Janeyu Muhurat 2023

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Janeyu Muhurat 2023 यज्ञोपवीत (उपनयन) मुहूर्त

यज्ञोपवीत संस्कार (यज्ञोपवीत संस्कार)

सनातन संस्कृति में जन्म से लेकर मृत्यु तक एक व्यवस्थित प्रक्रिया के अंतर्गत एक व्यक्ति का जीवन व्यतीत होता है। जैसे गर्भधारण से लेकर पैदा होने तक और उसके बाद बड़े होने से लेकर मृत्यु तक सभी चीजों के लिए अलग-अलग 16 संस्कारों की व्यवस्था की गई है। इन 16 संस्कारों में से एक हैं “यज्ञोपवीत संस्कार”। यज्ञोपवीत को “उपनयन,” “यज्ञसूत्र,” “व्रतबन्ध,” “बलबन्ध,” “मोनीबन्ध,” “ब्रह्मसूत्र,” आदि नामों से भी जाना जाता है, और किसी भी सनातनी के जीवन में यज्ञोपवीत का अलग ही महत्व होता है। आज इस लेख में हम यज्ञोपवीत (यज्ञोपवीत संस्कार) के महत्व के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे।

क्या होता है यज्ञोपवीत संस्कार (यज्ञोपवीत संस्कार)?

यज्ञोपवीत (यज्ञोपवीत संस्कार) या उपनयन संस्कार का अर्थ होता है पास या सन्निकट ले जाना, अर्थात् ब्रह्म या ज्ञान के पास ले जाना। ज्ञान प्राप्ति की शुरुआत करने से पहले ही उपनयन संस्कार की प्रक्रिया होती है। इस संस्कार के अंतर्गत मंत्रों का उच्चारण कर एक पवित्र धागा बनाया जाता है, जिसे संस्कार में मुंडन और स्नान के बाद ही धारण किया जा सकता है। इस धागे को “जनेऊ” के नाम से जाना जाता है, और इसे सूत के तीन धागों से बनाया जाता है, जिसे व्यक्ति बाएं कंधे के ऊपर तथा दाईं भुजा के नीचे पहनता है। अर्थात् इसे गले में इस प्रकार डाला जाता है कि वह बाएं कंधे के ऊपर रहे।

जनेऊ में ये तीन सूत्र त्रिमूर्ति – ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक होते हैं। साथ ही ये तीन सूत्र गायत्री मंत्र के तीन चरणों के भी प्रतीक होते हैं। देवऋण, पितृऋण और ऋषिऋण को भी जनेऊ के द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। इसी के साथ यज्ञोपवीत संस्कार का आरंभ गायत्री मंत्र से किया जाता है।

जनेऊ धारण के नियमों का पालन

जनेऊ धारण करने के बाद व्यक्ति को अपने जीवन में नियमों का पालन करना पड़ता है। उसे अपनी दैनिक जीवन के कार्यों को भी जनेऊ को ध्यान में रखते हुए ही करना होता है। जैसे – मल, मूत्र का त्याग करने के दौरान जनेऊ को दायने कान पर बांधना होता है ताकि यह अपवित्र न हो और उसके बाद स्वच्छ हाथों से ही उसे स्पर्श करना होता है। इसके अलावा एक बार पहनने के बाद अपवित्र, मैला या टूटने पर ही उसे बदला जाता है और स्नान करने के दौरान जनेऊ को शरीर से बाहर नहीं निकाला जाता है। बालक की 8 वर्ष की आयु होने पर यज्ञोपवीत संस्कार कराया जा सकता है। परन्तु वर्तमान समय में लोगों की जीवनशैली में परिवर्तन होने के कारण बचपन में नहीं, अपितु विवाह के दौरान यज्ञोपवीत संस्कार (यज्ञोपवीत संस्कार) कराया जाता है। सनातन धर्म में आज भी बिना जनेऊ संस्कार के विवाह पूर्ण नहीं माना जाता है।

