, वामन एकादशी, जलझूलनी एकादशी, पद्मा एकादशी, डोल ग्यारस और जयंती एकादशी आदि नामों से भी जाना जाता है।

वामन जयंती पूजा विधि- Vaman Jayanti Pooja Vidhi

पुराणों इस बात का उल्लेख किया गया है कि इस दिन भगवान विष्णु को उनके वामन रूप में पूजा जाता है। वामन जयंती के दिन उपासक को सूर्योदय से पहले उठना चाहिए। नित्यक्रिया के बाद स्नान और भगावन विष्णु का ध्यान कर दिन की शुरुआत करनी चाहिए। इसके बाद दिन की शुरुआत में आप वामन देव की सोने या फिर मिट्टी से बनी हुई प्रतिमा की पंचोपचार अथवा षोडशोपचार पूजा करें।

वामन जयंती के दिन उपवास का भी विशेष महत्व बताया गया है, इसलिए भक्त भगवान विष्णु के अवतार वामन देव को प्रसन्न करने के लिए उपवास भी रखते हैं। इस दिन पूजा करने का सबसे उत्तम समय श्रवण नक्षत्र होता है। श्रवण नक्षत्र में भगवान वामन देव की सोने या फिर मिट्टी से बनी हुई प्रतिमा के सामने बैठकर वैदिक रीति-रिवाजों से पूजा संपन्न करें। इस दौरान भगवान वामन देव की व्रत कथा को पढ़ना या फिर सुनना चाहिए।

कथा के समापन के बाद भगवान को भोग लगाकर प्रसादी वितरण करना चाहिए, इसके बाद ही उपवास खोलना लाभकारी होगा। ऐसा माना जाता है कि इस दिन चावल, दही और मिश्री का दान करने से अधिक लाभ प्राप्त होता है। यदि वामन जयन्ती श्रवण नक्षत्र के दिन आती है, तो इसका महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है। इस दिन भक्त वामन देव की पूजा पूरे वैदिक विधि और मंत्रों के साथ करते हैं, तो उनके जीवन की सभी समस्याओं का निवारण हो जाता है, अर्थात् भगवान वामन अपने उपासकों की हर मनोकामना पूरी करते हैं।

वामन जयंती के अनुष्ठान– Vaman Jayanti Anusthan

वामन जयंती के अवसर पर अगर आप अनुष्ठान करना चाहते हैं, तो सबसे सरल और आदर्श तरीका यह है कि इस दिन आप गरीबों को दही, चावल और भोजन दान करें। इसे वामन जंयती के दिन लाभकारी माना जाता है।

वामन जयंती के दिन भगवान विष्णु को प्रसन्न करने से वह आपके सारे दु:ख दर्द हर लेते हैं। इस दिन यदि आप विष्णु सहस्रनाम और अन्य विभिन्न मंत्रों का पाठ करते हैं, तो भगवान विष्णु की आप पर कृपा बरसेगी ।

इस दिन आपको भगवान विष्णु के 108 नामों का पाठ करना चाहिए। इसके अलावा भगवान विष्णु या वामन देव की मूर्ति या फिर चित्र के सामने अगरबत्ती, दीपक और फूल चढ़ाना चाहिए।

वामन अवतार कथा– Vaman Avtar Katha

प्राचीन काल में एक दैत्य राजा था, उसका नाम बलि था। वह भगवान विष्णु के बहुत बड़े भक्त थे। उन्होंने अपने बल और तप की मदद से पूरे ब्रह्मांड पर अपना शासन स्थापित किया था। भगवान विष्णु के परम भक्त और बलशाली बलि ने इंद्र देव को पराजित किया और स्वर्ग को भी जीत लिया था।

