Navratri 2023

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Navratri 2023

नवरात्रि: हिन्दू धर्म का महत्वपूर्ण पर्व

नवरात्रि के दौरान, भक्त दुर्गा माता की पूजा करने के लिए ध्यान, भजन, और पूजा के आयोजन करते हैं। यह नौ दिन देवी के नौ रूपों की पूजा के रूप में भी मनाई जाती है, जिन्हें शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, और सिद्धिदात्रि कहा जाता है।

नवरात्रि के इन दिनों, लोग नेत्रा व्रत, कन्या पूजन, और यज्ञों का आयोजन करते हैं और दुर्गा माता के प्रति अपनी विशेष श्रद्धा और आस्था का प्रकटीकरण करते हैं। नवरात्रि के आयोजन के दौरान, महिलाएं विशेष रूप से आकर्षक श्रृंगार करती हैं और नवीन वस्त्र पहनती हैं।

नवरात्रि हिन्दू धर्म में एक महत्वपूर्ण त्योहार है जिसे पूरे उत्साह और आनंद के साथ मनाया जाता है। इस पर्व का महत्व विभिन्न तरीकों से मनाया जाता है और यह हर साल नौ दिनों के अवसर पर मनाया जाता है। इस लेख में, हम आपको Navratri 2023 के महत्व, तिथियाँ, और पूजा की विधि के बारे में जानकारी देंगे।

Check Video here : https://youtu.be/B5hOc7KzT5A

नवरात्रि का महत्व-The significance of Navratri.

नवरात्रि का महत्व हिन्दू धर्म में अत्यधिक है। इस त्योहार के दौरान मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा होती है, जिन्हें नौ दिनों तक पूजा जाता है। इन दिनों में, भक्त अपनी श्रद्धा और भक्ति के साथ मां दुर्गा की पूजा करते हैं और उनके आशीर्वाद की प्राप्ति करते हैं।

वर्ष में कुल चार नवरात्रि मनाई जाती है, लेकिन इनमें से दो नवरात्रि गुप्त होती हैं, जिन्हें चैत्र और आश्वयुज मास में मनाया जाता है। दूसरी ओर, दो नवरात्रि गृहस्थी लोगों द्वारा धूमधाम और हर्षोल्लास से मनाई जाती है, जो शारदीय और वसंत नवरात्रि के रूप में होती है।

शारदीय नवरात्रि 2023 तिथि-The date of Sharad Navratri in 2023

नवरात्रि का आयोजन इस वर्ष 15 अक्टूबर को रविवार को होगा और 24 अक्टूबर को मंगलवार को समाप्त होगा। शारदीय नवरात्रि का आरंभ प्रतिपदा तिथि को होगा, जो 14 अक्टूबर को शनिवार को रात 11 बजकर 24 मिनट पर होगा, और इसका समापन 16 अक्टूबर को सोमवार को रात 12 बजकर 3 मिनट पर होगा।

नवरात्रि का आयोजन शुभ मुहूर्त में किया जाता है। घटस्थापना मुहूर्त 15 अक्टूबर को सुबह 11 बजकर 44 मिनट से शुरू होगा और दोपहर 12 बजकर 30 मिनट पर समाप्त होगा। घटस्थापना की कुल अवधि 46 मिनट होती है, जिसमें पूजा की समय सीमा शामिल होती है।

शारदीय नवरात्रि 2023 पूजा सामग्री-Sharadiya Navratri 2023 Puja Items

नवरात्रि पूजन की सामग्री महत्वपूर्ण होती है और इसमें कई आवश्यक चीजें शामिल होती हैं। यह सामग्री पूजा के अवसर पर इस्तेमाल की जाती है और मां दुर्गा की पूजा को समर्पित किया जाता है।

कलश: घटस्थापना के लिए कलश एक महत्वपूर्ण भूषण होता है।

मिट्टी का पात्र: जौ बोने के लिए मिट्टी का पात्र का उपयोग किया जाता है।

गंगाजल: पूजा में शुद्धता के लिए गंगाजल का उपयोग होता है।

रोली, कलावा: रोली और कलावा पूजा सामग्री के रूप में उपयोग होते हैं।

सुपारी, दूर्वा, पीपल या आम के पत्ते: ये भी पूजा के लिए आवश्यक होते हैं।

नारियल: रेशेदार ताजा नारियल पूजा में उपयोग होता है।

हवन के लिए सूखा नारियल: हवन के लिए सूखा नारियल बनाने में मदद करता है।

कलश के ढक्कन: कलश को ढकने के लिए मिट्टी या तांबे का ढक्कन उपयोग होता है।

हवन सामग्री: हवन के लिए आवश्यक सामग्री भी तैयार की जाती है।

कुंकुम, सिन्दुर, सुपारी, चावल, पुष्प, इलायची, लौग, पान, दुध, घी, शहद, बिल्वपत्र, यज्ञोपवीत, चन्दन, इत्र, चौकी, फल, दीप, नैवैध(मिठाई), नारियल आदि।

माता के श्रृंगार की सामग्री

माता के शिर्न्गर के लिए मोतियों या फूलों की माला, सुंदर सी साड़ी, माता की चुनरी, कुमकुम, लाल बिंदी, लाल चूड़ियां, सिंदूर, शीशा, मेहंदी आदि खरीदें।

कलश का महत्व- Importance of kalash

विशेष धारणा का पात्र – कलश

कलश का महत्व हमारे पौराणिक और धार्मिक परंपरा में महत्वपूर्ण है। यह एक पवित्र जल से भरा जाता है और श्रद्धा और पवित्रता का प्रतीक होता है।

कलश के गले में कलावा बाँधने का महत्व

कलावा का अर्थ है पात्रता को आदरणीय तरीके से बाँधना। यह एक प्रतीक है कि हम पात्रता को ईश्वर के साथ जोड़ना चाहते हैं।

नारियल का महत्व

नारियल हमारे धार्मिक उपकरणों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है और सुख-सौभाग्य की वर्षा करता है।

कलश स्थापना के लिए सामग्री

कलश स्थापना के लिए निम्नलिखित सामग्री की आवश्यकता होती है:

कलश: यह तांबे, कासा या मिट्टी का कलश होता है, जिसमें पात्रता को स्थापित किया जाता है।

घेरा (ईडली): कलश को नीचे रखने के लिए एक घेरा या ईडली की आवश्यकता होती है।

शुद्ध जल: पवित्र जल कलश में भरने के लिए शुद्ध और पवित्र जल की आवश्यकता होती है।

कलावा: कलश के गले में कलावा बाँधने के लिए कलावा की आवश्यकता होती है।

मंगल द्रव्य: कलश में दूर्वा, कुश, पूगीफल, पुष्प और पल्लव डालने के लिए मंगल द्रव्य की आवश्यकता होती है।

पाँच उपचार पूजन

कलश स्थापना के पाँच महत्वपूर्ण उपचार पूजन

1. घटस्थापन

इस उपचार में, कलश को उच्च स्थान पर स्थापित किया जाता है। मन्त्रों के साथ कलश को निर्धारित स्थान या चौकी पर स्थापित किया जाता है, और भावना की जाती है कि हम अपने प्रभाव क्षेत्र की पात्रता को ईश्वर के चरणों में स्थापित कर रहे हैं।

मंत्र:

“ॐ आजिग्घ्र कलशं मह्या, त्वा विशन्त्विन्दवः।

पुनरूर्जा निवर्त्तस्व, सा नः सहस्रं धुक्ष्वोरुधारा, पयस्वती पुनर्मा विशताद्रयिः।।”

2. जलपूरण

इस उपचार में, कलश में शुद्ध जल डाला जाता है, और भावना की जाती है कि समर्पित पात्रता का खालीपन श्रद्धा, संवेदना, तरलता, और सरलता से भरा जा रहा है।

मंत्र:

“ॐ वरुणस्योत्तम्भनमसि, वरुणस्य स्कम्भसर्जनी स्थो,

वरुणस्यऽऋतसदन्यसि, वरुणस्यऽऋत सदनमसि, वरुणस्यऽऋतसदनमासीद॥”

3. मंगल द्रव्य स्थापन

इस उपचार में, मंत्रों के साथ कलश में दूर्वा, कुश, पूगीफल, पुष्प और पल्लव डाले जाते हैं, और भावना की जाती है

मंत्र:

“ॐ त्वां गन्धर्वाऽअखनँस्त्वाम्, इन्द्रस्त्वां बृहस्पतिः।

त्वामोषधे सोमो राजा, विद्वान्यक्ष्मादमुच्यत॥”

4. सूत्रवेष्टन

इस उपचार में, कलश में कलावा बाँधा जाता है। इससे पात्रता को अवाञ्छनीयता से जोड़ने का अवसर नहीं दिया जाता है और उसे आदरणीय तरीके से अनुबंधित किया जाता है, ईश्वर के अनुशासन में बाँधा जाता है।

मंत्र:

“ॐ सुजातो ज्योतिषा सह, शर्मवरूथ माऽसदत्स्वः।

वासोऽ अग्ने विश्वरूपœ, सं व्ययस्व विभावसो॥”

5. नारियल संस्थापन

इस उपचार में, कलश के ऊपर नारियल रखा जाता है। इसके माध्यम से दिखाया जाता है कि पात्रता सुख-सौभाग्य की आधार बन रही है और यह दिव्य कलश जो स्थापित हुआ है, वहाँ की जड़-चेतना सारी पात्रता इन्हीं संस्कारों से भर रही है।

मंत्र:

“ॐ याः फलिनीर्या ऽ अफला, अपुष्पा याश्च पुष्पिणीः।

बृहस्पतिप्रसूतास्ता, नो मुञ्चन्त्वœ हसः।।”

नवरात्री में कलश स्थापना कैसे करें? Kalash Sthapana Kaise Kare ?

