बसंत पंचमी -Basant Panchami

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बसंत पंचमी -Basant Panchami

बसंत पंचमी –Basant Panchami

सनातन धर्म में ज्ञान की देवी मां सरस्वती के लिए बसंत पंचमी का दिन बेहद खास माना जाता है। इसे श्री पंचमी और सरस्वती पंचमी के नाम से भी जाना जाता है। इस साल बसंत पंचमी का पर्व 14 फरवरी को मनाया जाएगा। मान्यता है कि बसंत पंचमी के दिन विधिपूर्वक मां सरस्वती की पूजा करने से बुद्धि और सफलता का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

बसंत पंचमी –Bansant Panchami ka Mahhatva:

इस दिन मां सरस्वती का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए सरस्वती स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। इस दिन सभी स्कूल-कॉलेज में मां सरस्वती की पूजा की जाती है। इस दिन पीले वस्त्र पहनने और दान करने का काफी महत्व माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन सरस्वती मां की पूजा करने से ज्ञान और बुद्धि का आशीर्वाद मिलता है।

बसंत पंचमी –Basant Panchami ka Pauranik Mahattva:

वायुमंडलीय दशाओं में विभिन्नताओं के अनुसार वर्ष को कर्इ ऋतुओं में बॉंटा जाता है। ऋतु वर्ष की वह विशिष्ट अवधि है, जिसमें मौसम की दशाएं लगभग समान रहती हैं। ऋतु के बदलने के साथ मौसम की दशाएँ भी बदल जाती हैं। भूमध्यरेखीय वृत्त के ऊपर सूर्य की किरणें वर्ष भर लगभग लंबवत् पड़ती हैं। अत: इन प्रदेशों मे तापमान सारे वर्ष एक समान रहता है। इस कारण भूमध्यरेखीय प्रदेशों में कोर्इ ऋतु नहीं होती। तटीय भागों में समुद्र का प्रभाव ऋतुओं की भिन्नता को कम कर देता है। धु्रवीय प्रदेशों में केवल दो ऋतुएं होती हैं- लंबी शीत ऋतु और छोटी ग्रीष्म ऋतु । शीतोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में तीन-तीन माह की अवधि की चार ऋतुएं मानी गयी हैं।- इनके नाम हैं – बसंत , ग्रीष्म, पतझड़, और शीत। हमारे देश में तीन प्रमुख ऋतुएं -शीत , ग्रीष्म और वर्षा है। हमारे भारत देश में परम्परागत रूप में 6 ऋतुएं मानी जाती हैं-

बसंत ऋतु (चैत्र-बैशाख या मार्च-अप्रैल) ग्रीष्म ऋतु (ज्येष्ठ-आषाढ़ या मर्इ-जून) वर्षा ऋतु (श्रावण-भाद्रपद या जुलार्इ-अगस्त)

शरद ऋतु (आश्विन- कार्तिक या सितम्बर-अक्टूबर) हेंमत ऋतु (अगहन-पौष या नवम्बर-दिसम्बर) शिशिर ऋतु (माघ-फाल्गुन या जनवरी-फरवरी)

श्रावण की पनपी हरियाली, शरद के बाद हेमन्त एवं शिशिर में वृद्धा के समान हो जाती है, तब बसंत उसका सौन्दर्य लौटा देता है। नवगात, नवपल्लव, नवकुसुम के साथ नवगंध का उपहार देकर विलक्षण बना देता है। बसंत पंचमी का उत्सव हिन्दू तिथि के अनुसार माघ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि में मनाया जाता है। इस ऋतु को ऋतुराज की संज्ञा दी गयी है। धरती का सौंदर्य इस प्राकृतिक आनंद के स्रोत में बढ़ जाता है। रंगों का त्यौहार होली बसंत ऋतु की शोभा को दुगना कर देता है। हमारा जीवन चारों ओर के मोहक वातावरण को देखकर मुस्करा उठता है। इस समय पंचतत्त्व- जल, वायु, धरती, आकाश एवं अग्नि अपना प्रकोप छोड़कर सुहावने रूप में प्रकट होते हैं एवं अपना मोहक रूप दिखाते हैं।