तब इंद्र देव भगवान विष्णु के पास आए और उनसे अपने स्वर्ग को वापस पाने की प्रार्थना की। भगवान विष्णु ने इंद्र को आश्वासन दिया कि वह उनका अधिकार वापस दिला देंगे। फिर भगवान विष्णु ने स्वर्गलोक के लोगों को इंद्र के अधिकार में वापस दिलाने के लिए वामन अवतार धारण किया।

वे ऋषि कश्यप और अदिति के पुत्र के रूप में जन्म ले लिये। राजा बलि भगवान विष्णु के परम भक्त थे, लेकिन वे एक क्रूर और अभिमानी शासक भी थे। वे हमेशा अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करते थे, और अपने बल और शक्ति से देवताओं और लोगों को डराते थे। वे अपनी पराक्रम की बजाय तीनों लोकों को जीत लिया था।

एक दिन जब राजा बलि अपनी शक्ति बढ़ाने के लिए अश्वमेध यज्ञ कर रहे थे, तब भगवान विष्णु वामन अवतार में उनके पास आए। उनके साथ दैत्यगुरु शुक्राचार्य भी थे। जैसे ही शुक्राचार्य ने वामन को देखा, वह समझ गए कि यहां भगवान विष्णु हैं।

शुक्राचार्य ने राजा बलि को बुलाकर उन्हें कहा कि यहां विष्णु वामन रूप में पहुंच चुके हैं, और वे कुछ मांग सकते हैं। तब वामन देव ने राजा बलि के पास आकर कुछ मांगने की इच्छा जाहिर की। राजा बलि ने इसे स्वीकार किया और उन्होंने दान देने का वचन दिया।

इसके बाद भगवान विष्णु वामन देव ने अपना रूप विशाल किया। वे एक पग में पूरे भू लोक को नाप लिया, दूसरे पग में स्वर्ग लोक को अपने अधीन कर लिया। जब वामन देव ने तीसरा पग उठाया, तो राजा बलि ने उन्हें पहचान लिया और उनके पास अपना शीश प्रस्तुत किया।

वह भगवान विष्णु के परम भक्त भी थे, इसलिए उन्होंने राजा बलि की उदारता का सम्मान किया और उन्हें पाताल लोक भेजने के बजाय उन्हें वह वरदान दिया कि वे साल में एक बार अपनी प्रजा से मिल सकते हैं।

दक्षिण भारत में मान्यता है कि राजा बलि साल में एक बार अपनी प्रजा से मिलने के लिए पृथ्वी लोक पर आते हैं। इस दिन को ओणम पर्व के रूप में मनाया जाता है। साथ ही अन्य भारतीय राज्यों में इसे बलि-प्रतिपदा के नाम से भी मनाया जाता है।

पार्श्व एकादशी की पूजा कैसे करें – Parshwa Ekadashi ki Pooja Kaise kare ?

एकादशी व्रत दशमी तिथि की रात्रि से शुरू किया जाता है। इस दिन, दशमी तिथि के दिन सूर्य अस्त होने के बाद भोजन नहीं करना चाहिए। यदि संभव न हो, तो आप फल और दूध का सेवन कर सकते हैं।

एकादशी की तिथि के दिन सुबह सूर्योदय से पहले उठें और किसी पवित्र नदी में स्नान करें।

यदि आपके घर के पास कोई पवित्र नदी नहीं है, तो आप अपने नहाने के पानी में थोड़ा सा गंगाजल मिला सकते हैं।

स्नान के बाद साफ-सुथरे वस्त्र पहनें और भगवान विष्णु का ध्यान करें और एकादशी व्रत का संकल्प लें।

अब अपने घर के पूजा कक्ष में पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें और सामने एक लकड़ी की चौकी रखें।

इस चौकी पर थोड़ा सा गंगाजल छिड़क कर इसे शुद्ध करें।

अब चौकी पर पीले रंग का कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर की स्थापना करें।