यदि आप अपने घर में कलश स्थापना कर रहे हैं, तो सबसे पहले कलश पर स्वास्तिक बनाएं। फिर कलश पर मौली बांधें और उसमें जल भरें। कलश में साबुत सुपारी, फूल, इत्र और पंचरत्न व सिक्का डालें। इसमें अक्षत भी डालें।

कलश स्थापना हमेशा शुभ मुहूर्त में करनी चाहिए। नित्य कर्म और स्नान के बाद ध्यान करें।

इसके बाद पूजन स्थल से अलग एक पाटे पर लाल व सफेद कपड़ा बिछाएं।

इस पर अक्षत से अष्टदल बनाकर इस पर जल से भरा कलश स्थापित करें। कलश का मुँह खुला न रखें, उसे किसी चीज़ से ढक देना चाहिए।

अगर कलश को किसी ढक्कन से ढका है, तो उसे चावलों से भर दें और उसके बीचों-बीच एक नारियल भी रखें।

इस कलश में शतावरी जड़ी, हलकुंड, कमल गट्टे व रजत का सिक्का डालें।

दीप प्रज्वलित कर इष्ट देव का ध्यान करें। तत्पश्चात देवी मंत्र का जाप करें।

अब कलश के सामने गेहूं व जौ को मिट्टी के पात्र में रोंपें।

इस ज्वारे को माताजी का स्वरूप मानकर पूजन करें। अंतिम दिन ज्वारे का विसर्जन करें।

कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त- Kalash Sthapana Muhurat

घटस्थापना मुहूर्त 15 अक्टूबर को सुबह 11 बजकर 44 मिनट से शुरू होगा और दोपहर 12 बजकर 30 मिनट पर समाप्त होगा। घटस्थापना की कुल अवधि 46 मिनट होती है, जिसमें पूजा की समय सीमा शामिल होती है

Kalsh Sthapana Mantra

कलशस्य मुखे विष्णु: कंठे रुद्र: समाश्रित:। मूले तत्र स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणा: स्मृता:।। कुक्षौ तु सागरा: सर्वे सप्तद्वीपा वसुंधरा। ऋग्वेदोअथ यजुर्वेद: सामवेदो ह्यथवर्ण:।। अंगैच्श सहिता: सर्वे कलशं तु समाश्रिता:। अत्र गायत्री सावित्री शांतिपृष्टिकरी तथा। आयांतु मम शांत्यर्थ्य दुरितक्षयकारका:।। सर्वे समुद्रा: सरितस्तीर्थानि जलदा नदा:। आयांतु मम शांत्यर्थ्य दुरितक्षयकारका:।।

कलश के मुख में विष्णुजी, कण्ठ में रुद्र, मूल में ब्रह्मा और कलश के मध्य में सभी मातृशक्तियां निवास करती हैं। कलश स्थापना का अर्थ है नवरात्रि के समय ब्रह्मांड में उपस्थित शक्तितत्त्व का घट अर्थात कलश में आवाहन कर उसे सक्रिय करना। शक्तितत्व के कारण वास्तु में उपस्थित कष्टदायक तरंगे नष्ट हो जाती हैं। नवरात्र के पहले दिन पूजा की शुरुआत दुर्गा पूजा निमित्त संकल्प लेकर ईशानकोण में कलश-स्थापना करके की जाती है।

नवरात्री तिथि-Navratri Date 2023

नवरात्री के दौरान, तिथियों का महत्व विशेष रूप से माना जाता है। नवरात्री का पूरा आयोजन नवमी तिथि के अगले दिन तक चलता है, जब दशमी तिथि का विसर्जन होता है। इसके पहले नौ दिन के अवसर पर, नवरात्री के प्रत्येक दिन का महत्वपूर्ण होता है, और भक्त विशेष रूप से देवी दुर्गा की पूजा करते हैं।

यह तिथियाँ अनुसरणीय होती हैं और नवरात्री के पूजन और उपासना का अवसर प्रदान करती हैं। इस दौरान, विशेष रूप से बड़े मन्त्र, आरती, और पूजन क्रियाओं का आयोजन किया जाता है, जो नवरात्री के महत्वपूर्ण हिस्से होते हैं।

नवरात्री के नौ दिनों के अवसर पर भक्त देवी की आराधना करते हैं और उनके प्रति अपनी अद्भुत श्रद्धा का प्रकटीकरण करते हैं। यह तिथियाँ नारी शक्ति की महत्वपूर्ण प्रतीक होती हैं और उनके अवसर पर मां दुर्गा का आशीर्वाद प्राप्त करने की कोशिश की जाती है।

15 अक्टूबर 2023- मां शैलपुत्री की पूजा

16 अक्टूबर 2023- मां ब्रह्मचारिणी की पूजा

17 अक्टूबर 2023- मां चंद्रघंटा की पूजा

18 अक्टूबर 2023- मां कुष्मांडा की पूजा

19 अक्टूबर 2023- मां स्कंदमाता की पूजा

20 अक्टूबर 2023- मां कात्यायनी की पूजा

21 अक्टूबर 2023- मां कालरात्रि की पूजा

22 अक्टूबर 2023- मां सिद्धिदात्री की पूजा

23 अक्टूबर 2023- मां महागौरी की पूजा

24 अक्टूबर 2023 – मां दुर्गा विसर्जन, (दशहरा) विजयादशमी, शस्त्र पूजन दिवस

नवरात्रि उपवास की सामग्री-Navratri Fasting Items

नवरात्रि के उपवास के लिए सात्विक भोजन के लिए घी, मूंगफली, सिंघाड़े का आटा या कुट्टू का आटा, मखाना, आलू, लौकी, हरी मिर्च, व्रत में खाई जाने वाली सब्जी और ताजे फल आदि सामग्री घर लाएं।

नवरात्रि के पहले दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें। स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा स्थल को साफ करें। मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित करें। फिर कलश रखें। इसके बाद मिट्टी के घड़े के गले में पवित्र धागा बांधे। कलश को भरपूर मिट्टी और अनाज के बीज से भरें। इसके बाद कलश में पवित्र जल भी भरकर रखें। फिर सुपारी, गंध, अक्षत, दूर्वा घास, सिक्के डालें। कलश के मुख पर एक साबुत नारियल रखें। कलश को आम के पत्तों से सजाएं। इसके बाद माता रानी की पूजा आरंभ करें।

सबसे पहले माता रानी का श्रृंगार करें। माता रानी को फल, फूल, धूप, दीप आदि चढ़ाएं। माता रानी को सुंदर फूलों की माला पहनाएं। इसके बाद उन्हें चुनरी उढ़ाएं। मां के मंत्रों का जाप करें। मां दुर्गा के ‘दुर्गासप्तशती स्तोत्र’ का पाठ करें। फिर मां को उनके प्रिय व्यंजन का भोग लगाएं। मां की आरती उतारें और भोग वितरित करें। 

शारदीय नवरात्री में आदि शक्ति माँ दुर्गा के नौ दिनों में अलग अलग रूप की आराधना पूजा किया जाता है

माँ की मूर्ति या तसवीर स्थापना:-माँ दुर्गा जी की मूर्ती या तसवीर को लकड़ी की चौकी पर लाल अथवा पीले वस्त्र(अपनी सुविधानुसार) के उपर स्थापित करना चाहिए। जल से स्नान के बाद, मौली चढ़ाते हुए, रोली अक्षत(बिना टूटा हुआ चावल), धूप दीप एवं नैवेध से पूजा अर्चना करना चाहिए।

अखण्ड ज्योति:-नवरात्र के दौरान लगातार नौ दिनो तक अखण्ड ज्योति प्रज्जवलित की जाती है। किंतु यह आपकी इच्छा एवं सुविधा पर है। आप केवल पूजा के दौरान ही सिर्फ दीपक जला सकते है।

आसन:-लाल अथवा सफेद आसन पूरब की ओर बैठकर नवरात्रि करने वाले विशेष को पूजा, मंत्र जप, हवन एवं अनुष्ठान करना चाहिए।

नवरात्र पाठ:-माँ दुर्गा की साधना के लिए श्री दुर्गा सप्तशती का पूर्ण पाठ अर्गला, कवच, कीलक सहित करना चाहिए।

भोगप्रसाद:- प्रतिदिन देवी एवं देवताओं को श्रद्धा अनुसार विशेष अन्य खाद्द्य पदार्थो के अलावा हलुए का भोग जरूर चढ़ाना चाहिए।