जनेऊ का महत्व

जनेऊ को अगर सामान्य मानवीय दृष्टि से देखा जाए तो सिर्फ यह एक धागा है परन्तु इसे धर्म और शिक्षा की दृष्टि से देखा जाए तो इसे बनाने के पीछे पूरा गणित और विज्ञान छिपा हुआ है। जनेऊ की लंबाई 96 अंगुल होती है और इस लंबाई को रखने के पीछे 64 कलाओं और 32 विद्याओं का सीखना है। 32 विद्याओं की बात की जाए तो इसमें चार वेद, चार उपवेद, छह अंग, छह दर्शन, तीन सूत्रग्रंथ, नौ अरण्यक सम्मिलित होते हैं। इसके अलावा 64 कलाओं में वास्तु निर्माण, व्यंजन कला, चित्रकारी, साहित्य कला, दस्तकारी, भाषा, यंत्र निर्माण, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, दस्तकारी, आभूषण निर्माण, कृषि ज्ञान आदि आती हैं।

वहीं क्योंकि जनेऊ के हृदय के पास से गुजरता है, इसलिए ऐसा माना जाता है कि यह हृदय रोग की संभावना को कम करता है। वहीं जनेऊ पहनने वाला व्यक्ति सफाई से जुड़े नियमों से भी बंध जाता है। जनेऊ से पवित्रता का अहसास भी होता है, जो व्यक्ति के मन को बुरे कार्यों से बचाती है।

यज्ञोपवीत संस्कार (यज्ञोपवीत संस्कार)

के मूल रूप को अगर देखा जाए तो हमें यह देखने को मिलता है कि जीवन के सबसे पहले चरण शिक्षा की शुरुआत है यज्ञोपवीत। आज के समय में हम इसकी तुलना विद्यालय जाने की शुरुआत से कर सकते हैं। जिस प्रकार आज हम विद्यालय में अपने गुरुओं से शिक्षा प्राप्त करने से प्रवेश प्रक्रिया पूरी करते हैं, ठीक उसी प्रकार गुरूकुल में प्रवेश करने से पहले यज्ञोपवीत संस्कार किया जाता था। इसका उद्देश्य छात्र जीवन में व्यक्ति को नियमों का पालन करना और दृढ़निश्चयी बनाना होता था।

जनेऊ पहनने का मंत्र

ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं, प्रजापतेयर्त्सहजं पुरस्तात्। आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं, यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः।।

जनेऊ उतारने का मंत्र

एतावद्दिन पर्यन्तं ब्रह्म त्वं धारितं मया। जीर्णत्वात्वत्परित्यागो गच्छ सूत्र यथा सुखम्।।

यज्ञोपवीत धारण करने की विधि- यज्ञोपवीत धारण करने का सम्पूर्ण विधान

सर्वप्रथम जानना जरुरी है की जनेऊ कितनी लम्बी होनी चाहिए यह बहुत जरुरी आवश्यक कात्यायन के अनुसार यज्ञोपवीत कमर तक (कटि भाग) तक होनी चाहिए। यज्ञोपवीत अधिक लम्बी नहीं होनी चाहिए।

वशिष्ठ के अनुसार नाभि के ऊपर यज्ञोपवीत होने से अर्थात बहुत छोटी यज्ञोपवीत होने से आयुनाश होता है। नाभि के निचे होने से तपबल क्षय होता है। अतः सदैव यज्ञोपवीत नाभि के समान अर्थात नाभि के बराबर मात्रा में धारण करनी चाहिए।

यज्ञोपवीत धारण करने की सामग्री :

यज्ञोपवीत नाभि के बराबर

अक्षत – एक छोटी कटोरी भरकर चन्दन टिका लगाने के लिए– 1

यज्ञोपवीत धारण करने का क्रम :

आचमन

प्राणायाम

सङ्कल्प

यज्ञोपवीत प्रक्षालन हाथो से सम्पुट बनाना

तन्तु देवताओ का आवाहन

ग्रंथि देवता आवाहन

मानसिक पूजा यज्ञोपवीत ध्यान

सूर्य प्रदर्शन

यज्ञोपवीत धारण मंत्र

जीर्ण यज्ञोपवीत त्याग

यथा शक्ति गायत्री मंत्र जाप गायत्री मंत्र जाप अर्पण करना

सङ्कल्प छोड़ना।

आचमन:

ॐ ऋग्वेदाय नमः । ॐ यजुर्वेदाय नमः । ॐ सामवेदाय नमः |ॐ अथर्ववेदाय नमः ।

बोलकर अपने हाथ धोये ।

पश्चात प्राणायाम करे :

पूरक | गहरी सांस लेना।

कुम्भक । उस सांस को जब तक हो सके अपने पेट में रककर रखे। प्राणायाम करते समय गायत्री मंत्रोच्चारण करे। गायत्री मंत्र मन में ही बोले।