भगवान विष्णु की मूर्ति के सामने धूप और गाय के घी का दीपक जलाएं।

अब भगवान विष्णु की मूर्ति के सामने कलश स्थापित करें।

अब अपनी क्षमता के अनुसार भगवान विष्णु के लिए फल, फूल, पान, सुपारी, नारियल, लौंग, आदि को अर्पित करें।

संध्याकाल में वामन एकादशी की कथा सुनें और फलाहार करें।

यदि आप पूरे दिन व्रत करने में सक्षम नहीं हैं, तो आप दिन में भी फलाहार कर सकते हैं।

अगले दिन सुबह स्नान करने के बाद ब्राह्मणों को भोजन करवाएं और उन्हें दान और दक्षिणा दें, और फिर व्रत का पारण करें।

एकादशी के दिन विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

Parivartini Ekadashi 2023

Parivartini Ekadashi 2023 Date | परिवर्तिनी-एकादशी 2023 तिथि

पौराणिक मान्यता के अनुसार परिवर्तिनी-एकादशी (Parivartini-Ekadashi 2023) के दिन भगवान विष्णु ने योग निद्रा चातुर्मास में शयन करते हुए पहली करवट ली थी। भगवान विष्णु के शयन मुद्रा बदलने के कारण इसे परिवर्तिनी-एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस दिन भक्त श्रद्धापूर्वक व्रत रखते है और भगवान विष्णु के वामन अवतार का विधि विधान से पूजन करते है। शास्त्रों के अनुसार इस एकादशी के दिन सच्चे मन से व्रत करने से देवी महालक्ष्मी प्रसन्न होती है और उनके घर में कभी अन्न-धन की कमी नहीं आती है।

साल 2023 में सोमवार, 25 सितम्बर 2023 (parivartini ekadashi 2023 date) के दिन परिवर्तिनी-एकादशी का व्रत रखा जाएगा।

परिवर्तिनी-एकादशी का शुभ समय व पूजन मुहूर्त इस प्रकार से है-

परिवर्तिनी एकादशी कब है?

साल 2023 में सोमवार, 25 सितम्बर 2023 (parivartini ekadashi 2023 date) के दिन परिवर्तिनी-एकादशी का व्रत रखा जाएगा।

Parivartini Ekadashi 2023 Shuh Muhurat | परिवर्तिनी एकादशी 2023 शुभ मुहूर्त

एकादशी तिथि आरंभ     25 सितंबर 2023 को सुबह 07:55 बजे

एकादशी तिथि समाप्त   26 सितंबर 2023 को प्रातः 05:00 बजे

परिवर्तिनी एकादशी पारण मुहूर्त              

26 सितंबर 2023, दोपहर 01:25 बजे से दोपहर 03:49 बजे तक

Parivartini Ekadashi Significance | परिवर्तिनी एकादशी महत्व

हिन्दू परंपराओं के अनुसार, जो कोई भी परिवर्तिनी एकादशी व्रत का पालन करता है, उनपर भगवान विष्णु की विशेष कृपा होती है। पुराणों के अनुसार, परिवर्तिनी एकादशी का व्रत करने से वाजपेय यज्ञ के बराबर फल की प्राप्ति होती है। इस दिन विशेष रूप से भगवान विष्णु के वामन अवतार की पूजा की जाती है।

परिवर्तिनी एकादशी व्रत से व्यक्ति को नाम, यश की प्राप्ति होती है और उसकी मनोकामनाएं सिद्ध होती हैं। इसके अलावा इस व्रत को रखने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। ऐसा मान्यता है कि जो कोई भी इस व्रत का पालन करता है उसे अपने जीवन के पापों और गलत कार्यों से छुटकारा मिल जाता है। इसके अलावा भक्तों को तीनों लोकों में प्रसिद्धि भी मिल सकती है।

Parivartini Ekadashi Pujan Vidhi | परिवर्तिनी एकादशी व्रत की पूजा विधि

परिवर्तिनी एकादशी के दिन सुबह जल्दी स्नान कर, पीले स्वच्छ कपड़े पहनें और सूर्य देव को जल चढ़ाएं।