नौ दिन तक चलने वाले इस महायोग में आप माता को निम्न भोग लगाये:- प्रथम दिन घी का, दूसरे दिन शक्कर का, तीसरे दिन दूध, चौथे दिन मालपुआ, पांचवें दिन केला, छठे दिन शहद, सातवें दिन गुड़, आठवें दिन नारियल, नौंवे दिन काले तिल का भोग लगाने से माता प्रसन्न होती है।

विसर्जन:- विजयादशमी के दिन समस्त पूजा हवन इत्यादि सामग्री को किसी नदी या जलाशय में विसर्जन करना चाहिए।

संकल्प:- दाहिने हाथ मे गंगा जल, कुंकुम, लाल पुष्प, चावल ले कर संकल्प करे

संकल्प करने की विधि: Sankalp Karne ki Vidhi

पूजा स्थल की तैयारी: संकल्प करने से पहले, पूजा स्थल को साफ़ और शुद्ध रूप में तैयार करें। एक सफेद कपड़ा या आसन पर बैठें।

मौन रहें: संकल्प करने से पहले, आपको निरंतरता और शांति के साथ बैठना है। किसी भी तरह की बहस और बक-बक से बचें।

मानसिक तैयारी: आपको यह विचार करना होगा कि आपका संकल्प क्या होगा और क्या उद्देश्य होंगे। आपका संकल्प व्यक्तिगत या आध्यात्मिक भी हो सकता है।

प्रारंभिक मंत्र: संकल्प करने के पहले, आपको कुछ प्रारंभिक मंत्रों का उच्चारण करना होगा, जैसे “ओम श्री गणेशाय नमः” या “ओम नमः शिवाय”। इससे मन को शुद्ध करें और ध्यान केंद्रित करें।

संकल्प का देवता के साथ संबंधित होना: आपका संकल्प किस देवता या देवी के साथ संबंधित होना चाहिए। यदि आप किसी विशेष देवता के संकल्प कर रहे हैं, तो उनकी मूर्ति या तस्वीर के सामने बैठें।

संकल्प का उच्चारण: आपको अब अपना संकल्प ज़ोरदार आवाज़ में उच्चारण करना है। आपको अपने संकल्प के उद्देश्य और लक्ष्य को स्पष्ट रूप से व्यक्त करना होगा।

संकल्प की स्वीकृति: संकल्प करने के बाद, आपको इसे देवता की प्रसाद मानकर आदरपूर्वक स्वीकार करना होगा।

ध्यान और धारणा: संकल्प करने के बाद, आपको ध्यान और धारणा करनी चाहिए जो आपके संकल्प को पूरा करने में मदद करेगी।

संकल्प करते समय यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि आपका मन पूरी तरह से शांत और लक्ष्य में निहित हो, और आपका संकल्प पूर्णत: स्पष्ट और समर्थ हो। संकल्प करने से पहले सीधे हाथ में कुंकुम, लाल पुष्प, गंगाजल, अक्षत और कुछ धन रख कर मुट्ठी बंद करे और उसे बाये हाथ की हथेली के ऊपर रखकर ही संकल्प पढ़े

“ॐ विष्णु र्विष्णु: श्रीमद्भगवतो विष्णोराज्ञाया प्रवर्तमानस्य, अद्य, श्रीबह्मणो द्वितीय प्ररार्द्धे श्वेत वाराहकल्पे जम्बूदीपे भरत खण्डे आर्यावर्तैक देशान्तर्गते, मासानां मासोत्तमेमासे अश्वनी मासे शुक्ल पक्षे प्रतिपदा तिथौ ……..वासरे (अपने गोत्र का उच्चारण करें) गोत्रोत्पन्न: (अपने नाम का उच्चारण करें) नामा: अहं (सपरिवार/सपत्नीक) सत्प्रवृतिसंवर्धानाय, लोककल्याणाय, आत्मकल्याण्य, ………..(अपनी कामना का उच्चारण करें) कामना सिद्दयर्थे दुर्गा पूजन विद्यानाम तथा साधनाम करिष्ये।“

कुन्जिका स्तोत्रं : Kunjika Strotra

श्री दुर्गा सप्तसती में वर्णित अत्यंत प्रभावशली सिद्धि कुन्जिका स्त्रोत्र प्रस्तुत कर रहा हूँ इस सिद्धि कुन्जिका स्त्रोत्र का नित्य पाठ करने से संपूर्ण श्री दुर्गा सप्तशती पाठ का फल मिलता है ..

यह महामंत्र देवताओं को भी दुर्लभ नहीं है , इस मंत्र का नित्य पाठ करने से माँ भगवती जगदम्बा की कृपा बनी रहती है ..

शिव उवाच

शृणु देवि प्रवक्ष्यामि कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम्‌

येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजापः भवेत्‌॥1

कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं रहस्यकम्‌

सूक्तं नापि ध्यानं न्यासो वार्चनम्‌॥2

कुंजिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत्‌

अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम्‌॥ 3

गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरिव पार्वति।

मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम्‌

पाठमात्रेण संसिद्ध्‌येत् कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम्‌ ॥4

अथ मंत्र

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ॐ ग्लौ हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा

॥ इति मंत्रः॥

नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि।

नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिन ॥1

नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै निशुम्भासुरघातिन ॥2

जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरुष्व मे।

ऐंकारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका॥3

क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते।

चामुण्डा चण्डघाती यैकारी वरदायिनी॥ 4

विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मंत्ररूपिण ॥5

धां धीं धू धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी।

क्रां क्रीं क्रूं कालिका देविशां शीं शूं मे शुभं कुरु॥6

हुं हु हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी।

भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः॥7

अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं

धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा॥

पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा॥ 8

सां सीं सूं सप्तशती देव्या मंत्रसिद्धिंकुरुष्व मे॥

इदंतु कुंजिकास्तोत्रं मंत्रजागर्तिहेतवे।

अभक्ते नैव दातव्यं गोपितं रक्ष पार्वति॥

यस्तु कुंजिकया देविहीनां सप्तशतीं पठेत्‌

तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा॥

इतिश्रीरुद्रयामले गौरीतंत्रे शिवपार्वती संवादे कुंजिकास्तोत्रं संपूर्णम्‌

दुर्गा क्षमा-प्रार्थना मंत्र: Kshma Prathna Mantra

अपराधसहस्त्राणि  क्रियन्तेऽहर्निशं मया।

दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वरि॥ 1

आवाहनं जानामि जानामि विसर्जनम्।

पूजां चैव जानामि क्षम्यतां परमेश्वरि ॥ 2

मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि।

यत्पूजितं मया देवि परिपूर्णं तदस्तु मे ॥ 3

अपराधशतं कृत्वा जगदम्बेति चोच्चरेत्।

यां गतिं समवाण्नोति तां ब्रह्मादयः सुराः॥ 4

सापराधोऽस्मि शरणं प्राप्तस्त्वां जगदम्बिके।

इदानीमनुकम्प्योऽहं यथेच्छसि तथा कुरु ॥ 5

अज्ञानाद्विस्मृतेभ्र्रान्त्या यन्न्यूनमधिकं कृतम्।

तत्सर्वं क्षम्यतां देवि प्रसीद परमेश्वरि॥ 6

कामेश्वरि जगन्मातः सच्चिदानन्दविग्रहे।

गृहाणार्चामिमां प्रीत्या प्रसीद परमेश्वरि॥ 7

गुह्यातिगुह्यगोप्नी त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपम्।

सिद्धिर्भवतु मे देवि त्वत्प्रसादात्सुरेश्वरि॥ 8॥

क्षमा प्रार्थना मंत्र हिंदी अनुवाद

1. हे परमेश्वरी मेरे द्वारा रात-दिन बहुत से अपराध होते रहते है। मुझे अपना दास समझकर मेरे उन अपराधों को आप कृपा पूर्वक क्षमा करिये।

2. परमेश्वरी मैं आवाहन करना नहीं जानता, विसर्जन करना नहीं जानता तथा पूजा करने का ढंग भी नहीं जानता। हे माँ मुझे क्षमा करिए।

3. देवि सुरेश्वरि मैने जो मन्त्रहीन (ना मंत्रो को जानता हूँ), कियाहीन (ना क्रियाओ को जानता हूँ), और भक्तिहीन (ना भक्ति के प्रकार जानता हूँ) पूजन किया है, वह सब आपकी कृपा से पूरे हों ।

4. सैकड़ों अपराध करने के बाद भी जो आपके शरण में आ के जगदम्बा कहकर पुकारता है, उसे वह गति प्राप्त होती है, जो ब्रम्हादि देवताओं के लिये भी पाना आसान नहीं है।

5. जगदम्बिके ! मैं अपराधी हूँ, किंतु आपकी शरण में आया हूँ। इस समय दया का पात्र हूँ। आप जैसा चाहे, वैसा करे।

6. हे देवी परमेश्वरी अज्ञान वस, भूल से या बुद्धि भ्रष्ट होने के कारण मैं ने जो भी न्यूनता या अधिकता कर दी हो, वह सब क्षमा करें और प्रसन्न हों ।

7. सच्चिदानन्दस्वरूपा परमेश्वरि! जगतमाता कामेश्वरि ! आप प्रेमपूर्वक मेरी यह पूजा स्वीकार करें और मुझ पर प्रसन्न रहें ।