रेचक ।. सांस को छोड़ना । फिर अपने हाथ धोये।

सङ्कल्प :

ॐ विष्णुः विष्णुः विष्णुः अत्र अद्य मासोत्तम मासे,  पक्षे……..तिथौ………नक्षत्रे………..योगे……….करणे

वासरे एवं ग्रहगणविशेषेण विशिष्टयां शुभपुण्यतिथौ मम शर्मणः श्रौतस्मार्तकर्मानुष्ठान सिद्धि अर्थम् शुभ कर्मांगत्वेन नूतन यज्ञोपवीत धारणं अहम् करिष्ये ॥ गोत्र उत्पन्नस्य (गोत्र का नाम पता हो तो गोत्र का नाम ले)

यज्ञोपवीत प्रक्षालन :

यज्ञोपवीत को जल से प्रक्षालन करे और निम्न मंत्र को उच्चारित करे।

ॐ आपोहिष्ठा मयो भुवस्ता नऽऊर्जे दधातन । महेरणाय चक्षसे || जो वः शिवतमो रसस्तस्य भाजयते हनः ।

उशतीरिव मातरः तस्मा अरं गमाम वो जस्य क्षयाय जिन्वथ । आपो जनयथा च नः ॥ (यह एक वैदिक मंत्र है जो यजुर्वेद के अनुसार उच्चारित किया है और लिखा भी है)

यज्ञोपवीतं करसंपुटे धृत्वा दशवारं गायत्री मन्त्रं जपेत (जपित्वा) : दोनों हाथोसे सम्पुट बनाकर सम्पुट में जनेऊ को रखे। दसबार मन में ही गायत्री मंत्र का उच्चरण करे।

तंतु देवता आवाहनं :

ॐ प्रथम तन्तौ ॐ काराय नमः ।ॐ कारं आवाहयामि स्थापयामि || ॐ द्वितीय तन्तौ अग्नये नमः । अग्निं आवाहयामि स्थापयामि ॥ॐ तृतीय तन्तौ नागेभ्यो नमः । नागान आवाहयामि स्थापयामि ||ॐ चतुर्थ तन्तौ सोमाय नमः । सोमं आवाहयामि स्थापयामि || ॐ पञ्चम तन्तौ पितृभ्यो नमः । पितृन आवाहयामि स्थापयामि ||ॐ षष्ठतन्तौ प्रजापतये नमः ।प्रजापतिं आवाहयामि स्थापयामि ॥ॐ सप्तमतन्तौ अनिलाय नमः ।अनिलं आवाहयामि स्थापयामि ॥ॐ अष्टतन्तौ यमाय नमः । यमं आवाहयामि स्थापयामि ॥आनल आवाहयाम स्थापयामि ॥ॐ अष्टतन्तौ यमाय नमः । यमं आवाहयामि स्थापयामि ||ॐ नवम तन्तौ विश्वेभ्यो देवेभ्यो नमः । विश्वान देवान आवाहयामि स्थापयामि ||ग्रंथि मध्ये देवता आवाहन |

जहा गाँठ है वह देवताओ का आवाहन करे ||

नाम बोलकर भी आवाहन कर सकते हो या एक ही साथ सब नाम बोलकर भी आवाहन कर सकते हो।

यज्ञोपवीत ग्रंथिमध्ये ब्रह्मविष्णुरुद्रेभ्यो नमः । ब्रह्म विष्णु रुद्राँ आवाहयामि स्थापयामि ||

यज्ञोपवीत को सिर्फ स्पर्श करना है। चारवेदो का नाम बोलकर न्यसामि बोले ।

ऋग्वेदं प्रथम दोरके न्यसामि । यजुर्वेदं द्वितीय दोरके न्यसामि सामवेदं तृतीय दोरके न्यसामि । अथर्ववेदं ग्रन्थौ न्यसामि।आवाहित देवताः सुप्रतिष्ठताः वरदाः भवत । पश्चात यज्ञोपवीत की मानसिक पूजा करे

मानसिक पूजा विधि (मानर्सोपचार पूजा)

ॐ लं पृथिव्यात्मक गन्धं परिकल्पयामि । हे प्रभु में आपक पृथ्वीरूप चंदन आपको अर्पण करता हु ।

ॐ हूं आकाशात्मकं पुष्पं परिकल्पयामि । हे प्रभु में आपको आकाशरूपी पुष्प (सुंगंध) अर्पण कर रहा हु।