 फिर पूजा स्थल को साफ करें और भगवान विष्णु और गणेश जी की मूर्ति रखें।

भगवान विष्णु और गणेश जी को प्रसाद, दूर्वा घास, पीले फूल, पंचामृत और तुलसी अर्पित करें।

 पूजन संपन्न होने के बाद भगवान के मंत्रो का जाप करें और परिवार सहित आरती गाएं।

अब सभी में प्रसाद वितरित करे।

 इस दिन जरूरतमंद लोगों को भोजन, कपड़े, जूते, छाते आदि दान करना चाहिए।

परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा की महिमा– Parivartni Ekadashi Vrat Mahima

युधिष्ठिर कहने लगे कि हे भगवान! भाद्रपद शुक्ल एकादशी का क्या नाम है? इसकी विधि तथा इसका माहात्म्य कृपा करके कहिए। तब भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे कि इस पुण्य, स्वर्ग और मोक्ष को देने वाली तथा सब पापों का नाश करने वाली, उत्तम वामन एकादशी का माहात्म्य मैं तुमसे कहता हूँ तुम ध्यानपूर्वक सुनो।

यह एकादशी जयंती एकादशी भी कहलाती है। इसका यज्ञ करने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है। पापियों के पाप नाश करने के लिए इससे बढ़कर कोई उपाय नहीं। जो मनुष्य इस एकादशी के दिन मेरी (वामन रूप की) पूजा करता है, उससे तीनों लोक पूज्य होते हैं। अत: मोक्ष की इच्छा करने वाले मनुष्य इस व्रत को अवश्य करें।

जो कमलनयन भगवान का कमल से पूजन करते हैं, वे अवश्य भगवान के समीप जाते हैं। जिसने भाद्रपद शुक्ल एकादशी को व्रत और पूजन किया, उसने ब्रह्मा, विष्णु सहित तीनों लोकों का पूजन किया। अत: हरिवासर अर्थात एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए। इस दिन भगवान करवट लेते हैं, इसलिए इसको परिवर्तिनी एकादशी भी कहते हैं।

भगवान के वचन सुनकर युधिष्ठिर बोले कि भगवान! मुझे अतिसंदेह हो रहा है कि आप किस प्रकार सोते और करवट लेते हैं तथा किस तरह राजा बलि बलि को बाँधा और वामन रूप रखकर क्या-क्या लीलाएँ कीं? चातुर्मास के व्रत की क्या ‍विधि है तथा आपके शयन करने पर मनुष्य का क्या कर्तव्य है। सो आप मुझसे विस्तार से बताइए।

भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी जो साधक अपने पूर्वजन्म से लेकर वर्तमान में जाने-अजाने किये गये पापों का प्रायश्चित करना चाहते हैं और मोक्ष की कामना रखते हैं उनके लिये यह एकादशी मोक्ष देने वाली, समस्त पापों का नाश करने वाली मानी जाती है।

मान्यता है कि इस एकादशी के व्रत से वाजपेय यज्ञ जितना पुण्य फल उपासक को मिलता है। पद्मा एकादशी को भगवान विष्णु पाताल लोक में अपनी शैय्या पर करवट बदलते हैं। शास्त्रों के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु करवट बदलने के समय प्रसन्नचित्त मुद्रा में रहते हैं, इस अवधि में उनसे जो कुछ भी मांगा जाता है वे अवश्य प्रदान करते हैं। इस दिन भगवान विष्णु के वामन रूप की पूजा की जाती है। इस व्रत को करने से व्यक्ति के सुख, सौभाग्य में वृद्धि होती है। मंदिरों में इस दिन भगवान श्री विष्णु की प्रतिमा या शालिग्राम को पालकी में बिठाकर ढोल-नगाड़ों के साथ शोभा यात्रा निकाली जाती है ।