8. देवि! सुरेश्वरि! आप गोपनीय से भी गोपनीय वस्तु की रक्षा करने वाली हैं। मेरे निवेदन किये हुए इस जपको ग्रहण करिये। आपकी कृपा से मुझे सिद्धि प्राप्त हो।

इस प्रकार क्षमा प्रार्थना मंत्र के पाठ से दुर्गा माता आप के जाने अनजाने में हुए सारे अपराधों को क्षमा करेंगी और उनकी कृपा सदैव आपके ऊपर बनी रहेगी ।

आरती अंबे जी की

आरती अंबे जी की के ध्वनि से मन में उत्साह उमड़ता है। मां शेरवाली की महिमा का गान करते सभी भक्त अपने मन को शांति और आनंद से भरते हैं। इस पावन आरती में मां अंबे के महत्वपूर्ण गुणों की महिमा होती है, जो हमें आदर्श और प्रेरणा प्रदान करते हैं। यह आरती भक्तों के दिलों को सुख, शांति, और आत्मा की ऊर्जा से भर देती है।

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी ।

तुमको निशदिन ध्यावत । हरि ब्रह्मा शिवरी ॥

ॐ जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी ॥

मांग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को|

उज्ज्वल से दोउ नैना,  चंद्रवदन नीको ॥

ॐ जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी ॥

कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै ।

रक्तपुष्प गल माला कंठन पर साजै ॥

ॐ जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी ॥

केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी ।

सुर-नर-मुनिजन सेवत, तिनके दुखहारी ॥

ॐ जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी ॥

कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती ।

कोटिक चंद्र दिवाकर, सम राजत ज्योती ॥

ॐ जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी ॥

शुंभ-निशुंभ बिदारे, महिषासुर घाती ।

धूम्र विलोचन नैना, निशदिन मदमाती ॥

ॐ जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी ॥

चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे ।

मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे ॥

ॐ जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी ॥

ब्रह्माणी, रूद्राणी, तुम कमला रानी ।

आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी ॥

ॐ जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी ॥

चौंसठ योगिनी मंगल गावत, नृत्य करत भैरों ।

बाजत ताल मृदंगा, अरू बाजत डमरू ॥

ॐ जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी ॥

तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता|

 भक्तन की दुख हरता,  सुख संपति करता ॥

ॐ जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी ॥

भुजा चार अति शोभित, खडग खप्पर धारी ।

मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी ॥

ॐ जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी ॥

कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती ।

श्रीमालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योती ॥

ॐ जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी ॥

श्री अंबेजी की आरति, जो कोई नर गावे ।

कहत शिवानंद स्वामी, सुख -संपति पावे ॥

 ॐ जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी ॥

नवरात्रि के नौ दिन: मां दुर्गा के नौ रूप-The Nine Forms of Goddess Durga

भारतीय संस्कृति में नवरात्रि का महत्वपूर्ण स्थान है, जिसमें मां दुर्गा के नौ विभिन्न रूपों की पूजा की जाती है। यह नौ दिन का त्योहार हर साल आवागमन होता है और हम सभी भक्त इसे बड़े श्रद्धा भाव से मनाते हैं। इस लेख में, हम आपको बताएंगे कि नवरात्रि के प्रत्येक दिन मां दुर्गा के कौन-कौन से रूप पूजे जाते हैं और उनके भोग कैसे चढ़ाते हैं।

नव दुर्गा देवियों के मंत्र-Nav Durga Mantra

नवरात्रि का पहला दिन – शैलपुत्री देवी- Kaun hai Devi Shailputri

पहली दुर्गा शैलपुत्री हैं । ये पर्वतों के राजा हिमवान् की पुत्री तथा नौदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा हैं। ये पूर्वजन्म में दक्षप्रजापति की कन्या सती भवानी- अर्थात् भगवान् शिव की पत्नी थीं। जब दक्ष ने यज्ञ किया, तब उसने शिवजी को यज्ञ में नहीं बुलाया। सती अत्याग्रहपूर्वक वहाँ पहुँची तो दक्ष ने शिव का अपमान भी किया।

पति के अपमान को सहन न कर सती ने अपने माता एवं पिता की उपेक्षा कर योगाग्नि द्वारा अपने शरीर को जलाकर भस्म कर दिया। फिर जन्मान्तर में पर्वतों के राजा हिमवान् की पुत्री ‘पार्वती- हैमवती’ बनकर पुनः शिव की अर्धांगिनी बनीं।
प्रसिद्ध औपनिषद कथानुसार जब इन्हीं भगवती हेमवती ने इन्द्रादि देवों का वृत्रवधजन्य अभिमान खण्डित कर दिया, तब वे लज्जित हो गये। उन्होंने हाथ जोड़कर उनकी स्तुति की और स्पष्ट कहा ‘वस्तुतः आप ही शक्ति है’ आपसे ही शक्ति प्राप्त कर हम सब- ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव भी शक्तिशाली हैं। आपकी जय हो, जय हो।

ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः॥

शैलपुत्री की प्रार्थना:

वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्ध कृतशेखराम् ।

वृषारूढाम् शूलधराम् शैलपुत्रीम् यशस्विनीम् ॥

अर्थ : मैं अपनी वंदना/श्रद्धांजलि देवी मां शैला-पुत्री को देता हूं, जो भक्तों को सर्वोत्तम वरदान देती हैं। अर्धचंद्राकार चंद्रमा उनके माथे पर मुकुट के रूप में सुशोभित है। वह बैल पर सवार है। वह अपने हाथ में एक भाला रखती है। वह यशस्विनी हैं – प्रसिद्ध माँ दुर्गा।

नवरात्रि का दूसरा दिन – ब्रह्मचारिणी देवी-Kaun hai Devi Brahmcharini

दूसरी दुर्गा शक्ति ब्रह्मचारिणी हैं। ब्रह्म अर्थात् तप की चारिणी-आचरण करने वाली हैं । यहाँ ‘ब्रह्म’ शब्द का अर्थ ‘तप’ है। ‘वेदस्तत्त्वं तपो ब्रह्म’- इस कोष-वचन के अनुसार वेद, तत्व एवं तप ‘ब्रह्म’ शब्द के अर्थ हैं। ये देवी ज्यातिर्मयी भव्यमूर्ति है। इनके दाहिने हाथ में जप की माला और बायें हाथ में कमण्डलु है तथा ये आनन्द से परिपूर्ण हैं |

इनके विषय में ये कथानक प्रसिद्ध हैं कि ये पूर्व जन्म मेंं हिमवान् की पुत्री पार्वती हेमवती थी। एक बार अपनी सखियों के साथ क्रीड़ा में रत थीं। उस समय इधर-उधर घूमते हुये नारद जी वहाँ पहुँचे और इनकी हस्त रेखाओं को देखकर बोले- ‘तुम्हारा तो विवाह उसी भोले बाबा से होगा जिनके साथ पूर्वजन्म में भी तुम दक्ष की कन्या सती के रूप में थीं’ किन्तु इसके लिये तुम्हें तपस्या करनी पड़ेगी नारद जी के चले जाने के बाद पार्वती ने अपनी माता मेनका से कहा की ‘वरउँ संभु न त रहउँ कुआरी।’

यदि मैं विवाह करूँगी तो भोले-बाबा शम्भु से ही करूँगी, अन्यथा कुआरी ही रहूँगी, इतना कहकर वे (पार्वती) तप करने लगी। इसलिये इनका ‘ब्रह्मचारिणी’ यह नाम प्रसिद्ध हो गया। इतना ही नहीं, जब ये तप करने में लीन हो गयीं, तब मेनका ने इनको ‘पुत्री ! तप मत करो -‘ उ मा तप’ ऐसा कहा तबसे इनका नाम ‘उमा’ भी प्रसिद्ध हो गया ।

ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नम:

ब्रह्मचारिणी की प्रार्थना:

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू।

देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥

अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और ब्रह्मचारिणी के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ।

नवरात्रि का तीसरा दिन – चंद्रघंटा देवी-Kaun hai Devi Chandraghanta

तीसरी शक्ति का नाम चन्द्रघण्टा है। इनके मस्तक में घण्टा के आकार का अर्ध-चन्द्र है। ये लावण्यमयी दिव्यमूर्ति हैं। स्वर्णके सदृश्य इनके शरीर का रंग है। इनके तीन नेत्र और दस हाथ हैं, जिसमें दस प्रकार के खड्ग आदि शस्त्र और बाण आदि अस्त्र हैं।

ये सिंह पर आरूढ़ हैं तथा लड़ने के लिये युद्ध में जाने को उन्मुख हैं। ये वीर रस की अपूर्व मूर्ति हैं। इनके चण्ड- भयंकर घण्टे की ध्वनि से सभी दुष्ट दैत्य दानव एवं राक्षस त्रस्त हो उठतें हैं।

ॐ देवी चंद्रघण्टायै नम:

माँ चंद्रघंटा ध्यान मंत्र:

पिण्डज प्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकैर्युता। प्रसीदम तनुते महयं चन्द्रघण्टेति विश्रुता।।