प्राचीन भारत और नेपाल में पूरे साल को जिन छह मौसमों में बाँटा जाता था उनमें वसंत लोगों का सबसे मनचाहा मौसम था। जब फूलों पर बहार आ जाती, खेतों में सरसों का सोना चमकने लगता, जौ एवं गेहूँ की बालियाँ खिलने लगतीं, आमों के पेड़ों पर बौर आ जाता व हर तरफ़ रंग-बिरंगी तितलियाँ मँडराने लगतीं। बसंत ऋतु का स्वागत करने के लिए माघ महीने के पाँचवे दिन एक बड़ा जश्न मनाया जाता था जिसमें विष्णु और कामदेव की पूजा होती, यह बसंत पंचमी का त्यौहार कहलाता था। शास्त्रों में बसंत पंचमी को ऋषि पंचमी से उल्लेखित किया गया है, तो पुराणों-शास्त्रों तथा अनेक काव्य ग्रंथों में भी अलग-अलग ढंग से इसका चित्रण मिलता है।

वसंत पंचमी या श्रीपंचमी एक हिन्दू त्योहार है। इस दिन विद्या की देवी सरस्वती की पूजा की जाती है। यह पूजा पूर्वी भारत, पश्चिमोत्तर बांग्लादेश, नेपाल और कई राष्ट्रों में बड़े उल्लास से मनायी जाती है। इस दिन स्त्रियाँ पीले वस्त्र धारण करती हैं।

वसंत पंचमी मुहूर्त( Vasant Panchami Muhurat)

माघ महीने की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि का आरंभ 13 फरवरी को दोपहर 02 बजकर 41 मिनट से होगा और इसके अगले दिन यानी 14 फरवरी को दोपहर 12 बजकर 09 मिनट पर तिथि का समापन होगा। उदया तिथि के अनुसार, इस बार बसंत पंचमी 14 फरवरी को मनाई जाएगी। आप बसंत पंचमी के दिन सुबह 7 बजकर 01 मिनट से लेकर दोपहर 12 बजकर 35 मिनट तक के बीच में मां सरस्वती की पूजा कर सकते हैं।

बसंत पंचमी पूजा विधि ( Vasant Panchami Puja Muhurat)

बसंत पंचमी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठे और दिन की शुरुआत मां सरस्वती के ध्यान से करें।

इसके बाद स्नान कर पीले वस्त्र धारण करें। क्योंकि मां सरस्वती को पीला रंग बेहद प्रिय है।

अब चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाकर मां सरस्वती की प्रतिमा को स्थापित करें।

अब उनको पीले रंग का वस्त्र अर्पित करें और पीले रंग का पुष्प, रोली, केसर, हल्दी, चंदन और अक्षत चढ़ाएं।

इसके बाद घी का दीपक जलाएं और आरती करें। मां सरस्वती के मंत्रों का जाप और मां सरस्वती स्तुति का पाठ करें।

अंत में पीले चावल, फल और मिठाई का भोग लगाएं।

इसके पश्चात लोगों में प्रसाद का वितरण करें।

मां सरस्वती के मंत्र ( Vasant Panchmi – Sarswati Mata Mantra)

या कुंदेंदुतुषारहारधवला, या शुभ्रवस्त्रावृता।

या वीणा वर दण्डमण्डित करा, या श्वेत पद्मासना।।

या ब्रहमाऽच्युत शंकर: प्रभृतिर्भि: देवै: सदा वन्दिता।

सा मां पातु सरस्वती भगवती, नि:शेषजाड्यापहा।।

ॐ श्री सरस्वती शुक्लवर्णां सस्मितां सुमनोहराम्।

कोटिचंद्रप्रभामुष्टपुष्टश्रीयुक्तविग्रहाम्।।

वह्निशुद्धां शुकाधानां वीणापुस्तकमधारिणीम्।

रत्नसारेन्द्रनिर्माणनवभूषणभूषिताम्।।

सुपूजितां सुरगणैब्रह्मविष्णुशिवादिभि:।

वन्दे भक्तया वन्दिता च।।

वसंत पंचमी पूजा सामग्री ( Basant Panchami Poojan Samgri)

सरस्वती पूजा के लिए आवश्यक सामग्री

सरस्वती जी की मूर्ति या तस्वीर

लकड़ी की चौकी

पीले रंग के कपड़े (आसन के लिए)