परिवर्तिनी एकादशी के दिन सुबह उठकर स्नान करें और पीले रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण कर पूर्व या पूर्वोत्तर की ओर मुख करके भगवान विष्णु की प्रतिमा को पंचामृत से स्नान करवाकर वस्त्र,आभूषण,फूलमाला आदि धारण कराएं। यदि मूर्ति नहीं है तो आप भगवान विष्णु का चित्र भी लगा कर पूजा कर सकते हैं। इस दिन भगवान विष्णु के वामन अवतार का ध्यान कर पूजा करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। पूजा के उपरांत वामन भगवान की कथा का श्रवण या वाचन करें और कपूर एवं शुद्ध घी के दीपक से श्री हरि की आरती उतारें एवं प्रसाद सभी में वितरित करें। भगवान विष्णु के पंचाक्षर मंत्र ‘‘ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय’’का यथा संभव तुलसी की माला से जाप करें। इसके बाद शाम के समय जल में निवास करने वाले श्री नारायण की पुनः संध्या आरती करके उनकी मूर्ति के समक्ष भजन-कीर्तन अवश्य करें। इस एकादशी के दिन भगवान विष्णु सहित देवी लक्ष्मी की पूजा करने से इस जीवन में धन और सुख की प्राप्ति तो होती ही है। परलोक में भी इस एकादशी के पुण्य से उत्तम स्थान मिलता है। पद्मा एकादशी के दिन जल से भरे हुए घड़े को वस्त्र से ढककर दही और चावल के साथ ब्राह्मण को दान देना चाहिए,शुभ फलों की प्राप्ति के लिए साथ में जूते और छाते का भी दान करें । जो लोग किसी कारण वश पद्मा एकादशी का व्रत नहीं कर पाते हैं उन्हें पद्मा एकादशी के दिन भगवान विष्णु के नाम का कीर्तन करना चाहिए।

परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा– Parivartni Vrat Katha

श्रीकृष्ण कहने लगे कि हे राजन! अब आप सब पापों को नष्ट करने वाली कथा का श्रवण करें।

त्रेतायुग में बलि नामक एक असुर राजा था, लेकिन वह महादानी एवं भगवान श्री विष्णु का बहुत भक्त था।वैदिक विधियों के साथ वह भगवान् का नित्य पूजन किया करता था,उसके द्वार से कभी कोई खाली हाथ नहीं लौटता था। अपने वामनावतार में भगवान विष्णु ने राजा बलि की परीक्षा ली थी। राजा बलि ने तीनों लोकों पर अपना अधिकार कर लिया था लेकिन उसमें एक गुण यह था कि वह किसी भी ब्राह्मण को खाली हाथ नहीं भेजता था उसे दान अवश्य देता था। दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने उसे भगवान विष्णु की लीला से अवगत भी करवाया लेकिन फिर भी राजा बलि ने वामन स्वरूप भगवान विष्णु को तीन पग भूमि देने का वचन दे दिया। फिर क्या था दो पगों में ही भगवान विष्णु ने समस्त लोकों को नाप दिया तीसरे पग के लिये कुछ नहीं बचा तो बलि ने अपना वचन पूरा करते हुए अपना शीष उनके पग के नीचे कर दिया। भगवान विष्णु की कृपा से बलि रसातल में पाताल लोक में रहने लगा लेकिन साथ ही उसने भगवान विष्णु को भी अपने यहां रहने के लिये वचनबद्ध कर लिया था।वामन अवतार की इस कथा को सुनने और पड़ने वाला व्यक्ति तीनों लोकों में पूजित होता है ।

Radha Asthmi

Radha Asthmi

भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को राधाष्टमी के नाम से मनाई जाती है। इस वर्ष, यह 23 सितंबर 2023 को मनाई जाएगी। राधाष्टमी के दिन, श्रद्धालु बरसाना की ऊंची पहाड़ी पर स्थित गहवर वन की परिक्रमा करते हैं। इस दिन रात-दिन बरसाना में बहुत ही धूमधाम रहती है। विभिन्न प्रकार के सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। धार्मिक गीतों और कीर्तन के साथ उत्सव का आरंभ होता है।

भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर मनाए जाने वाले श्रीकृष्ण जन्मोत्सव के ठीक 15 दिन बाद राधा रानी का जन्मोत्सव मनाया जाता है। सनातन परंपरा में श्री राधा जी को भगवान श्री कृष्ण की शक्ति माना गया है, जिनके बगैर न सिर्फ वो अधूरे हैं बल्कि उनके भक्तों की पूजा भी अधूरी मानी जाती है। मान्यता है कि भगवान श्री कृष्ण के साथ राधा जी की पूजा करने पर सुखी दांपत्य जीवन का आशीर्वाद प्राप्त होता है। जीवन के सभी दुखों को दूर करके सुख-सौभाग्य और सफलता का वरदान देने वाली देवी श्री राधा जी की पूजा इस साल कब और कैसे करनी चाहिए, आइए इसे विस्तार से जानते हैं।

राधा अष्टमी का महत्व – Importance of Radha Ashtami

राधा अष्टमी एक महत्वपूर्ण हिन्दू पर्व है जो भगवान कृष्ण की प्रिय अनुग्रहिणी, राधा जी के जन्म को मनाता है। इस पर्व का महत्व उसकी भक्ति और पूजा में है, और इसे भगवान श्री कृष्ण के प्रेम के प्रतीक के रूप में माना जाता है। राधा अष्टमी के पावन दिन पर भक्त श्रद्धा और भक्ति भाव से इस पर्व का आचरण करते हैं, जिससे वे दिव्यता के दर परंपरागत करते हैं। यह पर्व भक्तों के लिए सुख, समृद्धि, और मोक्ष की प्राप्ति का माध्यम माना जाता है। राधा जी की पूजा न करने पर उनके भगवान कृष्ण के प्रति प्रेम में आधूरे होने का खतरा होता है, क्योंकि वे एक दूसरे के बिना अधूरे माने जाते हैं।

राधा अष्टमी: राधा की महिमा का त्योहार

राधा अष्टमी भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण हिन्दू पर्व है, जो भगवान कृष्ण की प्रिय अनुग्रहिणी, राधा जी के जन्म को मनाता है। यह पर्व भगवान कृष्ण के प्रेम और भक्ति के प्रतीक के रूप में माना जाता है। राधा अष्टमी के दिन श्रद्धालु भगवान की प्रियतमा, राधा रानी का जन्म उत्सव करते हैं, और उनकी भक्ति और पूजा में मग्न होते हैं।

इस पर्व का महत्व उसकी भक्ति और पूजा में है, और इसे भगवान श्री कृष्ण के प्रेम के प्रतीक के रूप में माना जाता है। राधा अष्टमी के पावन दिन पर भक्त श्रद्धा और भक्ति भाव से इस पर्व का आचरण करते हैं, जिससे वे दिव्यता के दर परंपरागत करते हैं। यह पर्व भक्तों के लिए सुख, समृद्धि, और मोक्ष की प्राप्ति का माध्यम माना जाता है। राधा जी की पूजा न करने पर उनके भगवान कृष्ण के प्रति प्रेम में आधूरे होने का खतरा होता है, क्योंकि वे एक दूसरे के बिना अधूरे माने जाते हैं।