माँ चंद्रघंटा की प्रार्थना:

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और चंद्रघंटा के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे सब पापों से मुक्ति प्रदान करें।

नवरात्रि का चौथा दिन – कुष्मांडा देवी-Kaun hai Devi Kushmanda

चौथी दुर्गा का नाम कूष्माण्डा है। ईषत् हँसने से अण्ड को अर्थात् ब्रह्माण्ड को जो पैदा करती है, वे शक्ति कूष्माण्डा हैं। ये सूर्यमण्डल के भीतर निवास करती हैं। सूर्य के समान उनके तेज की झलक दसां दिशाओं में व्याप्त है। इनकी आठ भुजायें हैं।

सात भुजाओं में सात प्रकार के अस्त्र चमक रहे हैं तथा दाहिनी भुजा में जप माला है। सिंह पर आसीन होकर ये देदीप्यमान हैं। कुम्हड़े की बलि में इन्हें अतीव प्रिय है। अतएव इस शक्ति का ‘कूष्माण्डा’ यह नाम विश्व में प्रसिद्ध हो गया- ऐसी व्याख्या रूद्रयामल एवं कुन्जिकागम तन्त्र में उपोद्वलित है।

ॐ देवी कुष्माण्डा नम:

सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।

दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे॥

कुष्माण्डा की प्रार्थना:

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और कूष्माण्डा के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे सब पापों से मुक्ति प्रदान करें।

नवरात्रि का पांचवा दिन – स्कंदमाता-Kaun hai Devi Skand Mata

पाँचवीं दुर्गा का नाम स्कन्दमाता है। शैलपुत्री ने ब्रह्मचारिणी बनकर तपस्या करने के बाद भगवान् शिव से विवाह किया तदन्तर स्कन्द उनके नामक पुत्र रूप में उत्पन्न हुये। उनकी माता होने से ये ‘स्कन्द माता’ कहलाती है।

ये स्कन्द देवताओं की सेना का संचालन करने से सेनापति हैं। ये स्कन्दमाता अग्निमण्डल की देवता हैं, स्कन्द इनकी गोद में बैठे हैं। इनकी तीन आँखें व चार भुजायें हैं। ये शुभ्रवर्णा हैं तथा पद्म के आसन पर विराजमान हैं।

ॐ देवी स्कन्दमातायै नम:

सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।

शुभदाऽस्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥

स्कंदमाता की प्रार्थना:

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ स्कंदमाता रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और स्कंदमाता के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे सब पापों से मुक्ति प्रदान करें। इस दिन साधक का मन ‘विशुद्ध’ चक्र में अवस्थित होता है। इनके विग्रह में भगवान स्कंदजी बालरूप में इनकी गोद में बैठे होते हैं।

नवरात्रि का छठा दिन – कात्यायनी देवी-Kaun hai Devi Katyayni

कात्यायनी ये छठी दुर्गा शक्ति का नाम है। ‘कत’ का पुत्र ‘कात्य’ है। इस कात्य के गोत्र में पैदा होने वाले ऋषि कात्यायन हुए । इसी नाम के कात्यायन आचार्य हुए हैं, जिन्होंने पाणिनिकी अष्टाध्यायी की पूर्ति करने के लिये ‘वार्तिक’ बनाये हैं इन्हीं को ‘वररूचि’ भी कहते हैं।

इन कात्यायन ऋषि ने इस धारणा से भगवती पराम्बा की तपस्या की कि आप मेरी पुत्री हो जायें। भगवती ऋषि की भावना की पूर्णता के लिये उनके यहाँ ये पुत्री के रूप में अवतीर्ण हुई। इससे इनका नाम ‘कात्यायनी’ पड़ा।

वृन्दावन की गोपियों ने श्रीकृष्ण को पति-रूप में पाने के लिये मार्गशीर्ष के महीने में कालिन्दी-यमुना नदी के तट पर ‘कात्यायनी’ की पूजा की थी। इससे सिद्ध है कि यह वज्रमण्डल की अधीश्वरी देवी हैं। इनका स्वर्णमय दिव्य स्वरूप है। इनके तीन नेत्र तथा आठ भुजाएँ हैं। इन आठ भुजाओं में आठ प्रकार के अस्त्र-शस्त्र हैं। इनका वाहन सिंह है।

ॐ देवी कात्यायन्यै नम:

स्वर्णाआज्ञा चक्र स्थितां षष्टम दुर्गा त्रिनेत्राम्।

वराभीत करां षगपदधरां कात्यायनसुतां भजामि॥

चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।

कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानव-घातिनी॥

कात्यायनी की प्रार्थना:

या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥

अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और शक्ति -रूपिणी प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ।

इसके अतिरिक्त जिन कन्याओ के विवाह मे विलम्ब हो रहा हो, उन्हे इस दिन माँ कात्यायनी की उपासना अवश्य करनी चाहिए, जिससे उन्हे मनोवान्छित वर की प्राप्ति होती है।

ॐ कात्यायनी महामाये महायोगिन्यधीश्वरि ।

नंदगोपसुतम् देवि पतिम् मे कुरुते नम:॥

नवरात्रि का सातवां दिन – कालरात्रि देवी-Kaun hai Devi Kalratri

सातवीं दुर्गा शक्ति का नाम ‘कालरात्रि’ है। इनके शरीर का अंग अंधकार की तरह गहरा काला है। इनके सिर के केश बिखरे हुए हैं। इनके गले में विद्युत्-सदृश चमकीली माला है। इन तीन नेत्रों से विद्युत् की ज्योति चमकती रहती है।

नासिका से श्वास-प्रश्वास छोड़ने पर हजारों अग्नि की ज्वालाएँ निकलती रहती हैं। ऊपर उठे हुये दाहिने हाथ में चमकती तलवार है। उसके नीचे वाले हाथ में वरमुद्रा है, जिससे भक्तों को अभीष्ट वर देती हैं।

बाँयें हाथ में जलती हुई मसाल है और उसके नीचे वाले बाँयें हाथ में अभय-मुद्रा है जिससे अपने सेवकों को अभयदान करती और अपने भक्तों को सब प्रकार के कष्टों से मुक्त करती हैं। अतएव शुभ करने से यह ‘शुभंकरी’ भी हैं।

ॐ देवी कालरात्र्यै नम:

एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।

लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी॥

वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा।

वर्धन्मूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी॥

ॐ ऐं ह्रीं क्रीं कालरात्रै नमः |

कालरात्रि की प्रार्थना:

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और कालरात्रि के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे पाप से मुक्ति प्रदान करें ।

नवरात्रि का आठवां दिन – महागौरी देवी-Kaun hai Devi Mahagauri

आठवीं दुर्गा-शक्ति का नाम ‘महागौरी’ है। इनका वर्ण इन्दु एवं कुन्द के सदृश गौर है। इनकी अवस्था आठ वर्ष की है- ‘अष्टवर्षा भवेद् गौरी।’ इनके वस्त्र एवं आभूषण सभी श्वेत, स्वच्छ है। इनके तीन नेत्र हैं। ये वृषभवाहिनी और चार भुजाओं वाली हैं। ऊपर वाले वामहस्त में अभय-मुद्रा और नीचे के बाँयें हाथ में त्रिशूल है। ऊपर के दक्षिण हस्त में डमरू वाद्य और नीचे वाले दक्षिण हस्त में वरमुद्रा है। यह सुवासिनी, ये शान्तमूर्ति और शान्त-मुद्रा हैं।


‘नारद-पाञ्चरात्र’ में लिखा है कि ‘व्रियेऽहं वरदं शम्भुं नान्यं देवं महेश्वरात।’ इस प्रतिज्ञा के अनुसार शभ्भु की प्राप्ति के लिये हिमालय में तपस्या करते समय गौरी का शरीर धूल-मिट्टी से ढककर मलिन हो गया था। जब शिवजी ने गंगाजल से मलकर उसे धोया, तब महागौरी का शरीर विद्युत् के सदृश कान्तिमान् हो गया-अत्यन्त गौर हो गया। इसी से ये विश्व में ‘महागौरी’ के नाम से प्रसिद्ध हुई।

ॐ देवी महागौर्यै नमः॥

सर्वमंगल मंग्ल्ये, शिवे सर्वार्थ साधिके।

शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोस्तुते॥

श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः।

महागौरी शुभं दद्यान्महादेव-प्रमोद-दा॥

महागौरी की प्रार्थना:

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ गौरी रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और माँ गौरी के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। हे माँ, मुझे सुख-समृद्धि प्रदान करो।