पीले रंग के फूल और माला

अक्षत

सिंदूर

हल्दी

सुपारी

आम के पत्ते

धूप-अगरबत्ती

घी

दीया-बाती

जल के लिए कलश

नारियल

पूजा थाली

केला, बेर, मौसमी फल

बूंदी या बूंदी के लड्डू

सफेद तिल के लड्डू।

वसंत पंचमी कथा- Vasant Panchami Katha

सृष्टि की रचना के समय ब्रह्मा जी ने जीवों की रचना करते समय जब मनुष्य योनि की रचना की तो उसके पश्चात वे अपनी इस रचना से संतुष्ट नहीं हुए और विष्णु जी की सहायता से देवी सरस्वती की रचना की। इसके बाद से सभी जीवों को वाणी प्राप्त हुई और उन्हें ज्ञान का अदान हुआ। इसलिए उन्हें विद्या की देवी माना जाता है और उनकी पूजा वसंत पंचमी के दिन की जाती है। पुराणों के अनुसार, श्रीकृष्ण ने देवी सरस्वती से प्रसन्न होकर उन्हें एक वरदान दिया था कि बसंत पंचमी के दिन उनकी भी आराधना की जाएगी। इसके बाद से बसंत पंचमी के दिन से ही देवी सरस्वती की पूजा होनी शुरू हुई।

बसंत पंचमी के महत्व को समझने के लिए एक कथा है। यह कथा विष्णु पुराण में उल्लेखित है।

एक समय की बात है, जब धरती पर जीवन धरा परमात्मा के निर्माण से हुआ था। लेकिन ब्रह्मा जी ने अपने कार्य से संतुष्ट नहीं होकर एक विचार किया कि कुछ भी अधूरा रह गया है। विष्णु जी ने उन्हें समझाया कि शक्ति का अभाव है, जिससे सब कुछ अधूरा है। तब ब्रह्मा जी ने सरस्वती देवी की प्रार्थना की और उन्हें जन्म दिया। सरस्वती देवी ने अपनी वाणी से सभी विद्याओं की सृष्टि की और जगत् को विवेक और ज्ञान की प्राप्ति के लिए मार्गदर्शन किया।

ब्रह्मा जी ने सरस्वती देवी की पूजा और अर्चना की और उन्हें ब्रह्मा की पत्नी बनाया। ब्रह्मा जी ने उनसे कहा, “तुम्हारा नाम ‘सरस्वती’ होगा, जो सभी विद्याओं की देवी होगी। तुम्हारे द्वारा सभी विद्याओं की प्राप्ति होगी।”

इस प्रकार, ब्रह्मा जी की आज्ञा से सरस्वती देवी ने जगत् को विद्या, बुद्धि, और ज्ञान की देवी के रूप में प्राप्ति कराया और बसंत पंचमी के दिन से उनकी पूजा की जाती है।

सरस्वती  जन्मोत्सव – Mata Saraswati Janmotsav

बसंत पंचमी के दिन को इसलिए देवी सरस्वती के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस दिन लोग ध्यान और श्रद्धा से मां सरस्वती की पूजा करते हैं और उनकी कृपा की कामना करते हैं। विद्यार्थियों को भी इस दिन पढ़ाई करने के लिए प्रेरित किया जाता है, क्योंकि मां सरस्वती की कृपा से उन्हें ज्ञान की प्राप्ति होती है।

बसंत पंचमी के दिन लोग विद्या के विभिन्न क्षेत्रों में प्रदर्शन, सेमिनार, और पुस्तकों की पूजा करते हैं। स्कूल और कॉलेजों में छात्र और शिक्षक इस दिन विशेष कार्यक्रमों में भाग लेते हैं और अपनी शिक्षा को समर्पित करते हैं।

रंगों का महत्व- Rango ka mahttva

इस दिन विशेष रंगों का महत्व होता है, जैसे कि पीला और बसंती रंग। लोग पीले रंग के वस्त्र पहनते हैं और खासतौर पर सरस्वती मंदिरों में जाकर पूजा करते हैं।

इस दिन बसंत के प्रारंभ के साथ ही फसलों के उत्सव का भी महत्व होता है। लोग अपने खेतों में जाकर प्रार्थना करते हैं कि फसलें अच्छे रूप में उगें और उन्हें भला-बुरा मौसम न लगे।

बसंत पंचमी एक धार्मिक और सांस्कृतिक उत्सव है जो लोगों को साथ लाकर जोड़ता है और उन्हें धार्मिक और सांस्कृतिक महत्वपूर्ण अनुभव प्रदान करता है।

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