राधा अष्टमी के दिन, भक्त शुद्ध मन और भक्ति भाव से व्रत का पालन करते हैं। इस दिन राधा जी की मूर्ति को पंचामृत से स्नान कराया जाता है और उनका श्रृंगार किया जाता है। राधा जी की सोने या किसी अन्य धातु से बनी मूर्ति को विग्रह में स्थापित किया जाता है। धूप, दीप, आरती आदि के साथ पूजा की जाती है और भोग चढ़ाया जाता है। राधा जी के मंत्रों का जाप भी किया जाता है, और पूजा के बाद आरती दर्शाई जाती है। प्रसाद को भक्तों के बीच बाँटने के बाद स्वयं भी ग्रहण किया जाता है। इस दिन के व्रत को पूरी श्रद्धा और विधान से करने से भक्त सुख, सौभाग्य, और सफलता प्राप्त करते हैं, और उनके जीवन के सभी दुख दूर हो जाते हैं।

राधा अष्टमी ब्रज और बरसाना में भी महत्वपूर्ण त्योहार के रूप में मनाई जाती है। इन स्थलों में राधा रानी का जन्म उत्सव करने का परंपरागत तरीका होता है। वृन्दावन, बरसाना, रावल, और मांट के राधा रानी मंदिरों में इस दिन को उत्सव के रूप में मनाया जाता है। वृन्दावन के ‘राधा बल्लभ मंदिर’ में राधा जन्म के खुशी में गोस्वामी समाज के लोग भक्ति के अद्वितीय रंगों में लिपट जाते हैं। इस दिन, हौदियों में हल्दी मिश्रित दही एकत्र किया जाता है और फिर गोस्वामियों पर यह दही फेंका जाता है, जिसके बाद वे नृत्य करने लगते हैं और भगवान की महिमा गाते हैं। राधा जी के भोग के बाद, बधाई गायन का आयोजन किया जाता है, और इस अद्भुत उत्सव का समापन आरती के साथ होता है।

राधा अष्टमी का शुभ मुहूर्त- “Radha Ashtami Auspicious Timings”

हिंदू पंचांग के अनुसार, इस साल राधा अष्टमी का पावन पर्व 23 सितंबर 2023 को मनाया जाएगा। पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि 22 सितंबर 2023 को दोपहर 01:35 बजे से प्रारंभ होकर 23 सितंबर 2023 को दोपहर 12:17 बजे तक रहेगी। इस दिन राधा रानी की पूजा के लिए सबसे उत्तम मुहूर्त प्रात:काल 11:01 से लेकर दोपहर 01:26 बजे तक रहेगा।

राधाष्टमी कथा -Radha Ashtami Story

राधाष्टमी कथा, राधा जी के जन्म से संबंधित है। राधाजी, वृषभानु गोप की पुत्री थी। राधाजी की माता का नाम कीर्ति था। पद्मपुराण में राधाजी को राजा वृषभानु की पुत्री बताया गया है। इस ग्रंथ के अनुसार जब राजा यज्ञ के लिए भूमि साफ कर रहे थे, तब भूमि कन्या के रूप में इन्हें राधाजी मिली थी। राजा ने इस कन्या को अपनी पुत्री मानकर इसका लालन-पालन किया।

इसके साथ ही यह कथा भी मिलती है कि भगवान विष्णु ने कृष्ण अवतार में जन्म लेते समय अपने परिवार के अन्य सदस्यों से पृथ्वी पर अवतार लेने के लिए कहा था, तब विष्णु जी की पत्नी लक्ष्मी जी, राधा के रुप में पृथ्वी पर आई थी। ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार राधाजी, श्रीकृष्ण की सखी थी। लेकिन उनका विवाह रापाण या रायाण नाम के व्यक्ति के साथ सम्पन्न हुआ था। ऎसा कहा जाता है कि राधाजी अपने जन्म के समय ही वयस्क हो गई थी। राधाजी को श्रीकृष्ण की प्रेमिका माना जाता