नवरात्रि का नौवां दिन – सिद्धिदात्री देवी-Kaun hai Devi Siddhidatri

नवीं दुर्गा-शक्ति ‘सिद्धिदात्री’ हैं। मार्कण्डेयपुराण में अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व एवं वशित्व- ये आठ सिद्धियाँ बतलायी गयी हैं। इन सबको देनेवाली ये महाशक्ति हैं।
ब्रह्मवैवर्तपुराण के श्रीकृष्ण-जन्मखण्ड में 1- अणिमा, 2- लघिमा, 3- प्राप्ति, 4- प्राकाम्य, 5- महिमा, 6- ईशित्व, वशित्व, 7- सर्वकामावसायिता, 8- सर्वज्ञत्व, 9- दूरश्रवण, 10- परकायप्रवेशन, 11- वाकसिद्धि, 12- कल्पवृक्षत्व, 13- सृष्टि, 14- संहारकरण सामर्थ्य, 15- अमरत्व, 16- सर्वन्यायकत्व, 17- भावना, 18- सिद्धि ‘सिद्धयोऽष्टादश स्मृताः’ इन अठारह सिद्धियों का उल्लेख है। इन सबको ये देती हैं।
देवीपुराण में कहा गया है कि भगवान् शिव ने इनकी आराधना करके सब सिद्धियाँ पायी और इनकी कृपा से उनका आधा अंग देवी हो गया, जिससे उनका नाम जगत् में -‘अर्द्धनारीश्वर’ प्रसिद्ध हो गया।
ये देवी सिंहवाहिनी तथा चतुर्भजा और सर्वदा प्रसन्नवदना है। दुर्गा के इस स्वरूप की देव, ऋषि-मुनि, सिद्ध, योगी-साधक और भक्त सभी सर्वश्रेय की प्राप्ति के लिये आराधना-उपासना करते हैं।

सिद्धगन्धर्व-यक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि।

सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी।।

गन्धर्व + यक्ष + आद्य -> का अर्थ (स्वर्गलोकनिवासी उपदेवता गण, जिन में गन्धर्व, यक्ष, इत्यादि आद्य हैं), और असुर (राक्षस) , अमर (देव) गण भी, इन सब से जिसकी सेवा होती है ।

सिद्धगन्धर्व-यज्ञज्ञैरसुरैरमरैरपि यह पाठभेद भी दिखता है । यज्ञज्ञ = वह जो यज्ञों के विधान आदि जानता हो

वन्दे वांछित मनोरथार्थ चन्द्रार्घकृत शेखराम्।

कमलस्थितां चतुर्भुजा सिद्धीदात्री यशस्वनीम्॥

स्वर्णावर्णा निर्वाणचक्रस्थितां नवम् दुर्गा त्रिनेत्राम्।

शख, चक्र, गदा, पदम, धरां सिद्धीदात्री भजेम्॥

सिद्धिदात्री की प्रार्थना:

या देवी सर्वभू‍तेषु सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और माँ सिद्धिदात्री के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे अपनी कृपा का पात्र बनाओ।

Days- Colors & Bhog

1. देवी शैलपुत्री: प्रथम दिन

नवरात्रि का पहला दिन मां दुर्गा का पहला रूप देवी शैलपुत्री होता है। इनकी पूजा और अर्चना इस दिन की जाती है। शैलपुत्री को पार्वती या हेमवती के रूप में भी पूजा जाता है। इस दिन शुद्ध देसी घी माता के पैरों पर अर्पित किया जाता है और भोग भी शुद्ध घी का ही बनता है। इसके साथ मां को मीठी खीर जरूर चढ़ानी चाहिए।

नवरात्रि के पहले दिन माता शैलपुत्री की पूजा की जाती है.माना जाता है कि माता शैलपुत्री को पीला रंग बहुत प्रिय है.इसलिए इस दिन पीले रंग के कपड़े पहनकर मां की पूजा करने से मां शैलपुत्री प्रसन्न होती हैं.

2. देवी ब्रह्मचारिणी: दूसरा दिन

नवरात्रि के दूसरे दिन, देवी ब्रह्मचारिणी को समर्पित है। उनका रूप अत्यंत पवित्रता और भक्ति का है। शक्ति के इस रूप को धारण करना तपस्या, त्याग, पुण्य और बड़प्पन की भावना का आह्वान करने के लिए जाना जाता है। देवी ब्रह्मचारिणी सादा भोजन और प्रसाद पसंद करती हैं। उनके लिए आप चीनी और फलों का भोग लगा सकते हैं।

नवरात्रि के दूसरे दिन माता ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना होती है. मान्यता है कि माता ब्रह्मचारिणी को हरा रंग बहुत पसंद है. इसलिए उनकी चुनरी और श्रंगार भी हरे रंग से किया जाता है.भक्तों को उनकी पूजा हरे रंग के कपड़े पहनकर करनी चाहिए.

3. देवी चंद्रघंटा: तीसरा दिन

दुर्गा की तीसरी अभिव्यक्ति देवी चंद्रघंटा होती है। उन्हें क्रोध में दहाड़ते हुए एक 10-सशस्त्र देवी के रूप में चित्रित किया जाता है। नवरात्रि के तीसरे दिन देवी के लिए पकवान बनाए जाते हैं। उनकी पसंद का प्रसाद बनाया जाता है। अगर आप मां दुर्गा को प्रसन्न करना चाहते हैं तो तीसरे दिन दूध, मिठाई या खीर चढ़ाकर उन्हें खुश जरूर करें।

नवरात्रि के तीसरे दिन मां दुर्गा के चंद्रघंटा स्वरूप की पूजा की जाती है.उन्हें भूरा रंग बहुत भाता है.इसलिए उनका वस्त्र विन्यास भी भूरे रंग के कपड़ों से किया जाता है.भक्तों को नवरात्र के तीसरे दिन भूरे रंग के कपड़े पहनकर मां की पूजा करनी चाहिए.

4. देवी कुष्मांडा: चौथा दिन

नवरात्रि के चौथे दिन, मां कुष्मांडा की पूजा की जाती है। कुष्मांडा नाम तीन अन्य शब्दों ‘कू’ (छोटा), ‘ऊष्मा’ (ऊर्जा) और ‘अमंडा’ (अंडा) से बना है जिसका अर्थ है जिसने ब्रह्मांड को ऊर्जा और गर्मी के साथ ‘लिटिल कॉस्मिक एग’ के रूप में बनाया है। देवी के इस रूप की पूजा भव्य तरीके से की जाती है और भोग के रूप में मालपुआ चढ़ाकर देवी की पूजा करते हैं।

नवरात्रि के चौथे दिन मां कुष्मांडा की आराधना की जाती है.मान्यता है कि उन्हें नारंगी रंग बहुत प्रिय है.उनकी पूजा के दौरान सारा श्रंगार भी नारंगी रंग के कपड़ों से किया जाता है.इसलिए भक्तों को उनकी पूजा नारंगी रंग के कपड़े पहनकर करनी चाहिए.

5. देवी स्कंदमाता: पांचवा दिन

मां दुर्गा का पांचवां रूप स्कंदमाता होता है। देवी स्कंदमाता को चार भुजाओं वाली देवी के रूप में दर्शाया जाता है, जो कमंडल और घंटी के साथ अपनी दो भुजाओं में कमल धारण करती है। देवी को केले का भोग लगाया जाता है और कहा जाता है कि इससे भक्तों का स्वास्थ्य अच्छा रहता है।

नवरात्रि के पांचवें दिन मां स्कंदमाता की आराधना की जाती है.माना जाता है कि मां स्कंदमाता को सफेद रंग से बेहद लगाव है. इसलिए उनकी पूजा करते हुए भक्तों को सफेद रंग के कपड़े जरूर पहनने चाहिएं.भक्तों को इस श्रद्धा का फल जरूर मिलता है.

6. देवी कात्यायनी: छठा दिन

देवी कात्यायनी को छठे दिन (षष्ठी) पर पूजा की जाती है, देवी कात्यायनी शक्ति का एक रूप है, जिसे चार भुजाओं वाली और तलवार लिए हुए दिखाया जाता है। भक्त देवी कात्यायनी को प्रसाद के रूप में शहद चढ़ाते हैं। उनका आशीर्वाद उनके जीवन को मिठास से भर देता है और उन्हें कड़वी परेशानियों से छुटकारा दिलाने में मदद करता है।

नवरात्रि के छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा का माना जाता है.मान्यता है कि मां कात्यायनी को लाल रंग काफी प्रिय है.इसे देखते हुए उनका श्रंगार भी लाल रंग के कपडों से किया जाता है.भक्तों को भी मां को प्रसन्न करने के लिए छठे दिन लाल रंग के कपड़े पहनने चाहिए.

7. देवी कालरात्रि: सातवां दिन

नवरात्रि के सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा की जाती है। हिंदू शास्त्रों के अनुसार, देवी कालरात्रि चार भुजाओं वाली देवी हैं। इनका वाहन गर्दभ (गदहा) है। मां कालरात्रि को प्रसन्न करने के लिए भक्त गुड़ या गुड़ से बनी मिठाई का भोग लगाते हैं। इसे दक्षिणा के साथ ब्राह्मणों को प्रसाद में भी दिया जाता है।

नवरात्रि के सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा की जाती है. उन्हें नीला रंग बहुत प्रिय है. उनकी प्रतिमा के वस्त्रों और पूजा के दूसरे सामानों का रंग भी नीला ही रखा जाता है. भक्तों को उनकी आराधना करते हुए नीले रंग के कपड़े धारण करने चाहिए.