ॐ यं वाय्वात्मकं धूपं परिकल्पयामि । हे प्रभु में आपको वायुदेव के रूप में आपको धूप अर्पण कर रहा हु।

ॐ रं वन्यात्मकं दीपं दर्शयामि । हे प्रभु में आपको अग्निदेव के रूप में दीप प्रदान कर रहा हु ।

ॐ वं अमृतात्मकं नैवेद्यं निवेदयामि । हे प्रभु में आपको अमृत रूपी नैवेद्य अर्पण कर रहा हु ।

ॐ सौं सर्वात्मकं सर्वोपचारं परिकल्पयामि ।

हे प्रभु में सर्वात्म रूप से आपको संसार की सभी पूजा सामग्री आपको समर्पित कर रहा हु आप स्वीकार करे। प्रसन्न हो ।

यज्ञोपवीत ध्यान :

प्रजापतेर्यत् सहजं पवित्रं कार्पाससुत्रोद्भवब्रह्मसूत्रम् । ब्रह्मत्वसिद्धयै च यशः प्रकाशं जपस्य सिद्धिं कुरु ब्रह्मसूत्रम् ॥

पश्चात भगवान सूर्य को जनेऊ दिखाए

यहाँ सूर्य का कोई भी मंत्र या श्लोक बोल सकते है ।

ॐ जपाकुसुम संकाशं काश्यपेयं महाद्युतिम् । तमोरि सर्वपापघ्नं प्रणतोस्मि दिवाकरम् ॥

यज्ञोपवीत धारण विधान और मंत्र : विनियोग :

ॐ यज्ञोपवीतमिति मंत्रस्य परमेष्ठी ऋषिः लिङ्गोक्ता देवता त्रिष्टुप छन्दः यज्ञोपवीत धारणे विनियोगः ।

यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत् सहजं पुरस्तात् । आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः ॥ यज्ञोपवीतमसि यज्ञस्य त्वा यज्ञोपवीतेनोपनह्यामि ॥ कितने तन्तु वाली या कैसी यज्ञोपवीत धारण करनी चाहिए उसके विषय में शास्त्रों में कई प्रमाण दिए है

जीर्ण यज्ञोपवीत त्यागः । एतावद्दिनपर्यन्तं ब्रह्मत्वं धारितं मया । जीर्णत्वात त्वत्परित्यागो गच्छ सूत्र यथा सुखम् ॥ शुद्धभूमौ निधाय ॥

पुरानी यज्ञोपवीत किसी पवित्र जगह पर विसर्जित करे या गड्डा खोदकर उसमे गाड़ दे

यथा शक्ति गायत्री मंत्र जाप करे। गायत्री मंत्र जाप समर्पित करे। अनेन यथाशक्ति गायत्री मंत्रजपकर्मणा श्रीसवितादेवता प्रीयतां न मम ।

सङ्कल्प छोड़ना :

अनेन कर्मणा मम श्रौतस्मार्तकर्म अनुष्ठानं सिद्धि द्वारा श्रीभगवान परमेश्वरः प्रीयतां न मम ।

॥ अस्तु ॥

Janeyu Muhurat 2023

फरवरी

8. बुध-फाल्गुन कृष्ण 3 पू. फा. ल. 2 ।

10. शुक्र- फाल्गुन कृष्ण 5 हस्त ल. 2|

22. बुध- फाल्गुन शुक्ल 2 उ.भा.ल. 2|

24. शुक्र- फाल्गुन शुक्ल 5 अश्विनी ल. 12|

मार्च

1. बुध- फाल्गुन शुक्ल 9 आर्द्रा ल. 3 ।

12. गुरु- फाल्गुन शुक्ल 10 आर्द्रा ल. 12 |

3. शुक्र- फाल्गुन शुक्ल 11 पुनर्वसु ल. 2|

9. गुरु- चैत्र कृष्ण 2 हस्त ल. 12, 2,3|

31. शुक्र – चैत्र शुक्ल 10 पुष्य विप्र कु. ल. 12, 8वें केतुदान, ल. 3 लग्नस्थ भौमदान ।

मई

7. रवि- ज्येष्ठ कृष्ण 2 अनुराधा ल. 2,5|

22. सोम- ज्येष्ठ शुक्ल 3 मृगशिरा ल. 2, 3 5 वें केतु दान।

29. सोम-ज्येष्ठ शुक्ल 9 दिन 8:55 रिक्ताबाद उ. फा. ल. 5|

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