राधाष्टमी पूजन- Radha Ashtami Worship

राधा अष्टमी के दिन, भक्त शुद्ध मन और भक्ति भाव से व्रत का पालन करते हैं। इस दिन राधा जी की मूर्ति को पंचामृत से स्नान कराया जाता है और उनका श्रृंगार किया जाता है। राधा जी की सोने या किसी अन्य धातु से बनी मूर्ति को विग्रह में स्थापित किया जाता है। धूप, दीप, आरती आदि के साथ पूजा की जाती है और भोग चढ़ाया जाता है। राधा जी के मंत्रों का जाप भी किया जाता है, और पूजा के बाद आरती दर्शाई जाती है। प्रसाद को भक्तों के बीच बाँटने के बाद स्वयं भी ग्रहण किया जाता है। इस दिन के व्रत को पूरी श्रद्धा और विधान से करने से भक्त सुख, सौभाग्य, और सफलता प्राप्त करते हैं, और उनके जीवन के सभी दुख दूर हो जाते हैं।

राधा अष्टमी ब्रज और बरसाना में – Radha Ashtami in Braj and Barsana

राधा अष्टमी ब्रज और बरसाना में भी महत्वपूर्ण त्योहार के रूप में मनाई जाती है। इन स्थलों में राधा रानी का जन्म उत्सव के रूप में बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। मथुरा, वृन्दावन, बरसाना, रावल, और मांट के राधा रानी मंदिरों में इस दिन को उत्सव के रूप में मनाया जाता है। वृन्दावन के ‘राधा बल्लभ मंदिर’ में राधा जन्म के खुशी में गोस्वामी समाज के लोग भक्ति के अद्वितीय रंगों में लिपट जाते हैं। इस दिन, हौदियों में हल्दी मिश्रित दही एकत्र किया जाता है और फिर गोस्वामियों पर यह दही फेंका जाता है, जिसके बाद वे नृत्य करने लगते हैं और भगवान की महिमा गाते हैं। राधा जी के भोग के बाद, बधाई गायन का आयोजन किया जाता है, और इस अद्भुत उत्सव का समापन आरती के साथ होता है।

राधा अष्टमी: प्रश्न और उत्तर

राधा अष्टमी क्या है?

राधा अष्टमी भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को राधाष्टमी के नाम से मनाई जाने वाली एक हिन्दू पर्व है। इस वर्ष, यह 23 सितंबर 2023 को मनाई जाएगी।

राधा अष्टमी का महत्व क्या है?

राधा अष्टमी पर्व का महत्व उसकी भक्ति और पूजा में है, और इसे भगवान श्री कृष्ण के प्रेम के प्रतीक के रूप में माना जाता है। यह पर्व भक्तों के लिए सुख, समृद्धि, और मोक्ष की प्राप्ति का माध्यम माना जाता है।

राधा अष्टमी के दिन कैसे मनाते हैं?

राधा अष्टमी के दिन भक्त श्रद्धा और भक्ति भाव से व्रत का पालन करते हैं। वे राधा जी की मूर्ति को पंचामृत से स्नान कराते हैं और उनका श्रृंगार करते हैं। धूप, दीप, आरती आदि के साथ पूजा की जाती है और भोग चढ़ाया जाता है।

राधा अष्टमी की कथा क्या है?

राधा अष्टमी कथा राधा जी के जन्म से संबंधित है। राधा जी की माता का नाम कीर्ति था और वे वृषभानु गोप की पुत्री थीं। पद्मपुराण में राधा जी को राजा वृषभानु की पुत्री बताया गया है।

राधा अष्टमी कैसे मनाई जाती है ब्रज और बरसाना में?

ब्रज और बरसाना में राधा अष्टमी को बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। मथुरा, वृंदावन, बरसाना, रावल, और मांट के राधा रानी मंदिरों में इसे उत्सव के रूप में मनाया जाता है।

राधा अष्टमी के पावन मुहूर्त क्या है?

हिन्दू पंचांग के अनुसार, इस वर्ष राधा अष्टमी का पावन पर्व 23 सितंबर 2023 को मनाया जाएगा। प्रात:काल 11:01 से लेकर दोपहर 01:26 बजे तक यह पावन मुहूर्त रहेगा।

Categories