8. देवी महागौरी: आठवां दिन

नवरात्रि का आठवां दिन देवी महागौरी को समर्पित है। शास्त्रों के अनुसार, महागौरी को चार भुजाओं वाले देवी के रूप में पूजा जाता है जो बैल या सफेद हाथी पर सवार होती हैं। देवी महागौरी को भक्तों द्वारा नारियल का भोग चढ़ाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि अष्टमी पर ब्राह्मणों को नारियल दान करने से निः संतान दंपति को संतान की प्राप्ति होती है।

नवरात्रि के आठवें दिन मां महागौरी की पूजा की जाती है. उन्हें गुलाबी रंग से बेहद लगाव माना जाता है. इसलिए उन्हें प्रसन्न करने के लिए नवरात्र के आठवें दिन गुलाबी रंग के कपड़े पहनने चाहिए.

9. देवी सिद्धिदात्री: नौवां दिन

नवरात्रि के नौवें दिन, देवी सिद्धिदात्रीकी पूजा की जाती है, जिन्हें कमल पर शांति से बैठे चार भुजाओं के साथ दर्शाया जाता है। उनके पास एक कमल, गदा, चक्र और एक पुस्तक होती है। देवी सिद्धिदात्री पूर्णता का प्रतीक हैं। नवरात्रि के नौवें दिन, भक्त उपवास रखते हैं और भोग के रूप में उन्हें तिल या तिल तेल का चढ़ाते हैं।

नवरात्रि के नौवें और आखिरी दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा-अर्चना की जाती है. माना जाता है कि जामुनी रंग मां सिद्धिदात्री को बहुत भाता है. इसलिए उनकी पूजा करते समय जामुनी रंग के कपड़े) पहनने चाहिए.

अब आप भी 9 दिनों में मां के लिए ये अलग-अलग तरह के भोग बनाकर उन्हें खुश करें। इससे देवी मां की असीम कृपा आप पर बनेगी और आपके काम सिद्ध होंगे।

Note : किसी भी देवी की सिद्धि प्राप्त करने या आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए नवरात्री के दिनों में १ माला प्रतिदिन जाप करे| कात्यायनी देवी की सिद्धि या कृपा प्राप्त करने, शीघ्र विवाह हेतु १ दिन में १०८ माला का जाप करे

नवरात्रि में निषेध वस्तुएँ- Restricted Items During Navratri

प्याज और लहसुन: नवरात्रि के दौरान प्याज और लहसुन का सेवन नहीं किया जाता, क्योंकि इन्हें तामसिक माना जाता है और ये शुभ अवसर के दौरान नहीं खाए जाते।

अल्कोहल: शराब और अन्य अल्कोहोली द्रवियों का सेवन भी नवरात्रि के दौरान नहीं किया जाता, क्योंकि इसे अशुभ माना जाता है।

मांस: नवरात्रि के दौरान मांस का सेवन नहीं किया जाता, क्योंकि यह एक शाकाहारी आहार का समय होता है और भगवान दुर्गा की पूजा के दौरान यह अनुचित माना जाता है।

अभद्र वचन: बुरी भाषा या अशुभ शब्दों का उपयोग भी नवरात्रि के दौरान नहीं किया जाना चाहिए।

नवदुर्गा बीज मंत्र-Nav Durga Beej Mantra

मां शैलपुत्री का बीज मंत्र: “ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं काल्यै नमः।”

मां ब्रह्मचारिणी का बीज मंत्र: “ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्रये नमः।”

मां चंद्रघंटा का बीज मंत्र: “ॐ ऐं व्रीं क्लीं श्रीं चंद्रघण्टायै नमः।”

मां कूष्माण्डा का बीज मंत्र: “ॐ ह्रीं क्लीं हूं ह्रां कूष्माण्डायै नमः।”

मां स्कंदमाता का बीज मंत्र: “ॐ ह्रौं स्क्लीं सौः सौः कारग्रिवस्य बीजपुरायै नमः।”

मां कात्यायनी का बीज मंत्र: “ॐ ह्रीं कात्यायन्यै नमः।”

मां कालरात्रि का बीज मंत्र: “ॐ क्रीं कालरात्र्यै नमः।”

मां महागौरी का बीज मंत्र: “ॐ ऐं नमो महागौर्यै।”

मां सिद्धिदात्री का बीज मंत्र: “ॐ ह्रीं सिद्धिदात्र्यै नमः।”

नवदुर्गा के ध्यान मंत्र: Nav Durga Dhyan Mantra

 नवरात्रि और मां दुर्गा की पूजा में उपयोग किए जाते हैं ताकि भक्त उनकी ध्यान और साकार रूप में आराधना कर सकें। ये मंत्र आपके मानसिक शांति, शक्ति, और साधना को बढ़ावा देने में मदद कर सकते हैं।

मां शैलपुत्री के ध्यान मंत्रShailputri Dhyan Mantra

“वन्दे वाद्द्रिचतलाभिरर्धकुचापारेन्द्रानीम।

रुपां देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।”

मां ब्रह्मचारिणी के ध्यान मंत्रBrahmcharini Dhyan Mantra

“या देवी सर्वभूतेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।”

मां चंद्रघंटा के ध्यान मंत्रChandraganta Dhyan Mantra

“पिण्डजप्रवरारुढ़ा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।

प्रसादं तनुते मह्यम् चंद्रघण्टेति विश्रुता।”

मां कूष्माण्डा के ध्यान मंत्र-Kumanda Dhyan Mantra

“सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।

दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे।”

मां स्कंदमाता के ध्यान मंत्रSkandmata Dhyan Mantra

“सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।

शुभदास्तु सदा देवी स्कंदमाता यशस्विनी।”

मां कात्यायनी के ध्यान मंत्रKatyayani Dhyan Mantra

“चंद्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।

कात्यायनी शुभं दद्याद् देवी दानवघातिनी।”

मां कालरात्रि के ध्यान मंत्रKalratri Dhyan Mantra

“एकवेणी जपाकर्णपूरं तुङ्गे पिङ्गलाध्वजा।

कालरात्रिं शुभं दद्यान् महाकालरात्रिं शुभां गृहे।”

मां महागौरी के ध्यान मंत्रMahagauri Dhyan Mantra

“श्वेते वृषे समारूढ़ा श्वेतांबरधरा शुचिः।

महागौरी शुभं दद्यान् महादेवप्रमोददा।”

मां सिद्धिदात्री के ध्यान मंत्रMaa Siddhidatri Dhyan Mantra

“सिद्धिदात्रीमये देवी सर्वकामप्रदायिनी।

यथा त्वं यथा त्वं कुरु कुरु मां सिद्धयै।”

Navratri 2022:

आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से शारदीय नवरात्रि शुरू होगी। नवरात्र के नौ दिनों में मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। इस साल नवरात्रि 26 सितंबर से शुरू होगी और 5 अक्टूबर को समाप्त होगी। मान्यताओं के अनुसार शारदीय नवरात्र में देवी धरती पर आती हैं और भक्तों को आशीर्वाद देती हैं। इस दौरान भक्त मां आदि शक्ति की कृपा पाने के लिए पूजा और व्रत रखते हैं। नवरात्रि में महाष्टमी और महानवमी तिथि का विशेष महत्व है।

FAQ

नवरात्रि क्या होता है?

नवरात्रि हिन्दू धर्म में मां दुर्गा की पूजा के रूप में मनाया जाने वाला महत्वपूर्ण त्योहार है।

नवरात्रि कब मनाई जाती है?

नवरात्रि वर्ष 2023 में 15 अक्टूबर से शुरू होकर 24 अक्टूबर को समाप्त होगी।

नवरात्रि का क्या महत्व है?

नवरात्रि में मां दुर्गा की नौ दिनों की पूजा करने से भक्त उनके आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

नवरात्रि के दौरान कितने प्रकार की पूजा की जाती है?

नवरात्रि के दौरान, मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है, जिनमें शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, और सिद्धिदात्री शामिल हैं।

नवरात्रि के दौरान रात्रि को कैसे पूजा जाता है?

रात्रि के दौरान, दीप जलाकर मां दुर्गा का आराधना किया जाता है और भजन-कीर्तन किया जाता है।

नवरात्रि के दौरान व्रत क्यों रखा जाता है?

व्रत रखने से भक्त अपनी श्रद्धा और भक्ति के साथ मां दुर्गा की पूजा करते हैं और उनके आशीर्वाद की प्राप्ति करते हैं।


नवरात्रि के दौरान कौन-कौन सी खास खाद्य चीजें खाई जाती हैं?

नवरात्रि के दौरान व्रत के अंतर्गत साबूदाना, कुट्टू के आटे, फल, सिंधाव, और दही जैसी खाद्य चीजें खाई जाती हैं।

नवरात्रि के दौरान दंडिया रास क्या होता है?

दंडिया रास नवरात्रि के दौरान खेले जाने वाले एक पॉपुलर गुजराती नृत्य और संगीत का हिस्सा होता है।

नवरात्रि के दौरान कैसे मां दुर्गा की मूर्ति स्थापित की जाती है?

नवरात्रि के प्रारंभ में, मां दुर्गा की मूर्ति को कलश और मिट्टी के पात्र में स्थापित किया जाता है।

नवरात्रि के दौरान कौन-कौन सी रंगीन पूजाएँ की जाती हैं?

नवरात्रि के दौरान माता की मूर्ति के श्रृंगार के लिए मोतियों या फूलों की माला, साड़ी, चुनरी, कुमकुम, लाल बिंदी, चूड़ियां, सिंदूर, शीशा, मेहंदी, और अन्य रंगीन आभूषण का उपयोग किया जाता है। यह सभी आइटम माता को सुंदरता के साथ सजाने में मदद करती हैं और उनकी पूजा को और भी आकर्षक बनाती है।

मां शैलपुत्री की पूजा कब और कैसे करनी चाहिए?

मां शैलपुत्री की पूजा 15 अक्टूबर 2023 को करनी चाहिए। पूजा में मां की मूर्ति या तस्वीर का स्थापना करें, रंगीन वस्त्र पहनाएं, और फूल और दीपक चढ़ाएं। मां के मंत्रों का जाप करें और व्रत में प्रिय भोग चढ़ाएं।

मां ब्रह्मचारिणी की पूजा के दौरान कौनसे मंत्र पढ़ने चाहिए?

मां ब्रह्मचारिणी की पूजा के समय “ब्रह्मचारिण्यै नमः” मंत्र का जाप करें। इसके साथ, व्रत में दूध, फल, और सिंघाड़े का आटा चढ़ाएं।

मां चंद्रघंटा की पूजा कैसे करें?

मां चंद्रघंटा की पूजा में उनकी मूर्ति को सफेद वस्त्र में धारण करें और चंद्रमा के चिन्ह के साथ पूजन करें। चंद्रघंटा मंत्र का जाप करें और घी, मिष्ठान्न, और फल उनको चढ़ाएं।

मां कुष्मांडा की पूजा में क्या उपासना करें?

मां कुष्मांडा की पूजा में कद्दू की मूर्ति या छायाचित्र का स्थापना करें और कद्दू के बीजों से पूजा करें। कुष्मांडा मंत्र का जाप करें और उनको मिठाई, आलू, और सिंधाड़े का आटा चढ़ाएं।

मां स्कंदमाता की पूजा के दिन कौनसी पूजा करनी चाहिए?

मां स्कंदमाता की पूजा में श्री स्कंदमाता की मूर्ति या तस्वीर को स्थापित करें और उनके मंत्र का जाप करें। उनके पसंदीदा भोग के रूप में मिठाई और फल चढ़ाएं।

मां कात्यायनी की पूजा में कैसे उपासना करें?

मां कात्यायनी की पूजा में उनकी मूर्ति को शुद्ध वस्त्र पहनाकर स्थापित करें और काजल और फूलों की माला पहनाएं। कात्यायनी मंत्र का जाप करें और खीर और मूंगफली का भोग चढ़ाएं।

मां कालरात्रि की पूजा के दौरान क्या सावधानियाँ रखनी चाहिए?

मां कालरात्रि की पूजा के समय विशेष सावधानियाँ रखनी चाहिए। आपको धूप और दीपक के साथ उनकी पूजा करनी चाहिए, और रात के समय जागरूक रहना चाहिए। मां के मंत्रों का जाप करें और व्रत में फल, दूध, और व्रत के खाद्य पदार्थ चढ़ाएं।

मां सिद्धिदात्री की पूजा के दौरान क्या ध्यान देना चाहिए?

मां सिद्धिदात्री की पूजा में उनकी मूर्ति को स्थापित करें और उनके विभूषणों से श्रृंगार करें। सिद्धिदात्री मंत्र का जाप करें और खीर, दूध, और खजूर का भोग चढ़ाएं।

मां महागौरी की पूजा में कौनसे मंत्र पढ़ने चाहिए?

मां महागौरी की पूजा के समय “श्वेते वृषे समारूढ़ा श्वेताम्बरधरा शुचिः” मंत्र का जाप करें। उनको सफेद वस्त्र पहनाएं और शुद्ध दूध चढ़ाएं।

दशहरा के दिन क्या महत्व है?

दशहरा को दुर्गा विसर्जन, विजयादशमी, और शस्त्र पूजन का दिन माना जाता है। इस दिन मां दुर्गा की मूर्ति को नदी या जलाशय में विसर्जन किया जाता है, जिससे उनका विदायी गणेश जी के साथ होता है। इस दिन भगवान राम ने रावण को विजय प्राप्त की थी, इसलिए यह भी विजयादशमी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन शस्त्रों की पूजा भी की जाती है, जिसमें व्यक्ति अपने शस्त्रों को सजाकर पूजते हैं।

प्रथम दिन, देवी शैलपुत्री की पूजा के दौरान, भोग के रूप में कौनसे प्रकार के आहार का सेवन किया जाता है?

प्रथम दिन, देवी शैलपुत्री को शुद्ध देसी घी का भोग चढ़ाया जाता है और मीठी खीर भी उनके लिए बनाई जाती है।

दुसरे दिन, देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा में कौनसे आहार का भोग चढ़ाया जाता है?

दुसरे दिन, देवी ब्रह्मचारिणी को चीनी और फलों का भोग चढ़ाया जाता है।

तीसरे दिन, देवी चंद्रघंटा के पूजा के समय कौनसे प्रकार के आहार का भोग किया जाता है?

तीसरे दिन, देवी चंद्रघंटा को पकवान और शहद का भोग चढ़ाया जाता है।

चौथे दिन, देवी कुष्मांडा की पूजा के दौरान, कौनसे प्रकार के भोग की प्राथमिकता होती है?

चौथे दिन, देवी कुष्मांडा को मालपुआ का भोग चढ़ाया जाता है, और इसे दक्षिणा के साथ ब्राह्मणों को भी दिया जाता है।

पांचवे दिन, देवी स्कंदमाता की पूजा के दौरान, कौनसे भोग का आयोजन किया जाता है?

पांचवे दिन, देवी स्कंदमाता को केले का भोग चढ़ाया जाता है, जो उन्हें खुश करने में मदद करता है।

छठे दिन, देवी कात्यायनी की पूजा के दौरान, कौनसे प्रकार के भोग का सेवन किया जाता है?

छठे दिन, देवी कात्यायनी को गुड़ या गुड़ से बनी मिठाई का भोग चढ़ाया जाता है।

सातवे दिन, देवी कालरात्रि की पूजा के समय, कौनसे प्रकार के आहार का भोग किया जाता है?

सातवे दिन, देवी कालरात्रि को गुड़ या गुड़ से बनी मिठाई का भोग चढ़ाया जाता है, और इसे दक्षिणा के साथ ब्राह्मणों को भी दिया जाता है।

आठवे दिन, देवी महागौरी की पूजा के दौरान, कौनसे प्रकार के आहार का भोग चढ़ाया जाता है?

आठवे दिन, देवी महागौरी को नारियल का भोग चढ़ाया जाता है, और यह भक्तों को संतान की प्राप्ति में मदद करता है।

नौवे दिन, देवी सिद्धिदात्री की पूजा के दौरान, कौनसे प्रकार के भोग का सेवन किया जाता है?

नौवे दिन, देवी सिद्धिदात्री को तिल या तिल तेल का भोग चढ़ाया जाता है, और यह भक्तों को पूर्णता की प्राप्ति में मदद करता है।

देवी शैलपुत्री को किस रंग के कपड़े पहनकर पूजा करना चाहिए?

देवी शैलपुत्री को पीले रंग के कपड़े पहनकर पूजन करने से वे प्रसन्न होती हैं।

देवी चंद्रघंटा को पूजन के दौरान कौन-कौन से कपड़े पहनने चाहिए?

देवी चंद्रघंटा की पूजा के समय भूरा रंग के कपड़े पहनने चाहिए, और उनकी चुनरी भी हरे रंग की होनी चाहिए.

देवी कुष्मांडा को प्रसन्न करने के लिए किस रंग के कपड़े पहनने चाहिए?

देवी कुष्मांडा को नारंगी रंग के कपड़े पहनकर पूजन करने की सिफारिश की जाती है।

देवी स्कंदमाता को प्रसन्न करने के लिए कौन-कौन से कपड़े पहनने चाहिए?

देवी स्कंदमाता की पूजा के समय सफेद रंग के कपड़े पहनने चाहिए।

देवी कात्यायनी की पूजा में किस रंग के कपड़े पहनने चाहिए?

देवी कात्यायनी को लाल रंग के कपड़े पहनकर पूजन करने की सिफारिश की जाती है।

देवी कालरात्रि को प्रसन्न करने के लिए कौन-कौन से कपड़े पहनने चाहिए?

देवी कालरात्रि की पूजा के समय नीला रंग के कपड़े पहनने चाहिए।

देवी महागौरी को प्रसन्न करने के लिए किस रंग के कपड़े पहनने चाहिए?

देवी महागौरी को गुलाबी रंग के कपड़े पहनकर पूजन करने की सिफारिश की जाती है.

देवी सिद्धिदात्री को प्रसन्न करने के लिए किस रंग के कपड़े पहनने चाहिए?

देवी सिद्धिदात्री को जामुनी के कपड़े पहनकर पूजन करने की सिफारिश की जाती है.

One thought on “Navratri 2023

  1. जय माता रानी ,माता रानी सबकी मनोकामना पूर्ण करें 🙏🙏🙏

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